ट्विटर से उलझती सरकार

ट्विटर से उलझती सरकार

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भारत में इस वक्त सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्विटर और केंद्र सरकार के बीच जबरदस्त द्वंद्व चल रहा है। दोनों अपने-अपने तरीके से शक्ति प्रदर्शन में लगे हैं और दोनों एक-दूसरे के आगे झुकते नहीं दिख रहे हैं। इस द्वंद्व को लोकतंत्र बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर इसका सरलीकरण नहीं किया जा सकता। मौजूदा केंद्र सरकार का रवैया अपने विरोधियों के लिए किस तरह का रहा है, इसे सब जानते हैं। अतीत में कई ऐसे प्रकरण हुए हैं, जब अपने विरोधियों के मुंह पर ताला लगाने की कोशिश सरकार ने की है। और ट्विटर भी अभिव्यक्ति की आजादी का सिपहसालार नहीं है। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने लोगों को अपने विचार रखने के लिए मंच उपलब्ध कराया है, लेकिन इसमें उसके व्यापारिक हित भी छिपे हैं। इसलिए ये द्वंद्व नैतिक मूल्यों से परे अपना रसूख जतलाने का दिख रहा है।

पिछले कुछ सालों में भाजपा ने अपना जनाधार बढ़ाने और अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया। फेसबुक ने भाजपा सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने और विरोधियों पर रोक लगाने की जो कोशिश की, उसका खुलासा कुछ समय पहले हुआ ही है। सोशल मीडिया ने एक ओर भाजपा समेत तमाम राजनैतिक दलों को अपनी पहुंच बढ़ाने का जरिया दिया, वहीं आम लोगों के हाथों में भी अपनी अभिव्यक्ति को सशक्त तरीके से रखने का माध्यम उपलब्ध कराया। फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप इन तमाम प्लेटफार्म्स ने पारंपरिक मीडिया का एक विकल्प लोगों के सामने प्रस्तुत किया। पारंपरिक मीडिया पर भी सत्ता का दबाव रहता ही है और निष्पक्ष पत्रकारिता करना एक चुनौती बन गई है। लेकिन सोशल मीडिया के लिए निष्पक्षता जैसे शब्द खास मायने नहीं रखते। बल्कि यहां तो खुलकर किसी के पक्ष में और किसी के खिलाफ अपने विचार प्रकट किए जाते हैं, बेझिझक अपना समर्थन और पक्षपात करने की आजादी भी है। उसकी यही खासियत कई बार सत्ताधारियों के लिए परेशानी बन जाती है। जैसा इस वक्त भारत में हो रहा है।

ट्विटर पर बीते कुछ वक्त में कई ऐसे ट्रेंड चले जो सरकार विरोधी थे। बीते फरवरी में जब किसान आंदोलन चरम पर था, ट्विटर ने केंद्र के आग्रह पर ऐसे 250 ट्विटर एकाउंट हटा दिए थे, जो किसान आंदोलन से जुड़ी जानकारियों को साझा कर रहे थे। ये एकाउंट कारवां पत्रिका, किसान एकता मोर्चा, कई अन्य स्वतंत्र पत्रकारों और कार्यकर्ताओं सहित व्यक्तिगत, समूहों और मीडिया संगठनों के थे। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा एक फरवरी को ट्विटर को जारी किए गए आदेश में ट्विटर को ऐसे एकाउंट हटाने को कहा गया, जो केंद्र के अनुरूप ऐसी जानकारी ट्वीट कर रहे थे, जिनसे संभावित रूप से देश में अशांति फैल सकती थी। इसके साथ ही इसका पालन न करने पर ट्विटर को आईटी अधिनियम की धारा 69ए के तहत कानूनी परिणामों की चेतावनी दी गई। हालांकि, दो दिन बाद तीन फरवरी को ट्विटर ने ब्लॉक एकाउंट बहाल कर दिए थे, जिसका कारण पता नहीं चल सका। इसके बाद कांग्रेस पर कथित टूलकिट से सरकार विरोधी प्रचार करने का आरोप भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने लगाया। लेकिन ट्विटर ने संबित पात्रा के इस संबंध में ट्वीट को मैनिपुलेटेड मीडिया की श्रेणी में रखा, यानी ऐसी बात जिसमें तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा गया है।

