Home गौरतलब मुक्तिदाता मोदीजी बनाम बहुरूपिया वायरस..

मुक्तिदाता मोदीजी बनाम बहुरूपिया वायरस..

– सर्वमित्रा सुरजन॥

वैसे सरकार ये तो बता रही है कि कोरोना संक्रमण के आंकड़े कम हुए हैं, लेकिन मौतों के आंकड़े अब भी 4 हजार के आसपास ही हैं। हालांकि ये भी आधा-अधूरा सच ही है। क्योंकि जिस तरह गंगा नदी के किनारे दफ्न लाशें मिल रही हैं, जिस तरह नदियों में शव बहते नजर आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि रोजाना हो रही मौतों के आंकड़े 4 हजार से कहीं ज्यादा है।

कोरोना की दूसरी लहर देश में तबाही मचा रही है, लेकिन सत्ताधारी भाजपा अब भी अपनी जिम्मेदारी लेने से बच रही है। हाल ही में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बयान दिया था कि कोरोना वायरस भी एक प्राणी है। उसे भी जीने का अधिकार है। हमने उसे खत्म करने के लिए वैक्सीन बनाई तो उसने अपने फैलने की ताकत बढ़ा ली। उनके मुताबिक वायरस बहुरूपिया बनकर सामने आ रहा है। श्री रावत ने जीने के अधिकार की जिस दार्शनिक अंदाज में व्याख्या की, दरअसल वह भाजपा की आम जनता के लिए बढ़ती संवेदनहीनता और अपनी जिम्मेदारी को टालने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है। इस सरकार को कोरोना वायरस शायद अब तक अपना विरोधी नजर नहीं आया है। अगर ऐसा होता तो उसे खत्म करने की पुरजोर कोशिश सरकार कर चुकी होती।

वैसे त्रिवेन्द्र सिंह रावत जिस तरह कोरोना वायरस को बहुरूपिया बता रहे हैं, कुछ वैसा ही हाल मोदी सरकार का भी है, जो अपनी नाकामी छिपाने के लिए, नित नए रूप धर रही है। कभी मोदीजी मास्क लगाकर गंभीर मुद्रा में उच्चस्तरीय बैठकें करते नजर आते हैं। कभी वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों और अपनी सरकार के अधिकारियों को निर्देश देते हैं। कभी अदालतों में सरकार हलफनामे पेश करती नजर आती है। कभी जनता को ये समझाने की कोशिश होती है कि सरकार एक्शन में है। सरकार का ये तथाकथित एक्शन वाला रूप विरोधियों पर ही नजर आता है। क्योंकि जमीनी स्तर पर तो कोरोना के हालात सुधर ही नहीं रहे हैं।

इस वक्त देश में कोरोना संक्रमण के मामले कम होते बताए जा रहे हैं। जाहिर है इसमें भी सरकार अपना फायदा देख रही है। सरकार को हमेशा ही सातवें आसमान में चढ़ाने वाले पत्रकार कम होते आंकड़ों के बूते अब ये ढिंढोरा पीटेंगे कि देश में तीसरी लहर आने से पहले ही मोदीजी ने उसे रोक दिया। मानो मोदीजी न हुए, कोई जादूगर हो गए, जो हथेली पर फूंक मारकर हवाओं का रुख बदल देते हैं। अब ये सोचने वाली बात है कि देश इस सम्मोहन से पहले खुशहाल था या अब उसे खुशी मिल रही है। अगर संघ और संघ में दीक्षित नेताओं की बात मानें तो मौत ही असली खुशी है, क्योंकि वो जीवन से मुक्ति देती है। कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर कुछ दिनों में मोदीजी को देश का मुक्तिदाता घोषित कर दिया जाएगा। और हद दर्जे के चाटुकार ये भी कह सकते हैं कि मुक्तिदाता मोदीजी तो डार्विन के सिद्धांत सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट यानी योग्यतम की उत्तरजीविता का ही व्यावहारिक रूप दिखा रहे हैं। वैसे सरकार ये तो बता रही है कि कोरोना संक्रमण के आंकड़े कम हुए हैं, लेकिन मौतों के आंकड़े अब भी 4 हजार के आसपास ही हैं। हालांकि ये भी आधा-अधूरा सच ही है। क्योंकि जिस तरह गंगा नदी के किनारे दफ्न लाशें मिल रही हैं, जिस तरह नदियों में शव बहते नजर आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि रोजाना हो रही मौतों के आंकड़े 4 हजार से कहीं ज्यादा है।

