किस मानसिकता से आ रही हैं ये महिला विरोधी टिप्पणियाँ..

किस मानसिकता से आ रही हैं ये महिला विरोधी टिप्पणियाँ..

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-सर्वमित्रा सुरजन॥

पिछले दिनों महिलाओं पर हुईं इन टिप्पणियों से समाज का जातिवादी और पुरुषप्रधान चेहरा तो उजागर हुआ ही, महिला दिवस का मौका न होते हुए भी स्त्री अस्मिता पर चर्चा के लिए अवकाश मिला। वैसे पिछले दिनों एक अच्छी खबर भी सामने आई। पुलवामा हमले के बाद शहीद हुए मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल की पत्नी निकिता कौल अब भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन गई हैं। एमबीए ग्रैजुएट निकिता पहले मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थीं, लेकिन अपने पति की शहादत के बाद उन्होंने भी सेना में जाने का फैसला लिया और इसके लिए बाकायदा प्रशिक्षण लिया।

रणदीप हुड्डा एक बेहतरीन अभिनेता हैं। हाइवे जैसी फिल्में इसका प्रमाण हैं। अभिनेता होने के साथ-साथ वे एक संवेदनशील इंसान भी होंगे, ऐसा मेरा अनुमान था। बीते कुछ बरसों में देश में आई प्राकृतिक आपदाओं के वक्त उन्होंने आगे बढ़कर पीड़ितों की मदद की। पांच साल पहले जब हरियाणा में जाट आंदोलन की आग भड़की थी, उस वक्त रणदीप हुड्डा ने ठेठ हरियाणवी अंदाज में लोगों को समझाने की कोशिश की थी कि अब बस करो। उन्होंने इस घटना पर कुलदीप रूहिल के साथ चीरहरण नाम की फिल्म बनाने का फैसला किया, जिसमें महिलाओं के साथ हुए कथित सामूहिक बलात्कार पर फोकस था। मगर अब रणदीप हुड्डा का एक वायरल वीडियो देखकर काफी हैरानी हुई। इस वीडियो में वे बहुजन समाज पार्टी की मुखिया, उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और दलितों की बड़ी नेता सुश्री मायावती का नाम लेकर एक भद्दी टिप्पणी करते नजर आ रहे हैं। वीडियो में तथाकथित तौर पर संभ्रांत लोग दिख रहे हैं, जो उनकी बात को मजाक मानकर हंसते हैं। वीडियो नौ साल पुराना है, लेकिन सोशल मीडिया का एक कमाल ये भी है कि यह चीजें आसानी से भूलने नहीं देता। सो इस पुराने वीडियो पर अब रणदीप हुड्डा की न केवल आलोचना हो रही है, बल्कि उन पर कार्रवाई की मांग भी उठ रही है। मामले के उजागर होने के बाद संयुक्त राष्ट्र की जंगली जानवरों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी संधि (सीएमएस) के राजदूत के पद से रणदीप हुड्डा को हटा भी दिया गया है। जबकि पिछले साल ही उन्हें तीन साल के लिए यह पद दिया गया था।

रणदीप हुड्डा की इस विवादित टिप्पणी की आलोचना कई लोगों ने खुलकर की है। उन्हें जातिवादी और लैंगिकवादी कहा जा रहा है। लेकिन जातिवाद के इस अखाड़े में वे अकेले नहीं हैं, अब रवीना टंडन का 2015 का एक ट्वीट भी सामने आया है, जो भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वकप के मुकाबले के वक्त का है। रवीना टंडन ने इस ट्वीट में लिखा था, ‘मुझे ये पसंद आया। इंडिया-पाकिस्तान क्रिकेट मैच, जीते तो हिना रब्बानी हमारी, हारे तो मायावती तुम्हारी।’ इसके साथ उन्होंने हंसने वाला इमोजी भी बनाया है। जिसे देखकर बहुत से लोग हंसे भी होंगे। लेकिन क्या वाकई ये हंसने वाली बात है। किसी मैच में जीत-हार के बदले अपनी महिला नेताओं की अदला-बदली की टिप्पणी आखिर किस मानसिकता की देन है। रवीना टंडन भी अपने सामाजिक कार्यों के लिए चर्चा में रहती हैं। उन पर तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त जैसा गीत फिल्माया गया है, तो मातृ जैसी फिल्में भी उन्होंने की हैं। जाहिर है प्रकटत: वे महिला अधिकारों की पैरोकार भी होंगी। लेकिन फिर इस तरह की टिप्पणियां कहां से आती हैं।

