आला अदालतों के जजों का सीखना बंद नहीं होना चाहिए..

आला अदालतों के जजों का सीखना बंद नहीं होना चाहिए..

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मद्रास हाईकोर्ट के जज ने पेश की अपनी मिसाल..

-सुनील कुमार॥

इस मामले पर कुछ हफ्ते बाद भी लिखने की जरूरत अभी इसलिए पड़ रही है कि गोवा की एक अदालत ने एक बहुत चर्चित सेक्स शोषण मामले पर अपना फैसला देते हुए आरोप लगाने वाली युवती के खिलाफ जितने किस्म की टिप्पणियां की हैं, वे दिल दहलाने वाली हैं। इस जज के अलावा पहले भी कुछ दूसरे प्रदेशों में कुछ ऐसे जज रहे हैं जिन्होंने देह शोषण के मामलों में महिलाओं के खिलाफ बहुत ही अवांछित और नाजायज टिप्पणियां की हैं जिनसे यह पता लगता है कि उनकी महिलाओं की मानसिकता की समझ शून्य से भी गई गुजरी है, वे महिलाविरोधी पूर्वाग्रहों से लदे हैं। इस अखबार से जुड़े हुए एक फेसबुक पेज पर आजकल में ही लिखा गया है कि हिंदुस्तान में किसी को जज बनाने के पहले बलात्कार की शिकार महिलाओं के बारे में उनसे खुलकर बातचीत करके उनकी समझ का अंदाज लगाना चाहिए, और इस मुद्दे के अलावा भी सामाजिक न्याय से जुड़े दूसरे मुद्दों पर उनकी सोच पर उनसे बात करनी चाहिए, इसके बाद ही उनकी नियुक्ति होनी चाहिए।

हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि इस हम अपने ऐसी चर्चा में पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि जिस तरह अमेरिका में किसी को जज बनाने के पहले उससे लंबी चौड़ी पूछताछ होती है, और सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के पहले अमेरिकी संसद की एक कमेटी वैसे संभावित जजों से लंबी-लंबी बैठकें करती हैं और देश में जलते-सुलगते तमाम मुद्दों पर उनकी सोच का पता लगाती है. ऐसी संसदीय सुनवाई वहां की संवैधानिक अनिवार्यता रहती है। ऐसी सुनवाई का मतलब ही यह होता है कि उनके पूर्वाग्रहों का अंदाज लगा लेना और उसके बाद यह तय करना कि ऐसे पूर्वाग्रहों वाले लोगों को जज बनाना ठीक होगा या नहीं। हिंदुस्तान में भी न सिर्फ महिलाओं से जुड़े हुए मुद्दे बल्कि दलित और आदिवासी लोगों से जुड़े हुए मुद्दे, गरीब और मजदूरों से जुड़े हुए मुद्दे, ऐसे हैं जिनकी समझ बहुत से जजों में बहुत कम दिखाई पड़ती है। पिछले बरस जब कोरोना के बाद देश भर में एक साथ लॉकडाउन लगाया गया उस वक्त हजार-हजार मील पैदल चलकर जिंदा या मुर्दा घर लौटने वाले मजदूरों के हक में जब कुछ लोग अदालत पहुंचे, तो जजों ने इस मुद्दे को समझने से ही इंकार कर दिया। हमारा मानना है कि मजदूरों को इंसाफ नहीं मिला जबकि वे करोड़ों की संख्या में थे, और जाहिर तौर पर तकलीफ में थे, और सरकार के पास उस नौबत का कोई जवाब नहीं था, उन लोगों की तकलीफ का कोई समाधान नहीं था, लेकिन अदालत के पास भी वह नजर नहीं थी जो कि सबसे गरीब लोगों की इस सबसे बड़ी त्रासदी को देखकर समझ सकती। इसलिए आज जब मद्रास हाईकोर्ट के एक जज खुलकर इस बात को मंजूर कर रहे हैं कि अपने पूर्वाग्रहों से उबरने के लिए और इस मुद्दे को बेहतर समझने के लिए वे अपने मनोवैज्ञानिक शिक्षण के लिए जा रहे हैं, ताकि यह फैसला देते समय कानूनी नुक़्तों के आधार पर दिमाग से फैसला निकलने के बजाय वह दिल से निकल सके, तो उनकी बात से और जजों को भी कुछ सीखना चाहिए। हिंदुस्तान की बहुत सी दूसरी अदालतों के बहुत से दूसरे बड़े-बड़े जजों को ऐसी समझ की जरूरत है। आज अधिक से अधिक होता है यह है कि बड़े जज अपनी अदालतों में काम करने वाले अच्छे वकीलों में से किसी को छांटकर उन्हें न्याय मित्र बना कर किसी मामले में नियुक्त करते हैं ताकि वे उस मामले की बारीकियां जजों को समझा सकें। लेकिन ऐसे में एक खतरा यह भी रहता है कि यह न्याय मित्र जजों को समझाते हुए खुद ही अपने पूर्वाग्रह से मुक्त ना हो सके, और इसलिए जजों का ऐसा समझना पूरी तरह से खतरे से खाली भी नहीं है। मद्रास हाई कोर्ट के जज ने एक बेहतर राह दिखाई है जिसमें वह ऐसे मामलों के जानकार किसी मनोचिकित्सक या किसी परामर्शदाता से समझ लेने वाले हैं।

