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दिल्ली सरकार के साथ-साथ अब दिल्ली नगर निगम यानि एमसीडी में भी छठ की छुट्टी नहीं रहेगी। उप-राज्यपाल ने एमसीडी सदन में सार्वजनिक छुट्टी संबंधी पारित प्रस्ताव को नकार दिया है। उन्होंने छठ का वैकल्पिक अवकाश जारी रखा है। इस तरह मंगलवार को एमसीडी के समस्त कार्यालय खुले रहेंगे, मगर कर्मचारी वैकल्पिक अवकाश पर रह सकते हैं। उप-राज्यपाल के इस कदम से एमसीडी में सत्तारूढ़ भाजपा को करारा झटका लगा है, क्योंकि सोमवार को ही सदन की बैठक में उसने छठ की छुट्टी करने का प्रस्ताव पारित कर निगमायुक्त को आदेश जारी करने के निर्देश दिए थे। गौरतलब है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पहले ही राजधानी में छठ की छुट्टी को नकार चुकी हैं जबकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक उनसे इसकी अपील कर चुके हैं।

एमसीडी में छठ पर छुट्टी करने के मसले पर सरकार से चले रहे टकराव को दूर करने और स्थिति स्पष्ट करने के साथ-साथ छुट्टी की व्यवस्था करने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा ने सोमवार को सदन की विशेष बैठक बुलाई गई। बैठक की शुरुआत से ही विपक्ष इसका विरोध करता रहा। इसके बावजूद प्रस्ताव पास किया गया, लेकिन अंतिम फैसले के लिए कमिश्नर के.एस. मेहरा ने फाइल उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना के पास भेज दी। सूत्रों के मुताबिक, देर शाम राजनिवास से भी इस प्रस्ताव पर असहमति की सूचना आ गई थी। ऐसे में छठ पर अब आम छुट्टी नहीं होगी।

सूत्रों के मुताबिक, एमसीडी कमिश्नर द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार से राय ली, जिस पर वहां से असहमति व्यक्त की गई। ऐसे में उपराज्यपाल ने प्रस्ताव खारिज कर दिया। दरअसल, बीजेपी पिछले कई दिनों से इस बात की मांग कर रही थी कि दिल्ली में 40 लाख पूर्वांचली रहते हैं, जिनके लिए छठ पूजा का काफी महत्व है। उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस मौके पर आम छुट्टी घोषित की जानी चाहिए। मेयर ने 10 दिन पहले छठ की छुट्टी का ऐलान किया था। मगर दिल्ली के मुख्य सचिव ने उनके छुट्टी करने के फैसले को रद्द कर दिया था।

उधर दिल्ली सरकार में छठ पर छुट्टी के मसले पर काग्रेंस के प्रदेशाध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल ने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से कहा है कि शहर में रहने वाले पूर्वांचल के 40 लाख लोगों की भावना को ध्यान में रखते हुए वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि सरकार को एक नवंबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित करना चाहिए। गौरतलब है कि शीला और अग्रवाल के रिश्ते बहुत मधुर नहीं माने जाते। अग्रवाल ने कहा, ”मैंने शीला दीक्षित को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि एक नवंबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाये। हमें यहां रह रहे पूर्वांचलियों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। भाजपा ने यह मुद्दा उठाया है और हम उनको इस मामले में राजनीति करने की छूट नहीं दे सकते।”

बहरहाल, भाजपा भले ही छठ पर छुट्टी न दिलवा पाई हो उसने इस मामले में पूर्वांचलियों का दिल जीत लिया है। जो लोग निजी संस्थानों में भी काम कर रहे हैं वे भी शीला दीक्षित और तेजेंद्र खन्ना के फैसलों के पीछे कांग्रेस को ही जिम्मेदार मान रहे हैं। उनका कहना है कि ये सांकेतिक फैसले हैं। छठ के घाट की तैयारियों में जुटे इंदरपुरी के एक पुरबिया भाजपा नेता उमेश वर्मा ने मीडियादरबार.कॉम से कहा, ”सोनिया गांधी ने साबित कर दिया है कि वे अब तक विदेशी ही हैं और दिल्ली की शीला सरकार ने अपने पुरबिया विरोधी होने का सुबूत दे दिया है।” दिल्ली सचिवालय में कई पुरबिेए कर्मचारी तो यहां तक कहते सुने गए, ”ये शीला दीक्षित तो असल में अभी भी शीला कपूर ही है, ये क्या समझेंगी छठ की महिमा और हमारी भावनाओं को?”

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By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 thoughts on “”ये शीला दीक्षित तो असल में शीला कपूर हैं, ये क्या समझेंगी छठ की महिमा?””
  1. क्या आपको लगता है कि शीला दीक्षित जैसी पापन को छठ की महिमा समझ में आएगी? छठी मां की महिमा को शीला की छुट्टी की जरूरत भी नहीं है।

  2. छठ पर्व उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए एक महा पर्व है. समयांतराल, अपनी रोजी-रोटी की तलाश में इन प्रदेशों से लोगो का पलायन होता गया. वैसे इस पर्व के दौरान अधिकांश लोग अपने गाँव-घर लौटते हैं, फिर भी अधिकांश आबादी शहर में ही रह जाती है. दिल्ली में इन प्रदेशों के लोगों की संख्या आज भी इतनी तो अवश्य है कि यदि सभी एकजुट हो जाएँ तो शीला दीक्षित क्या किसी भी गैर बिहारी या उत्तर प्रदेश के लोग और तथाकथित नेतागण दिल्ली सचिवालय में पहुँच नहीं पाएंगे, आजीवन. लेकिन यह दुर्भाग्य है, एकता नहीं है. और जब एकता नहीं होगी, तो कोई भी ऐसे ही सर पर तांडव करेंगे जो शीला दीक्षित कर रहीं हैं. समय आ गया है, नियति को बदलने का, आगे समय तय करेगा दिशा को.

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