रणदीप हों या रवीना हों, संसद में बैठे माननीय सांसद हों या दीदी ओ दीदी कहने वाले नेता हों, बड़े संपादक हों या न्याय की आसंदी पर बैठे लोग हों, ऐसे तमाम ओहदेदार लोगों के साथ सड़क किनारे खड़े होकर लड़कियों को छेड़ने वाले शोहदों को भी शामिल कर लें, और फिर हालात का विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि मायावती तो केवल सामने आया एक नाम है, दरअसल पूरा समाज लिंग और जाति की बेड़ियों में जकड़ी मानसिकता से संचालित है। ये कुंठित मानसिकता इस बात को बर्दाश्त ही नहीं कर पाती है कि कोई स्त्री समाज की बनी-बनाई लीक को तोड़कर चलने का साहस करे। अपनी शर्तों पर जीवन जिए, अपना भविष्य तय करे। पुरुष के अधिकारक्षेत्र में बराबरी का उद्घोष करते हुए दखल दे। इसमें भी अगर स्त्री दलित है, पिछड़े वर्ग की है, अल्पसंख्यक है या गरीबी से आगे निकलकर कामयाबी हासिल करती है, तो फौरन उसके चरित्र पर टिप्पणी करना समाज अपना अधिकार समझने लगता है। इसमें केवल पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी बराबरी की जिम्मेदार हैं।

पुरुषप्रधान समाज द्वारा तय किए गए शारीरिक सौंदर्य के मानकों के अनुरूप स्त्री के शरीर और सुंदरता का फैसला हर साल सौंदर्य प्रतियोगिताओं में होता है और इस पर ग्लैमर का आवरण इस कदर चढ़ा है कि उसकी चकाचौंध में इस तरह की प्रतियोगिताओं में समाज को कुछ गलत नहीं लगता। नतीजा ये कि गोरेपन की क्रीम का बाजार बढ़ता है, कमर पतली करने की दवाइयां बिकती हैं। निचली जाति या आदिवासी महिलाओं के नैन नक्श अक्सर इस सौंदर्य मानक पर खरे नहीं उतरते हैं और इस तरह समाज को उनका मजाक उड़ाने का लाइसेंस मिल जाता है। ताड़का जैसी हंसी वाली टिप्पणियां इसी मानसिकता से संसद में सुनने मिलती हैं। रूप-रंग के अलावा महिलाओं को कई कामों के लिए पहले ही अयोग्य मान लिया जाता है। जैसे महिलाएं अच्छी ड्राइवर नहीं होतीं। जबकि सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े इस बात की पुष्टि नहीं करते हैं। कुछ ऐसा ही पूर्वाग्रह बलात्कार और लड़कियों के उत्पीड़न की घटनाओं में भी देखने मिला है।