हाल के वर्षों में छोटी और बड़ी बहुत सी अदालतों के जजों ने सामाजिक न्याय की अपनी कमजोर समझ का आक्रामक प्रदर्शन किया है। उन्होंने अपने महिला विरोधी नजरिए को सिर पर मुकुट की तरह सजा कर फैसले सुनाए हैं, उन्होंने बहुत सी अवांछित और नाजायज बातें फैसलों में लिखी हैं, कुछ मामले तो ऐसे भी रहे जिनमें जजों की टिप्पणियों के खिलाफ अदालती अपील होने के पहले ही लोगों को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा और ऐसी टिप्पणियों को रुकवाना पड़ा। हिंदुस्तान एक बहुत ही दकियानूसी और पाखंडी देश है जहां पर मिट्टी और पत्थर की बनी देवियों की तो पूजा की जाती है, लेकिन जीती जागती महिला को जलाकर मारना, उससे बलात्कार करना, उसे अपमानित करना, उसे सोशल मीडिया पर हजार-हजार अकाउंट्स से बलात्कार की धमकी दिलवाना, उसके बच्चों को बलात्कार की धमकी दिलवाना। यह देश कुछ इस किस्म का देश है, इसलिए जज भी इसी समाज से निकल कर आते हैं, इसी समाज में जीते हैं, और महिलाओं को लेकर उनकी समझ अगर पूरी तरह बेइंसाफी से भरी हुई है, तो उसमें हमें जरा भी हैरानी नहीं होती। ऐसा करने वाले केवल पुरुष जज नहीं होते, ऐसे फैसले देने वाली महिला जज भी होती हैं, जिनकी खुद की मानसिक परिपक्वता पुरुषप्रधान समाज में दबे कुचले तरीके से हुई रहती है। यह उसी किस्म की महिलाओं जैसी रहती हैं जो किसी अफसर को या नेता को कमजोर कायर दब्बू नाकामयाब साबित करने के लिए उसे चूडिय़ां भेंट करने जाती हैं मानो चूडिय़ां किसी कमजोरी का सुबूत हैं। इसलिए इस देश में महिलाओं जैसे तमाम कमजोर तबकों, जिनमें सेक्स की अलग पसंद वाले समूह भी शामिल हैं, उन्हें लेकर जजों की एक क्लास लगनी चाहिए, जिसमें वे खुलकर अपने अज्ञान को उजागर करते हुए सवाल करें, और उनके अज्ञान को दूर करने का रास्ता अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञ निकालें। सुप्रीम कोर्ट तक के बहुत से जजों ने समय-समय पर समाज के कमजोर तबकों के अधिकारों को समझने से इसलिए नाकामयाबी दिखाई है क्योंकि उन तबकों की उन्हें समझ नहीं रह गई। हमारा तो यह मानना है कि किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक या परामर्शदाता से मुद्दों को समझने की तरह ही सामाजिक हक़ीक़त के बहुत से मुद्दों को समझने के लिए जजों को समाज के कमजोर तबकों की गहरी समझ रखने वाले विशेषज्ञ जानकार लोगों को आमंत्रित करके उनकी क्लास अटेंड करनी चाहिए।

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