सोशल मीडिया पर पहले लोगों के बधाई संदेश देख-देखकर ऊब होती थी। लगता था कि अपना जन्मदिन हो या बेटे-बेटी का, या विवाह की सालगिरह हो या बच्चों का परीक्षा परिणाम अच्छा हो, उसकी खुशी जिसे होगी, वो अपने आप बधाई दे देगा। उसके लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर प्रचार करने की क्या जरूरत। और अब रोजाना श्रद्धांजलियों के इतने पोस्ट होते हैं कि उनके बीच किसी का जन्मदिन या वैवाहिक वर्षगांठ पर बधाई संदेश देखकर खुशी होती है कि इतने निराशा भरे अंधकार में भी कुछ लोगों के पास खुशियों के पल जीने का अवकाश बाकी है। इस कोरोना काल ने जीवन के क्षणभंगुर होने के प्राचीन सबक को एक बार नए सिरे से याद दिलाया है। लेकिन सबक सिखाने का यह तरीका बेहद क्रूर है और उतना ही क्रूर है सरकार का व्यवहार।

इंसान देश में कीड़े-मकौड़ों की तरह मर रहा है। सम्राट अशोक को तो कलिंग विजय के बाद क्षत-विक्षत लाशों के ढेर देखकर अपने किए पर पछतावा हुआ। वे बौद्ध धर्म की शरण में गए, शांति और अहिंसा का पाठ सीखा और उसके बाद का शेष इतिहास सभी को ज्ञात है। क्या मोदीजी से ऐसे हालात में जनता के लिए करुणा की उम्मीद नहीं की जा सकती । या फिर ये उम्मीद भी अच्छे दिनों की उम्मीद की तरह खोखली साबित होगी। वैसे सरकार जानती है कि जनता को कैसे बरगलाया जाता है।

इसलिए इन अकाल मौतों के लिए कभी जनता की लापरवाही, कभी कांग्रेस की कथित टूलकिट को जिम्मेदार बताया जा रहा है या फिर उन विपक्षी नेताओं को, भाजपा की असीम सकारात्मकता के खिलाफ सच दिखाकर नकारात्मकता फैला रहे हैं। इसलिए कभी पप्पू यादव, कभी श्रीनिवास बी वी, तो कभी सरकार विरोधी पोस्टर चिपकाने वालों पर कानूनी कार्रवाई होती है। जनता इन कार्रवाईयों की पेचीदगियों में उलझ जाती है और सरकार को फिर अपनी जिम्मेदारी से बरी होने का मौका मिल जाता है।
काशी का न्याय में श्रीकांत वर्मा ने लिखा है-

सभा बरखास्त हो चुकी, सभासद चलें
जो होना था सो हुआ, अब हम, मुंह क्यों लटकाए हुए हैं?
क्या कशमकश है?, किससे डर रहे हैं?
फैसला हमने नहीं लिया –
सिर हिलाने का मतलब फैसला लेना नहीं होता
हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया
बहसियों ने बहस की, हमने क्या किया?
हमारा क्या दोष?
न हम सभा बुलाते हैं, न फैसला सुनाते हैं
वर्ष में एक बार, काशी आते हैं –
सिर्फ यह कहने के लिए
कि सभा बुलाने की भी आवश्यकता नहीं
हर व्यक्ति का फैसला, जन्म के पहले हो 
चुका है।

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