तो क्या उत्तरप्रदेश ‘पुलिस स्टेट’ बनेगा.?

तो क्या उत्तरप्रदेश ‘पुलिस स्टेट’ बनेगा.?

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उत्तर प्रदेश पुलिस ने आजमगढ़ के सरायमीर मुहल्ले में रहने वाले यासिर अख़्तर को महज इसलिए गिरफ़्तार कर लिया कि उसने कथित तौर पर फिलिस्तीन के समर्थन में घरों पर झंडा लगाने की अपील फेसबुक पर की थी। हालांकि उसके परिजनों के मुताबिक वह फेसबुक पोस्ट यासिर की अपनी नहीं, बल्कि फिलिस्तीन की ही एक खबर थी, जिसमें गलती से गाजा शब्द छूट गया था। इस गलती का अहसास होते ही यासिर ने उस पोस्ट में जरूरी सुधार करते हुए लिखा कि, गाजा में शुक्रवार को जुमा बाद घर -घर पर और गाड़ी पर फिलिस्तीनी झंडा लहराने की अपील’ और साफ किया कि पहले वाली पोस्ट भारत के लिए नहीं थी। लेकिन इससे पहले ही किसी ने पुलिस को शिकायत कर दी थी।

यासिर के खिलाफ धारा 505 (2) के तहत मामला दर्ज किया गया है। अमूमन यह धारा दो वर्गों के बीच शत्रुता, घृणा या द्वेष पैदा करने या बढ़ावा देने वाले शरारतन या जानबूझ कर दिए बयान पर और इसकी उपधारा धर्म स्थल पर किए जाने वाले अपराध के मामलों में लगाई जाती है। लेकिन यासिर ने ऐसा कुछ नहीं किया। न तो उसने किसी धर्म के बारे में कुछ कहा या लिखा, न ही अपने देश के खिलाफ कोई बात की। एकबारगी यह मान भी लिया जाए कि उसने देश के भीतर फिलिस्तीन के समर्थन में झंडा लगाने की अपील की भी हो तो ऐसा करना किसी धर्म या समुदाय को आहत करना कैसे हो गया, जबकि भारत खुद फिलिस्तीन के साथ खड़ा है और अनगिनत भारतीय भी उसका समर्थन कर रहे हैं।

आजमगढ़ का यह प्रसंग अलग-थलग करके नहीं, बल्कि योगी सरकार में कानून-व्यवस्था के नाम पर अब तक हुई तमाम कार्रवाइयों के साथ ही देखा जाना चाहिए। हाल ही में ग्रेटर नोएडा के मेवला गोपालगढ़ की प्रधान के पति योगेश तालान के खिलाफ पुलिस ने महामारी एक्ट के तहत एफआइआर दर्ज की। उन पर आरोप है कि महामारी से निपटने के सरकारी प्रयासों के विरुद्ध उन्होंने मीडिया में खबर फैलाई कि गांव में मरीजों का इलाज नहीं हो रहा है और वे झोलाछाप डॉक्टर से नीम के पेड़ के नीचे अपना इलाज करवा रहे हैं। जबकि तालान का कहना है कि उन्होंने गांव की स्वास्थ्य सुविधाओं में कमियां बताईं थीं और ग्रामीणों की कोरोना जांच की मांग की थी, लेकिन यही उनका गुनाह बन गया।

गुंडागर्दी ख़त्म करने की आड़ में अंधाधुंध एनकाउंटर, लव जिहाद,धर्मांतरण और गौ तस्करी के फ़र्जी मामलों में गिरफ़्तारी, नागरिकता कानून का विरोध करने वालों पर मुकदमे, लॉकडाउन के दौरान घर लौटते मजदूरों को खाना देने वालों पर पुलिसिया कहर, सोशल मीडिया पर कोरोना पीड़ित मरीजों के लिए मदद की गुहार लगाने वालों पर कार्रवाई – एक लम्बी फेहरिस्त है जिससे साफसमझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में लोगों -खास तौर पर अल्पसंख्यकों और अपने विरोधियों को डराने-धमकाने और उनकी आवाज दबाने के लिए कितनी बेशर्मी से पुलिस का इस्तेमाल किया जा रहा है। शायद ही किसी और राज्य में पुलिस को लेकर इतनी सुर्खियां बन रही हों, जितनी कि उत्तर प्रदेश में।

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश-प्रदेश में कानून का राज होना ही चाहिए, पर यह भी जरूरी है कि सरकार का इकबाल भी बुलंद हो। लेकिन जिस व्यक्ति ने मुख्यमंत्री बनने से पहले कानून का भरपूर अनादर किया हो और मुख्यमंत्री बनते ही अपने खिलाफ दर्ज सारे मामले वापस ले लिए हों, वह बात-बेबात अपने ही सूबे के लोगों पर मुकदमे लादता चला जाए और पुलिसिया डर दिखाकर राज करना चाहे, तो उसकी कमजोरी ही उजागर होती है। दूसरा विरोधाभास यह भी है कि उप्र में जगह-जगह धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर सत्ता के समर्थकों ने कानून अपने हाथ में लिया, समुदाय विशेष के लोगों को प्रताड़ित किया, उनकी मॉब लिंचिंग भी कर डाली, लेकिन सरकार ऐसी हर घटना पर खामोश रही आई।

पुलिस के ऐसे बेजा इस्तेमाल से आशंका होती है, कि क्या उत्तर प्रदेश ‘पुलिस स्टेट’ बनने के रास्ते पर है! यदि ऐसा है तो याद रखा जाना चाहिए कि हर चीज की अति बुरी होती है। एक समय ऐसा आएगा, जब लोग पुलिस के डंडे से डरना बंद कर देंगे। यूं भी प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव की हलचल शुरू हो चुकी है। पुलिस के जरिए लोगों को सबक सिखाने की कवायद सत्ताधारी दल को भारी पड़ सकती है।

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