महिलाओं को एक तय समय के भीतर घर आ जाना चाहिए, उन्हें भाई, पति या किसी पुरुष साथी के बिना सुनसान रास्तों या अंधेरे में नहीं निकलना चाहिए, उन्हें जोर से हंसना नहीं चाहिए, उन्हें छोटे कपड़े नहीं पहनने चाहिए, इस तरह की एक लंबी सूची है, जिसमें ये बताया गया है कि महिलाओं को क्या नहीं करना चाहिए। लेकिन इस बारे में बहुत कम बात की जाती है कि पुरुषों को क्या करना चाहिए। पिछले कुछ समय में मी टू आंदोलन के कारण कई नामीNM -गिरामी लोगों के चेहरे से नकाब उतर गए, लेकिन इससे महिलाओं को लेकर पूर्वाग्रहों में कोई कमी नहीं आई है। हाल ही में समाचार पत्रिका तहलका के संपादक रहे तरुण तेजपाल पर लगे बलात्कार के आरोपों को अदालत ने $खारिज कर दिया है। उन पर नवंबर 2013 में गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान अपनी महिला सहकर्मी का यौन शोषण का आरोप लगा था।

उन पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि कथित तौर पर हुए यौन शोषण के बाद की तस्वीर को देखने पर युवती ‘मुस्कुराती हुई, खुश, सामान्य और अच्छे मूड में दिखती हैं।’ अपने 527 पन्ने के $फैसले में अदालत ने लिखा, ‘वो किसी तरह से परेशान, संकोच करती हुई या डरी-सहमी हुई नहीं दिख रही हैं। हालांकि उनका दावा है कि इसके ठीक पहले उनका यौन शोषण किया गया।’ इसी तरह पिछले साल कर्नाटक में बलात्कार के एक मामले पर फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा था कि  ‘महिला ने सफाई दी कि बलात्कार की घटना के बाद वो इतना थक गई थीं कि वो सो गईं। किसी भारतीय महिला के लिए ये व्यवहार अशोभनीय है। बर्बाद हो जाने के बाद प्रतिक्रिया देने का हमारी महिलाओं का ये कोई तरीका नहीं।’  इस तरह की टिप्पणियों के बाद सवाल ये उठता है कि किसी महिला के साथ बलात्कार हुआ या नहीं, इस पर सुनवाई होनी चाहिए या इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए कि उसके बाद महिला का व्यवहार कैसा था। अगर पीड़िता का व्यवहार समाज के बनाए चलन के मुताबिक नहीं है, तो क्या इस आधार पर बलात्कारी को छूट मिलनी चाहिए और क्या इस आधार पर पीड़िता का चरित्र हनन किया जाना चाहिए।

पिछले दिनों महिलाओं पर हुईं इन टिप्पणियों से समाज का जातिवादी और पुरुषप्रधान चेहरा तो उजागर हुआ ही, महिला दिवस का मौका न होते हुए भी स्त्री अस्मिता पर चर्चा के लिए अवकाश मिला। वैसे पिछले दिनों एक अच्छी खबर भी सामने आई। पुलवामा हमले के बाद शहीद हुए मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल की पत्नी निकिता कौल अब भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन गई हैं। एमबीए ग्रैजुएट निकिता पहले मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थीं, लेकिन अपने पति की शहादत के बाद उन्होंने भी सेना में जाने का फैसला लिया और इसके लिए बाकायदा प्रशिक्षण लिया। अब वे सेना की टेक्निकल विंग में बतौर लेफ्टिनेंट काम करेंगी। बीते शनिवार अपनी पासिंग आउट परेड के बाद निकिता ने कहा- औरतों को खुद पर भरोसा रखना ही चाहिए। कई बार जिंदगी बेहद मुश्किल लगती है, आपको लगता है कि कुछ भी आपके लिए नहीं हो रहा है। आपको लगेगा कि आप हार रहे हैं लेकिन आपको समझना होगा कि यह जिंदगी का अंत नहीं है। आपको कोशिश करनी होगी, उठना होगा और किसी दिन आप जीत जाएंगे।’ उम्मीद की जाना चाहिए कि निकिता के आगे का सफर अब आसान होगा और उनके शब्दों से देश की लाखों महिलाओं को अपने लिए खड़े होने का हौसला मिलेगा। हालांकि समाज में महिलाओं की असली जीत तभी होगी, जब पुरुष उनकी जीत पर जश्न मनाना सीखेंगे।

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