Home गौरतलब अन्ना, संघ, मीडिया और चंद उद्योगपतियों का काकस

अन्ना, संघ, मीडिया और चंद उद्योगपतियों का काकस

-पवन सिंह॥
अन्ना हजारे ने भारत में जनांदोलनों की साख को जो गहरी चोट दी है। भविष्य में होने वाले किसी भी जनांदोलन से आम जनता खास कर युवावर्ग अपने को फिर कैसे जोड़ पाएगा यह एक महत्वपूर्ण विषय है और इसका उत्तर समय के गर्भ में है। लेकिन यह सच है कि संघ, मीडिया, नेता और चंद उद्योगपतियों व अन्ना हजारे के गठजोड़ ने देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को पूरी तरह से धूलधूसरित कर दिया है। मेरा मानना है कि आर्थिक नुकसान की भरपाई तो हो जाया करती है लेकिन वैचारिक स्तर पर जो नुकसान इस गठजोड़ की वजह से देश को हुआ है, उसकी कीमत पीढ़ियों को चुकानी होगी।
‌‌अन्ना हजारे को एक मोहरे की तरह भारतीय राजनीति की बिसात पर खड़ा किया गया। बड़े ही शातिराना तरीके से एक बड़ी रकम चंद उद्योगपतियों से पैसा जुटाकर मीडिया के भीतर टाप लेबल पर मालिकानों को खरीदा गया और तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान कुछ तथाकथित भ्रष्टाचार जैसे टूजी स्पेक्ट्रम, कोल आवंटनों को इस तरह से प्रचारित व प्रसारित किया गया कि अब देश लुट चुका है। सोशल मीडिया सेक्टर में लाखों की संख्या में फेंक एकाउंट बनाकर छद्म राष्ट्रवाद का एक ऐसा मायाजाल बुना गया कि लगा अब देश नहीं बचेगा। मीडिया कैसे खरीदा गया इसे कोबरा पोस्ट के एक बड़े पत्रकार पुष्प रंजन ने अपने स्टिंग ऑपरेशन में खोला है और इसका पूरा विवरण मैं अपनी चर्चित पुस्तक “पत्रकारिता की शवयात्रा” में कर चुका हूं। हालांकि, अब यह किसी से छिपा नहीं है कि टूजी और कोल आवंटन में अरबों-खरबों रुपए के जिस तथाकथित घोटाले का जो नगाड़ा बजाया गया था, वह अन्ना, संघ, मीडिया और चंद उद्योगपतियों का एक षड़यंत्रकारी संयुक्त ब्लास्ट था, जिसने इस देश की राजनीति की दशा और दिशा ही बदल दी। एक बड़े राजनैतिक दल सहित देश के तमाम अन्य राजनैतिक दलों के खिलाफ जनमानस में एक अवधारणा बनाई गई कि सारे दल चोर हैं, एक “वही” राष्ट्रवादी दल है जो पाक-साफ है और देश को वही बचा सकता है। इसके बाद युवाओं को टारगेट किया गया और धर्म विशेष पर योजनाबद्घ तरीके से हमला किया गया कि हिंदुत्व खतरे में है। इसके समानांतर करोड़ों रोज़गार देने का ऐसा शिगूफा फेंका कि लोग उलझते चले गए।
इस पूरे खेल को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। दिल्ली के दो बड़े जनांदोलनों का जिक्र करूंगा। एक था-
जन लोकपाल विधेयक (नागरिक लोकपाल विधेयक) के लिए और दूसरा था-निर्भया केस। दिनांक 5 अप्रैल,2011 को समाजसेवी अन्ना हजारे वह उनके साथियों ने जंतर-मंतर पर अनशन शुरू किया। जिनमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल, भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध लोकधर्मी वकील प्रशांत भूषण, पतंजलि योगपीठ के संस्थापक बाबा रामदेव आदि शामिल थे। इस पूरे आंदोलनों को देश के सभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अंतरराष्ट्रीय स्तर का बना दिया। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवाओं ने शिरकत की। इस आंदोलन के पीछे एक बड़ा संगठन काम कर रहा था। इस संगठन का नाम है RSS…खैर! लोकसभा बिल को राज्यसभा ने 17 दिसंबर को पारित किया था और अगले दिन यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया था। भाजपा जो इस लोकपाल बिल को बहुत ज्यादा सशक्त और कठोर बनवाने के लिए छाती पीट रही थी, वही सत्ता में आने के बाद इस बिल की मारक क्षमता को बढ़ाने की बात तो दूर, इसे खा-पीकर हजम कर गई।‌ एक विपक्ष के नेता ने लोकपाल को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 18 दिसंबर 2013 को किए ट्वीट के स्क्रीनशॉट को भी पोस्ट किया है। इसमें पीएम मोदी ने ट्वीट किया था, ”मुझे बहुत गर्व है कि लोकपाल बिल पास कराने में सुषमा स्वराज और अरुण जेटली के नेतृत्व में बीजेपी सासंदों ने सकारात्मक और सक्रिय भूमिका निभाई है।”
