रामदेव यानि बंदर के हाथ में उस्तरा..

रामदेव यानि बंदर के हाथ में उस्तरा..

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देश और दुनिया को भारत की प्राचीन योग विद्या सिखाते हुए रामदेव ने बहुत प्रसिद्धि पाई। योग के शिविर जगह-जगह लगाते हुए और कुछ टीवी चैनलों के जरिए घर-घर तक योग पहुंचाने वाले रामदेव ने धीरे-धीरे इतनी शोहरत पाई कि फिर उनके शिविर लगाने के लिए राज्यों में होड़ लगने लगी। आज से एक-डेढ़ दशक पहले आलम ये था कि जिस राज्य में रामदेव का शिविर लगता, वहां के मुख्यमंत्री, मंत्री, अधिकारी, बड़े व्यापारी सब अपनी उपस्थिति दर्ज कराते। धीरे-धीरे ये पहुंच फिल्मी सितारों तक हो गई। सत्ता, ग्लैमर, और धन के साथ भारत की प्राचीन विद्या का एक खतरनाक कॉकटेल तैयार हो चुका था, जिसके घूंट धीरे-धीरे समाज को पिलाए जा रहे थे। अब इस कॉकटेल के नशे में भारतीय समाज का बड़ा हिस्सा आ चुका है और अब इसका साइड इफेक्ट भी समझ आने लगा है कि दरअसल योग के बहाने हिंदुत्व की राजनीति का एक नया हथियार तैयार कर लिया गया है।

योग सिखाते-सिखाते रामदेव ने राजनीति और व्यापार की दुनिया में साथ-साथ प्रवेश किया। एक ओर उनकी पतंजलि योगपीठ का विस्तार दिन दूनी रात चौगुनी गति से होने लगा। पतंजलि ब्रांड के अंतर्गत न केवल आयुर्वेदिक दवाइयां बल्कि टूथपेस्ट, साबुन, शैंपू, आटा, नूडल्स, बिस्किट, तेल, यानी घर-गृहस्थी के काम आने वाली हरेक चीज बिकने लगी। इनकी गुणवत्ता पर कई बार सवाल उठे, लेकिन उतने ही तेजी से गायब भी हो गए। एक दौर वो भी आया जब नूडल्स के जाने-माने ब्रांड्स को सेहत के लिए इतना खतरनाक बताया गया कि वे बाजार से लगभग गायब हो गईं, उनकी बड़े स्तर पर जांच हुई, लेकिन कुछ दिनों बाद सब सामान्य हो गया। जाहिर है ये सब बाजार की तिकड़मे थीं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बाजार से बेदखल करना आसान नहीं था, लेकिन उन्हें चुनौती देकर एक स्वदेशी कंपनी ने अपना कद बढ़ा लिया, और लोगों को इसमें राष्ट्रवाद का नया पाठ पढ़ाया गया।

रामदेव ने एक ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने अपने व्यापार का जाल बिछाया, दूसरी ओर राजनीति के अपने हुनर दिखाए। यूपीए सरकार को हटाने के लिए खड़े किए गए अन्ना हजारे के आंदोलन को दक्षिणपंथी संगठनों के साथ रामदेव का भी साथ मिला। फिर उन्होंने अपना आंदोलन भी खड़ा करने की कोशिश की। 2014 में मोदी सरकार आई तो अपने कार्यक्षेत्र और विचारधारा के विस्तार के लिए उन्हें समय माकूल लगा। इस दौर में पतंजलि का व्यवसाय बढ़ा, साथ ही प्रमुख खबरों के प्रायोजक के रूप में पतंजलि का नाम ही कई न्यूज चैनलों पर दिखने लगा। कई राष्ट्रवादी, स्वनामधन्य टीवी एंकरों के साथ रामदेव सम-सामयिक मुद्दों पर अपना विशिष्ट ज्ञान देते नजर आए।

इस हालिया इतिहास को इस वक्त  इसलिए दोहराना पड़ रहा है कि क्योंकि रामदेव एक बार फिर खुद को योगगुरु की जगह सर्वज्ञानी मानते दिख रहे हैं। इस बारे में कोई दो राय नहीं कि योग को उनकी तरह आज से पहले किसी ने इस तरह नहीं बेचा, न ही इस तरह आयुर्वेदिक दवाओं का साम्राज्य इतनी जल्दी खड़ा किया है। इस मामले में उनकी व्यापारिक बुद्धि की दाद देनी पड़ेगी। उनके साम्राज्य विस्तार के साथ हिंदुत्व की विचारधारा वाली सत्ता को भी शासन करने में सहूलियत होती है। लेकिन बंदर के हाथ में उस्तरे की तरह अब उसके नुकसान भी दिखने लगे हैं। जब दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिक कोरोना की दवा और वैक्सीन ढूंढने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे, तब रामदेव ने कोरोनिल नामक दवा कोरोना के इलाज के नाम पर बाजार में उतारी थी। इस पर विवाद हुआ, लेकिन पहले की तरह इस बार भी बड़ी चालाकी से उठते सवालों को दबा दिया गया। फिर केन्द्रीय मंत्रियों के साथ रामदेव ने अपनी दवा लॉन्च की, तो इससे पतंजलि के व्यापार को और बल मिला।

सरकार के इस वरदहस्त का ही नतीजा था कि रामदेव लगातार एलोपैथी और आधुनिक मेडिकल विज्ञान पर टिप्पणियां करते रहे। और अब उन्होंने एलोपैथी को बेवकूफी भरा विज्ञान करार दिया, साथ ही कोरोना के इलाज में इस्तेमाल दवाओं पर सवाल उठाए। निजी तौर पर वे किसी चीज के बारे में चाहे जो राय रखें, लेकिन उन्हें कोई हक नहीं बनता कि वे इस तरह एक ऐसी चिकित्सा पद्धति पर आधारहीन बयान दें, जिसके जरिए करोड़ों लोगों का इलाज होता है। कोरोना मरीजों के इलाज में हजारों डाक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों ने अपना जीवन दांव पर लगाया है, रामदेव के बयान से उनका भी अपमान हुआ है। कोई और व्यक्ति इस तरह की हिमाकत करता तो अब तक शायद उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो जाती। लेकिन रामदेव के बयान पर सरकार ने महज ऐतराज से काम लिया और रामदेव ने भी अपना बयान वापस ले लिया। और इस गुस्ताखी पर इतनी ढिलाई का परिणाम ये निकला कि अब रामदेव ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन से 25 सवाल पूछे हैं, जिसमें ब्लडप्रेशर से लेकर डायबिटीज और पार्किन्सन जैसी बीमारियों के बारे में पूछा गया है कि क्या ऐलोपैथी इनका स्थायी इलाज देती है।

रामदेव के इन सवालों से विवाद उठना स्वाभाविक है और इससे उन्हें जो चर्चा मिलेगी, उसके फायदे भी स्वाभाविक हैं। आईएमए को इस तरह के सवालों के जवाब देकर कतई रामदेव की उलजुलूल बयानबाजी को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। शास्त्रार्थ हमेशा बराबर की क्षमता वालों में ही होना चाहिए। वैसे अब सरकार को ये सोचना चाहिए कि हिंदुत्व की लकीर बड़ी खींचने के चक्कर में कहीं सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रही। कोरोना की दूसरी लहर में देश की स्वास्थ्य क्षमताओं ने सरकार को पहले ही शर्मिंदा किया है, अब उसकी शर्मिंदगी के कारण और न बढ़ें, इसका उपाय सरकार को करना होगा।

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