Home मीडिया मीडिया का दुश्मन बना इजरायल..

मीडिया का दुश्मन बना इजरायल..

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने रविवार सुबह एक ट्वीट के जरिए उन तमाम देशों का शुक्रिया अदा किया, जो मौजूदा समय में इजरायल का समर्थन कर रहे हैं। नेतन्याहू ने लिखा- आतंकवादी हमलों के खिलाफ़ आत्मरक्षा के हमारे अधिकार का समर्थन करने और इजराइल के साथ मज़बूती से खड़े होने के लिए आप सभी का धन्यवाद। इस ट्वीट में अमेरिका, फिर अलबेनिया, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, ब्राजील, कनाडा, कोलंबिया, साइप्रस, जॉर्जिया, जर्मनी, हंगरी, इटली, स्लोवेनिया और यूक्रेन समेत कुल 25 देशों का जिक्र नेतन्याहू ने किया है। गनीमत है कि भारत इसमें शामिल नहीं है।

इजरायल और फिलीस्तीन में पिछले कुछ दिनों से हिंसक तनाव चल रहा है, जिसमें प्रत्यक्ष तौर पर पहली कार्रवाई फिलीस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास की ओर से की गई है, लेकिन विद्रोह की दबी हुई राख को कुरेदने और चिंगारी को हवा देने का काम इजरायल ने किया। अब इजरायल अपनी सुविधा से इस हमले को आत्मरक्षा का अधिकार बता रहा है। और इस ओर से आंखें मूंद रहा है कि बरसों-बरस किस तरह फिलीस्तीनियों के अधिकारों का हनन हुआ है। इजरायल के पास आधुनिक हथियारों का जखीरा है, तगड़ा खुफिया तंत्र है, उच्चकोटि के सैन्य और संचार विशेषज्ञ हैं और इन सबके ऊपर अमेरिका की सरपरस्ती है। इन सबके बूते इजरायल को ये गुमान है कि वो अपने अधिकारों के नाम पर किसी भी तरह की हिंसा और क्रूरता करेगा, फिर भी विश्व में उसका रौब कम नहीं होगा।

लेकिन इस बार इजरायल का अतिआत्मविश्वास उस पर भारी पड़ता दिख रहा है। शनिवार को हमास के ठिकानों पर हमले के नाम पर इजरायली सेना ने अल जला नाम की एक 15 मंजिला इमारत को निशाना बनाया।

गजा स्थित इस इमारत में कई लोगों के घर होने के साथ अमेरिकी समाचार एजेंसी द एसोसिएटेड प्रेस और कतर के समाचार चैनल अल-जजीरा के दफ्तर भी थे। हमले में इन दोनों मीडिया संस्थानों के दफ्तर तबाह हो गए, जिसकी अब दुनिया भर में निंदा हो रही है। कई जगहों पर पत्रकारों के संगठन, प्रेस क्लब, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इजरायल की कार्रवाई को गलत करार दिया है।

मीडिया की स्वतंत्रता के लिए काम कर रही कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने आरोप लगाया है कि इजरायली सेना मीडिया के काम को सेंसर करने की कोशिश कर रही है ताकि उसके द्वारा किए जा रहे कथित युद्ध अपराधों के बारे में दुनिया को नहीं बताया जा सके। द एसोसिएटेड प्रेस ने इजरायल के हमले को ‘भयावह और चौंकाने वाला’ बताया है जबकि अल-जजीरा ने कहा है कि इजरायल पत्रकारों को गजा में उनकी ड्यूटी करने से रोक रहा है। इधर इजरायली सेना ने दावा किया कि जिस बहुमंजिला इमारत को उसने गिराया है, जिसमें मीडिया संस्थानों के दफ़्तर और कुछ लोगों के घर भी थे, उसी इमारत में किसी एक माले पर चरमपंथी संगठन हमास की सैन्य ख़ुफया टीम बैठती थी। प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी कहा कि हमास भी उस बिल्डिंग को इस्तेमाल कर रहा था। ये कोई निर्दोष इमारत नहीं थी। सेना ने ये दावा भी किया कि हमास पत्रकारों को मानव-कवच के रूप में भी इस्तेमाल करता रहा है, हालांकि, सेना ने अपने इस दावे को साबित करने वाला कोई सबूत अब तक पेश नहीं किया है।

द एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक उन्होंने इजरायली सेना से कई बार इस हमले को रोकने की अपील की, जिसे सेना ने नहीं माना। इन मीडिया संस्थानों को अपने दफ्तर खाली करने के लिए महज एक घंटे का वक्त सेना ने दिया, जिसमें उनके पत्रकार अपने बेहद जरूरी सामान लेकर बाहर आ सके। पहले से चेतावनी मिलने के कारण कुछ लोगों की जान बच गई, कुछ महंगे उपकरण बाहर निकाल लिए गए, लेकिन इन सबके साथ दर्जनों घर बर्बाद हो गए और तबाह हो गए मानवाधिकार। हमास तो घोषित तौर पर चरमपंथी संगठन है और वह खुलकर फिलीस्तीन की आजादी, वहां के लोगों के अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। लेकिन इजरायल की सरकार राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह की आग को भड़का रही है, वह भी एक किस्म का आतंकवाद ही है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर के मीडिया संस्थानों पर हमले के बाद दुनिया में इजरायल की निंदा हो रही है। लेकिन आलोचना के ये सुर शुरुआती दिनों में ही उठ गए होते, जब मासूम बच्चे भी मारे जा रहे थे, तो आज स्थित इतनी न बिगड़ती। वैसे जिस अमेरिका को बेंजामिन नेतन्याहू ने सबसे पहले साथ देने के लिए धन्यवाद दिया है, वहां भी सत्तारुढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी में इजरायल के समर्थन और विरोध के दो धड़े बंट गए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी में प्रोग्रेसिव गुट के नेता बर्नी सैंडर्स ने साफ कहा कि- ‘अगर अमेरिका विश्व मंच पर मानव अधिकारों के पक्ष में विश्वसनीय आवाज बनना चाहता है, तो उसे मानव अधिकार के अंतरराष्ट्रीय मानकों का हर जगह समर्थन करना चाहिए- उस जगह पर भी जहां ऐसा करना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो।’

काश श्री सैंडर्स की ये नसीहत भारतीय हुक्मरानों को भी सुनाई दे और वह मजबूती से विश्वशांति व मानवाधिकारों के पक्ष में खड़े हो सके।

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