एकमेव राष्ट्रवादियों को सत्ता तो मिल गई लेकिन चार साल तक “लोकपाल बाबू” गायब रहे‌। पीएम मोदी और बीजेपी पर तंज करते हुए लोकसभा में विपक्ष ने कहा— ”बीत गए चार साल, नहीं आया लोकपाल. जनता पूछे एक सवाल, कब तक बजाओगे ‘झूठी ताल’?” पीएम मोदी और बीजेपी नेता तो लोकतंत्र के रक्षक और जवाबदेही सुनने के अग्रदूत हैं लेकिन लोकपाल के मुद्दे पर ऐसा कन्नी काटते हैं जैसे चोर पुलिस को देखकर किसी न किसी गली में सटक लेता है।
इसके बाद 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया केस हुआ। इस पूरे आन्दोलन को संघ का अप्रत्यक्ष समर्थन था और मेन स्ट्रीम मीडिया को इतना पैसा किसी न‌ किसी रूप में मिलने लगा था कि उसने इस घटना को अंतरराष्ट्रीय ऊंचाई दी। चूंकि लोकतांत्रिक मूल्यों वाली सरकार थी लिहाजा संसद भवन तक भी लोग पहुंच सके। इस घटना के बाद भी इससे जघन्यतम अपराध महिलाओं के साथ हुए। हाथरस ज्वलंत उदाहरण है लेकिन राष्ट्रीय तो छोड़ दीजिए प्रदेश स्तरीय मामला भी नहीं बना। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने वर्ष, 2020 डराने वाले आंकड़े जारी किए हैं। एनसीआरबी के मुताबिक, पिछले साल महिलाओं के खिलाफ 4,05,861 मामले सामने आए। इनमें हर दिन औसतन 87 मामले बलात्कार के हैं। क्या बदला निर्भया केस के बाद से?..उसके बाद आन्दोलन क्यों नहीं हुए? दरअसल सब सत्ता के लिए एक पाखंड था। जिस संस्कृति व सभ्यता को हम लोग भुनाते फिरते हैं उसके दो श्लोक उद्धृत कर रहा हूं— —यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । मनुस्मृति ३/५६ ।।
यत्र तु एताः न पूज्यन्ते तत्र सर्वाः क्रियाः अफलाः (भवन्ति) ।
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं।
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।।
(मनुस्मृति ३/५७)
जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं ,वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सदैव फलता फूलता और समृद्ध रहता है । …..ऐसे में आप‌के हिन्दुत्व के संस्कार एक महिला एक मां को–बारबाला कह कर सुशोभित करते हैं और बलात्कार के बाद एक दलित कन्या को आधी रात में पेट्रोल डाल कर जला देते हैं…….हम लोग तो वो पुराने पाखंडी हैं कि जब तक बाप जिंदा रहता है तब तक तो उसे अपमानित करते हैं, बूढे बाप को खाना तक नहीं देते हैं और मरने के बाद कौआ को बाप बनाकर खाना खिलाते हैं….. इंज्वाय करिए अभी ये देश इससे भी बुरे दौर देखेगा …
फिलहाल! हम लोग दोगला नहीं चौगला कैरेक्टर रखते हैं।‌ जीते कुछ हैं दिखाते कुछ हैं। कहते कुछ हैं करते कुछ हैं। दरअसल हमें धर्म और तथाकथित राष्ट्रवाद के एक ऐसे जहर में फंसाया जा चुका है जहां हम अपनों की लाशें देखकर भी अब नहीं पसीजते। नफरत ने आंखों का पानी इस हद तक मारा है कि जिस हिन्दुत्व को जगाया गया था वही चिताओं, नदियों व खेतों में सड़ रहा है या जल रहा है।‌….उसके बावजूद धर्म मुस्कुरा रहा है…।
अन्ना हजारे ने जनांदोलनों की भारतीय लोकतान्त्रिक परंपरा को जिस तरह से नष्ट किया है उसका असर अब देखिए कि दवाओं/अस्पतालों/आक्सीजन/वैक्सीनेशन पर आंदोलन की बात तो छोड़ दीजिए अब तो सवाल भी उठाना गंवारा नहीं है। हालात यह हैं कि लोग गंगा-यमुना में बहते शवों पर भी यह लिखने-कहने-ट्विट करने से नहीं चूक रहे हैं कि यह गंगा नहीं नाइजीरिया की नदी है।

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