Home गौरतलब रामदेव खुद और खुदके दावों के शीघ्रपतन का तो इलाज़ करे..

रामदेव खुद और खुदके दावों के शीघ्रपतन का तो इलाज़ करे..

-सुनील कुमार॥

हिंदुस्तान की इन दिनों की खबरों में रामदेव अचानक धूमकेतु की तरह आया और छा गया। पिछले महीनों में कभी-कभी रामदेव के उटपटांग दावे, फर्जी बातें, और अपनी दवाओं के बाजार बढ़ाने की दिखती हुई हरकतें ऐसी थीं, जिन्होंने कई दिनों तक खबरों पर कब्जा करके रखा। लेकिन अब बात उससे आगे बढ़ गई। अब रामदेव ने आयुर्वेद और एलोपैथी के बीच बहस छिड़वा दी है। यह शास्त्रार्थ कुछ अधिक बड़ा हो गया है, और इसमें एलोपैथी डॉक्टरों का देश का सबसे बड़ा संगठन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी सामने आया है जिसके डॉक्टर आए दिन देश में कहीं ना कहीं कोरोना मरीजों का इलाज करते हुए मारे जा रहे हैं।

खबरें जो कि ऑक्सीजन की कमी, वैक्सीन की कमी, इंजेक्शनों की कमी, तमाम चीजों की कालाबाजारी, दुनिया के छोटे-छोटे कमजोर और गरीब देशों से भारत को आ रही मदद से भरी हुई थीं, और गंगा तट पर रेत में दफनाए गए हजारों लोगों की तस्वीरें दिल दहला रही थीं। ऐसे में खबरों को एक रामदेव ने पूरी तरह अपनी तरफ मोड़ लिया और देश के लोगों के बीच हिंदूवादी, राष्ट्रवादी, भगवावादी लोग आयुर्वेद के रामदेव ब्रांड के साथ एकजुट हो गए हैं। रामदेव की कंपनी का मालिक बालकृष्ण इसे रामदेव की नहीं, बल्कि आयुर्वेद की आलोचना करार देते हुए देश में एलोपैथी के रास्ते ईसाईकरण का आरोप लगाने लगा। तो अब यह एक नया विवाद जुड़ गया है कि क्या एलोपैथी हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाने का षडय़ंत्र है? इसके हिसाब से तो एलोपैथी के कैंसर सर्जन प्रवीण तोगडिय़ा को भी विश्व हिंदू परिषद का काम करने के बजाए किसी ईसाई मिशनरी का काम करना था क्योंकि वे तो पेशेवर एलोपैथिक सर्जन रहे, और उन्होंने भी कभी यह आरोप नहीं लगाया कि एलोपैथी लोगों को ईसाई बना रही है। फिर देश के तकरीबन हर बच्चे ने पोलियो ड्रॉप लिए हुए हैं जो कि एलोपैथी के मार्फत बनी हुई वैक्सीन है, और उस हिसाब से तो हिंदुस्तान में कोई हिंदू आबादी बचना ही नहीं था और हर बच्चे को ईसाई हो जाना था, लेकिन वह भी नहीं हुआ। अब सवाल यह है कि खबरों का सैलाब जिन मुद्दों को लेकर चल रहा था उन मुद्दों को एकदम से मटियामेट करते हुए जो नया एजेंडा मीडिया को थमा दिया गया है और टीवी की तमाम बहसों में पर्दे का आधा हिस्सा भगवा हो गया है और बाकी आधे हिस्से में दूसरे डॉक्टर आ गए हैं। हिंदुस्तान की हजारों बरस पहले की आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति आज रामदेव के हाथों में थमा दी गई है, कि मानो रामदेव ने ही पतंजलि के कारखाने में इस चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है। चिकित्सा पद्धति को धर्म से जोड़ देना धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़ देना राष्ट्रीयता को एक रंग दे देना और कुल मिलाकर यह साबित करने का एक सिलसिला चल रहा है कि जो-जो रामदेव को पसंद नहीं कर रहे हैं वह सब गद्दार देश को ईसाई बनाने पर आमादा हैं, वे हिंदुस्तान की संस्कृति, इतिहास, और गौरव का अपमान करने में लगे हुए लोग हैं।