ट्विटर के इस तरह के खुलासे से भाजपा की खूब किरकिरी हुई, जबकि कांग्रेस का वजन सोशल मीडिया पर बढ़ा। मई के आखिरी हफ्ते में ट्विटर को संबित पात्रा के एक ट्वीट को मैनिपुलेटेड मीडिया की श्रेणी में टैग करने पर एक और नोटिस मिला था, इस मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ट्विटर इंडिया के दिल्ली और गुड़गांव स्थित कार्यालयों में छापेमारी की थी। और अब सरकार चाहती है कि कार्टूनिस्ट मंजुल के ट्वीट्स को लेकर ट्विटर उन पर कार्रवाई करे। इस संबंध में ट्विटर ने मंजुल को एक ईमेल भेजा है, जिसमें कहा गया है कि भारत सरकार का मानना है कि उनके ट्विटर एकाउंट का कंटेंट भारत के कानूनों का उल्लंघन करता है। हालांकि सरकार ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि किस खास ट्वीट से भारत के कानूनों का उल्लंघन हो रहा है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मंजुल के एकाउंट पर ट्विटर ने कोई कार्रवाई नहीं की है, अलबत्ता ट्विटर ने मंजुल को चार विकल्प सुझाए हैं, जिसमें पहला सरकार के आग्रह को अदालत में चुनौती देना. दूसरा, किसी तरह के निवारण के लिए सामाजिक संगठनों से संपर्क करना, तीसरा स्वैच्छिक रूप से कंटेंट को डिलीट करना (अगर लागू हो) और चौथा कोई अन्य समाधान खोजना है।

देखना दिलचस्प होगा कि ये मामला कहां तक जाता है। हालांकि इस बीच शनिवार को भाजपा और संघ में खलबली मच गई, क्योंकि ट्विटर ने वेंकैया नायडू और मोहन भागवत समेत कई लोगों के ट्विटर अकाउंट से ब्लू टिक हटा दिया था। कुछ घंटों की उथल-पुथल के बाद ब्लू टिक वापस मिल गया है, लेकिन इसे ट्विटर की केंद्र को सीधे चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। ट्विटर के नियमों के मुताबिक अकाउंट को सक्रिय रखने के लिए हर छह महीने में लॉग इन करना जरूरी है और प्रोफाइल को अपडेट करना जरूरी है। वेंकैया नायडू और मोहन भागवत ने ऐसा नहीं किया था, इसलिए उनके ब्लू टिक पहले हटाए गए और अब वापस कर दिए गए हैं। इस दौरान दोनों के फालोअर्स की संख्या भी बढ़ गई है।

वैसे ट्विटर और सरकार के बीच इस तनातनी का असल कारण नए आईटी नियम को बताया जा रहा है। गूगल, फ़ेसबुक और वाट्सऐप ने नए नियमों के मुताबिक़, तमाम पदों पर अफ़सरों को नियुक्त करने के लिए सहमति दे दी है लेकिन ट्विटर इसके लिए राजी नहीं है। ट्विटर के अड़ियल रवैये को देखते हुए 5 जून को केंद्र सरकार ने ट्विटर को पत्र लिखा कि यूं तो नए आईटी  नियमों को मानने की डेडलाइन 26 मई ही थी। लेकिन भलमनसाहत के नाते हम आपको एक आख़िरी नोटिस भेज रहे हैं। अभी भी नए नियमों को न मानने की सूरत में ट्विटर को आईटी एक्ट के तहत मिल रही सुविधाओं से वंचित किया जा सकता है। इसके लिए ट्विटर ख़ुद जिम्मेदार होगा। ट्विटर एक दशक से भी अधिक समय से भारत में ऑपरेशनल है। ऐसे में ये बात यकीन से परे है कि ट्विटर इंडिया अब तक ऐसा कोई मैकेनिज़्म तैयार नहीं कर पाया है कि जिससे भारत के लोगों की समस्याओं को समय से और पारदर्शी तरीके से सुलझाया जा सके। ट्विटर का नए आईटी  नियमों को न मानना ये जताता है कि उनका इस दिशा में कोई कमिटमेंट नहीं है।

किसी सरकार के साथ यह सीधी टकराहट ट्विटर के लिए नई नहीं है। हाल ही में नाइजीरिया में राष्ट्रपति मोहम्मद बुहारी के एक ट्वीट को हटाने पर ट्विटर को वहां प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेकिन भारत में ऐसा करना शायद आसान नहीं होगा। उदारवादी बाजार व्यवस्था के दौर में विदेशी निवेशकों का ख्याल सरकार को रखना होता है और कुछ तकाजा लोकतंत्र का भी है। बहरहाल देखना होगा कि सरकार किस तरह इस मसले को सुलझाती है।

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