Home गौरतलब अलीगढ़ में मौत का तांडव, 51 मरे..

अलीगढ़ में मौत का तांडव, 51 मरे..

उत्तरप्रदेश में कोरोना का कहर कम हुआ बताया जा रहा है, लेकिन इस बीच जहरीली शराब से हुई मौतों ने कानून व्यवस्था और सरकार की मुस्तैदी पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार सुबह अलीगढ़ जिले के लोधा इलाके में करसुआ गांव में जहरीली शराब पीने से कुछ लोगों की मौत हो गई, इन सभी लोगों ने रात में अलग-अलग जगहों पर देसी ठेके से शराब खरीदकर पी थी। करसुआ के साथ कुछ अन्य जगहों से भी शराब पीने से मौत की $खबरें आईं। शुक्रवार रात तक कथित तौर पर जहरीली शराब से मृतकों की संख्या 27 तक पहुंच गई और जहरीली शराब से मरने का ये सिलसिला रविवार को भी जारी रहा। वैसे सरकारी आंकड़े तो मृतकों की संख्या केवल 25 बता रहे हैं, लेकिन अलीगढ़ जिला अस्पताल में अब तक 51 शवों के पोस्टमॉर्टम हो चुके हैं और स्थानीय लोगों के मुताबिक, मरने वालों की संख्या 60 से ज़्यादा है।

अलीगढ़ के भाजपा सांसद सतीश गौतम का भी कहना है कि ‘प्रशासन चाहे जो कहे लेकिन शराब कांड में अब तक कम से कम 51 लोगों की मौत हो चुकी है।’ क्या योगी सरकार अपनी ही पार्टी के सांसद के बयान को झुठला सकती है।

अलीगढ़ के जिन गांवों में जहरीली शराब से प्रभावित लोग हैं, वहां तीन दिनों से चीख-पुकार मची है, मातम पसरा हुआ है। और प्रशासन अब भी आंकड़ों के हेर-फेर में ही लगा हुआ है। उत्तरप्रदेश में इतनी अकाल मौतें न होतीं, अगर शराब के नाम पर जहर परोसने के इस गोरखधंधे पर पुलिस-प्रशासन मुस्तैदी से रोक लगाता। अलीगढ़ में इस वक्त जो हाहाकार मचा है, कुछ दिनों पहले ऐसा ही माहौल अम्बेडकरनगर, आजमगढ़ और बदायूं में था, जहां जहरीली शराब से 28 से अधिक लोग मारे गए थे। आंकड़े बताते हैं कि जनवरी से 28 मई तक प्रदेश के 11 जिलों में जहरीली शराब से लगभग 100 लोगों की मौत हो चुकी है। इन घटनाओं पर अगर शुरु से सख्ती बरती जाती तो रोक लग भी सकती थी। लेकिन स्थानीय स्तर पर चंद अधिकारियों को निलंबित कर शासन और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं और शराब का अवैध धंधा जारी रहता है।

प्रशासन ने देसी शराब के ठेके तो बंद कर दिए लेकिन इससे शराब की चोरी-छिपे बिक्री और उसे पीकर बीमार होने और मरने वालों का सिलसिला नहीं थमा। अलीगढ़ शराब कांड के बाद राज्य सरकार ने आबकारी विभाग के चार अधिकारियों और पुलिस विभाग के आठ लोगों को निलंबित कर दिया है, इस बीच, पुलिस ने शराब तस्कर गिरोह से जुड़े 11 लोगों को गिरफ़्तार किया है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर अपर मुख्य सचिव आबकारी और अपर मुख्य सचिव गृह ने अभियान को लेकर जरूरी दिशा-निर्देश जारी किए हैं जिसमें कहा गया है कि एसडीएम, क्षेत्राधिकारी और आबकारी अधिकारियों की संयुक्त  टीमें अवैध शराब बनाने और बिक्री करने वालों के ख़िलाफ़ विशेष अभियान चलाएंगी। ये भी निर्देश दिए गए हैं कि अवैध शराब के संगठित कारोबार में लिप्त लोगों के ख़िलाफ़ गैंगस्टर एक्ट और एनएसए के तहत कार्रवाई की जाएगी। पुलिस की टीम अलीगढ़ से लेकर नोएडा तक छापेमारी कर अवैध शराब व्यापार चलाने वालों पर कार्रवाई कर रही है।

इस तरह की कार्रवाई में सख्ती तो नजर आती है, लेकिन क्या इसका इतना ही सख्त असर धरातल पर भी होगा। क्या शराब का यह अवैध व्यापार बिना रसूखदार लोगों के संभव है। गांवों में कच्ची शराब की भ_ियां चलती हैं, तो क्या इसकी खबर आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस को नहीं होती है। क्या सरकार और प्रशासन इंतजार करते हैं कि कोई बड़ी घटना हो। शराब माफिया, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत के बिना इस तरह के गलत कारोबार चलाना असंभव है। इसलिए महज कुछ लोगों की गिरफ्तारी या निलंबन से सरकार की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो सकती।

थोड़े से मुनाफे की खातिर लोगों की जान का सौदा करने की इस लत को पूरी तरह खत्म करने की जरूरत है। दरअसल अवैध शराब के कारोबार में सारा खेल मिथाइल अल्कोहल और इथाइल अल्कोहल का है। मिथाइल अल्कोहल फर्टिलाइजर उद्योग का अपशिष्ट होता है, जो केवल छह रूपए लीटर में मिल जाता है। जबकि इथाइल अल्कोहल प्राकृतिक तरीके से सड़ा कर तैयार किया जाता है और  40-45 रूपए लीटर मिलता है। इन दोनों में गंध और प्रकृति की समानता होती है, इसलिए प्रयोगशाला के बिना इनकी पहचान करना मुश्किल है। इसी बात का फायदा अवैध शराब के कारोबारी उठाते हैं। वे सस्ती मिथाइल अल्कोहल से शराब बनाते हैं, जबकि इसकी जरा सी मात्रा जानलेवा हो सकती है।

मिथाइल अल्कोहल की सबसे ज्यादा आपूर्ति गुजरात से होती है, जहां से टैंकरों में भरकर इसे अलग-अलग राज्यों के रासायनिक कारखानों में भेजा जाता है, लेकिन बीच में ट्रक चालकों से शराब ठेकेदार इन्हें चोरी से खरीद लेते हैं। 2009 के बाद मिथाइल अल्कोहल को केन्द्रीय आबकारी विभाग की निगरानी में एक जगह से दूसरे जगह ले जाने का नियम बना था। इसके सील लगे कंटेनर को आबकारी विभाग के इंस्पेक्टर की निगरानी में ही खोला जाता है। लेकिन इस कड़ाई के बावजूद इसकी हेराफेरी पूरी तरह से रुकी नहीं है। और इसी वजह से अलीगढ़ जैसी घटनाएं घटती हैं। अब इस घटना को चुनावों में भुनाने की तैयारी विभिन्न राजनैतिक दलों ने कर ली है। मृतकों के घर नेताओं के पहुंचने का सिलसिला और मुआवजा, सहायता राशि की घोषणा आदि होने लगे हैं। लेकिन इससे जो जिंदगियां तबाह हो गईं, उन्हें सुधारा नहीं जा सकता। भविष्य में ऐसी त्रासदी न हो, इसके लिए आज सख्ती बरतना जरूरी है। सवाल यही है कि क्या सरकार ऐसा कर पाएगी।

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