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस बात को लिखा है कि यह सब कुछ बहुत अनायास नहीं हो रहा है, इसे सोच-समझ कर किया जा रहा है और देश के बुनियादी मुद्दों की तरफ से ध्यान को भटकाने के लिए, चर्चा को दूसरी तरफ मोडऩे के लिए किया जा रहा है। अब अगर देखें तो हकीकत में कुछ ऐसा ही होते दिख रहा है, आज देश भर के टीकाकरण केंद्र सूख गए हैं, किसी के लिए कोई टीके बचे नहीं हैं, न सरकारों के पास, न बाजार में, न कारखानों में। और जिन विदेशी वैक्सीन कंपनियों की तरफ केंद्र सरकार ने हिंदुस्तानी प्रदेशों को धकेल दिया है, उन्होंने राज्य सरकारों से सौदा करने से मना कर दिया है। ऐसी भी बात नहीं कि केंद्र सरकार के जानकार अफसरों को पहले से इस बात की जानकारी नहीं थी, लेकिन ग्लोबल टेंडर बुलाकर, कंपनियों से बात करके, इस जानकारी को उन कंपनियों से पाने में राज्य सरकारों का एक-दो महीने का वक्त तो निकल ही गया, जो बात पहले से केंद्र सरकार की फाइलों में दर्ज थी । बात महज वक्त की रहती है, जब लोगों की भावनाएं भडक़ी हुई हैं, लोग उत्तेजित हैं, लोगों के मन में सरकार के खिलाफ आक्रोश है, उस वक्त लोगों को कभी कंगना थमा दिया जाए, तो कभी रामदेव की बूटी से राष्ट्रवाद का आत्मगौरव खड़ा कर दिया जाए, और अब तो सबसे चार कदम आगे बढक़र तथाकथित आचार्य बालकृष्ण ने एक नया आविष्कार किया है कि एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाने की साजिश है। अभी इतनी बड़ी साजिश को देखते हुए जो धर्मालु हिंदू लोग हैं, उनको तो इस महामारी के बीच भी एलोपैथी का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इससे तो उनका धर्म ही खतरे में पड़ जाएगा। और यह बात भी बड़ी अजीब है कि आजादी के बाद के इन 70-75 वर्षों में यह पहला ही मौका है जब हिंदू इतने अधिक खतरे में हैं। जब ईसाई महिला से शादी करने वाले राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, और ईसाई महिला को बहू मंजूर करने वाली इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं, तब भी देश के हिंदू इतने खतरे में नहीं थे कि तकरीबन पूरी आबादी के ईसाई हो जाने का एक खतरा रहा हो। लेकिन आज तो हालात बहुत भयानक हैं, आज तो देश की पूरी हिंदू आबादी खतरे में हैं क्योंकि पूरी हिंदू आबादी को कोरोना वैक्सीन लगाने की बात की जा रही है, जो कि एलोपैथी ने बनाई है, कोरोना का इलाज जो चल रहा है वह भी एलोपैथी से ही हो रहा है, केंद्र सरकार के तमाम अस्पताल, राज्य सरकारों के सारे अस्पताल केवल एलोपैथी का इस्तेमाल कर रहे हैं। तो बकौल तथाकथित आचार्य बालकृष्ण इस देश और इसके प्रदेशों की सारी सरकारें लोगों के ईसाईकरण की साजिशों में लग गई हैं ! इतने खतरे में तो हिंदू इसके पहले कभी नहीं थे।

आज इस किस्म की जो चर्चाएं खबरों और सोशल मीडिया के ऊपर खूब सारे भगवा पतंजलि गोबर की तरह फ़ैलकर बिखर गई हैं कि नीचे न वैक्सीन की कमी के आंकड़े दिख रहे, न रेत में दबी लाशें दिख रहीं। यह पूरा सिलसिला जनधारणा को बुनियादी मुद्दों से हटाकर पाखंडी मुद्दों की ओर ले जा रहा है, उन्हीं में उलझाकर रख रहा है और उसके अलावा किसी और को बात पर सोचने के लिए लोगों को मजबूर करना इसे बंद ही कर दिया है। अब यह लोगों को सोचना है कि सरकार की हर परेशानी के वक्त पर ऐसे मुद्दे निकलकर क्यों आते हैं? क्यों टूलकिट जैसा मुद्दा आता है? क्यों देश भर में यह संदेश फैलता है कि यह टूलकिट मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस की बनाई हुई है, या कांग्रेस को बदनाम करने के लिए मोदी सरकार के मंत्रियों की यह साजिश है? हर दो-चार दिन के भीतर कोई ना कोई ऐसा एक मुद्दा आ रहा है जो दो-चार दिन छा रहा है. कल से सोशल मीडियाजीवी लोग दहशत में हैं कि क्या ट्विटर, फेसबुक हिंदुस्तान में बंद हो रहे हैं! अब यह लोगों को सोचना है कि उनकी बुनियादी जरूरत क्या है उन पर कौन से बुनियादी खतरे छाए हुए हैं, यह उन्हें सोचना है।

यह बात तय है कि रामदेव के खड़े किए हुए विवादों की और उसके खड़े किए हुए दावों की जिंदगी आसमान से गिरते धूमकेतु से अधिक नहीं होती। रामदेव के दावे शीघ्रपतन के शिकार रहते हैं, और इसका इलाज वह अपनी तमाम दवाओं से भी नहीं कर पाया है. यह वही आदमी है जो 35 रुपये लीटर में पेट्रोल दिलवाने वाला था, 35 रुपये में डॉलर दिलवाने वाला था, हर खाते में विदेश से लाए गए काले धन से 15 लाख रुपए दिलवाने वाला था, और यह तमाम बातें इसने रजत शर्मा की अदालत में हलफनामे पर कही थी, जिसके वीडियो अभी भी चारों तरफ फैले हुए हैं। तो ऐसा व्यक्ति आज आयुर्वेद को लेकर दावे कर रहा है, ऐसा व्यक्ति बिना किसी भी पद्धति का चिकित्सक रहे हुए हिंदुस्तान की सबसे अधिक प्रचलित, इस्तेमाल में आ रही, और जान बचाने वाली एलोपैथिक पद्धति के ऊपर सवाल खड़े कर रहा है। लोगों को यह सोचना है कि क्या एक पाखंडी कारोबारी अपने दम पर इतना कुछ कर रहा है या इस मौके पर उसकी इस बकवास के पीछे कोई और ताकतें हैं और इस बकवास से वह कुछ लोगों की मदद कर रहा है?

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