चादरें हटाने से सच्चाई छिपनी नहीं, दिखनी है..

चादरें हटाने से सच्चाई छिपनी नहीं, दिखनी है..

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सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें कुछ लोग गंगा किनारे रेत में दफनाई गई लाशों से लाल-पीली चादरें हटाते नजर आ रहे हैं। यह दृश्य दरअसल प्रयागराज के फाफामऊ और श्रृंग्वेरपुर घाट का है, जहां अफ़सरों की मौजदूगी में सफाईकर्मियों से यह काम करवाया गया है। हरेक शव के चारों तरफ जो लकड़ियां गाड़ी गईं थीं, उन्हें भी हटवा दिया गया। एक राष्ट्रीय दैनिक के अनुसार, मीडिया की नजरों से बचने के लिए रविवार की रात कुछ जिम्मेदार अधिकारियों ने फाफामऊ और श्रृंग्वेरपुर घाट का निरीक्षण किया था। उन्हीं के निर्देश पर ही सोमवार की सुबह दोनों घाटों की सफाई करवा कर शवों को ढांकने के लिए उन पर डाले गए कपड़े हटाए गए। ऐसा इसलिए किया गया ताकि कोरोना से हुई मौतों का सच बाहर न आ जाए, न ही यह पता चले कि शव जलाने के बजाय रेत में दफनाए गए हैं।

पिछले दिनों बिहार के बक्सर में अनगिनत लाशें गंगा नदी में बहती हुई दिखाई दी थीं और उसके बाद उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, कानपुर और प्रयागराज में भी वैसे ही नजारे देखने को मिले। कई जगहों पर आवारा कुत्ते और सूअर किनारे आ लगी लाशों को नोचते हुए भी देखे गए। दूसरी तरफ श्मशान घाटों पर जगह न बचने के कारण शवों के दाह संस्कार करने के बजाय उन्हें नदी किनारे दफना दिया गया। बहुतेरे मामले ऐसे भी थे जिनमें या तो दाह संस्कार के लिए लकड़ियां नहीं थीं या फिर मृतक के परिजन उनके दाम चुकाने में सक्षम नहीं थे। गंगा किनारे घाटों पर स्थिति ऐसी हो गई कि और लाशें दफनाने की गुंजाईश ही नहीं बची। कुछ शव तो आसपास के खेतों में भी दफना दिए गए। उप्र सरकार इन खबरों से हड़बड़ा कर जागी और लाशों को नदियों में बहाने और रेत में दफनाने पर उसने पाबंदियां लगा दीं।

इन हालात का संज्ञान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी लिया और उसने केन्द्र, बिहार एवं उप्र की सरकारों को कोरोना मृतकों की गरिमा और मानव अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए नोटिस जारी किए। आयोग ने कहा कि यह एक मान्य कानूनी स्थिति है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 से प्राप्त जीवन, उचित व्यवहार एवं गरिमा के अधिकार केवल जीवित व्यक्तियों पर ही नहीं, बल्कि मृत शरीरों पर भी लागू होते हैं। मृतकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए विशेष कानून बनाने की बात भी आयोग ने कही है। पोस्टमार्टम में अनावश्यक विलंब न हो, अंतिम भुगतान तक अस्पताल में शव को जबरदस्ती रोके न रखा जाए, परिजनों के आग्रह पर शव परिवहन की सुविधा उपलब्ध करवाई जाए, मनमाने एम्बुलेंस शुल्क पर रोक लगाई जाए, अस्थायी शमशान स्थापित किए जाएं- ऐसी तजवीज आयोग ने सरकारों से की है।

आयोग की सलाह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कोरोना मृतकों को वास्तव में अपेक्षित सम्मान नहीं मिल रहा है। उनके शव कहीं कचरा गाड़ी में ढोए जा रहे हैं, कहीं एक ही शव वाहन में के ऊपर एक लाशें रखी जा रही हैं और कहीं पुराने टायर और पेट्रोल या घासलेट से उन्हें जलाया जा रहा है। संघ और भाजपा की भी इस बात को लेकर किरकिरी हुई है कि हिन्दू हितैषी होने के उनके दावे के बावजूद हिन्दू मृतकों का क्रियाकर्म कायदे से नहीं हो रहा है। इस आलोचना और आयोग के नोटिस के बाद भी उप्र सरकार के नुमाइंदे लीपापोती कर रहे हैं। गंगा घाटों के आसपास रहने वाले लाशों की आमद देखकर हैरान हैं और प्रयागराज प्रशासन उन्हें कोरोना मरीजों का शव मानने से इनकार कर रहा है। शवों को दफनाने को वह पुराना रिवाज भी बता रहा है, जबकि शवों के आसपास पड़ी दवाईयां सच्चाई बयान कर रही हैं। 

प्रयागराज के पुलिस महानिरीक्षक केपी सिंह ने भी कह दिया कि कोविड मरीजों के शवों का अंतिम संस्कार श्मशान घाट में किया जा रहा है। इस बीच गंगा के बढ़ते जल स्तर और तेज हवाओं के कारण रेत हटने से शव बाहर आने लगे हैं और नगर निगम कर्मचारी उन्हें बालू से ही वापस ढंकने की या फिर दूसरी जगह दफनाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। यह स्थिति प्रदेश में और जगहों पर भी है। लखनऊ के सबसे बड़े श्मशान घाट को पहले ही टीन की ऊंची चादरों से घेरा जा चुका है ताकि लोगों को मालूम न हो कि भीतर कितनी चिताएं जल रही हैं। अब प्रयागराज में दफनाए गए लोगों की कब्रों से चादरें हटाई जा रही हैं, जबकि हकीकत तो पहले ही उजागर हो चुकी है। उत्तर प्रदेश सरकार अपनी छवि बचाने या सुधारने की कितनी भी ऐसी कवायद कर ले, इनसे जग हंसाई के अलावा उसे कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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