Home मीडिया मरहूम जो रायता फैला गए थे समेटा न जाएगा…

मरहूम जो रायता फैला गए थे समेटा न जाएगा…

-अजीत वडनेरकर॥

दो दिनों में क़रीब दो दर्जन लोगों ने फ़ेसबुक, वाट्सएप और मैसेंजर पर एक वायरल होती ख़बर हमें टैग की जो तीन मई के अख़बार में देश के दर्जन से भी ज़्यादा संस्करणों के इनर जैकेट में पाँच या छह कॉलम में छपी है। यहाँ सिर्फ दो संस्करणों की इमेज लगाई हैं।

खबर कोरोना से जागरुकता के बारे में है। स्वास्थ्य सम्बन्धी कुछ तथ्य हैं। इस पर डॉक्टरों की राय भी है। अखबार के अधिकांश संस्करणों में इस पैकेज को जस का तस छाप दिया गया है। बस, डॉक्टरों के नाम बदल दिए गए हैं यानी कहीं भंडारी को जोशी कर दिया तो कहीं दवे को गोयल। मगर ये सब शब्दशः एक ही बात बोल रहे हैं। यानी कॉमा, फुलस्टॉप, कोलन-सेमीकोलन के साथ।

कहानी की पृष्ठभूमि जानिए
ब्रह्माण्ड के सबसे महान दैनिक में रह चुके एक वरिष्ठ सम्पादक का मानना है-“इसे पाठकों के साथ धोखाधड़ी कहते हैं। निश्चित तौर प्रेस कौंसिल और भारतीय भाषायी समाचार पत्र संगठन अखबारो में पनप रही इस प्रवृत्ति पर स्वतः संज्ञान ले”। मगर हकीक़त ये है कि इन संगठनों में भी मनमानी करने वाले अखबारों के प्रतिनिधि बैठे हुए हैं।

ब्रह्माण्ड का सबसे आत्ममुग्ध अखबार
सृष्टि के इसी अभूतपूर्व प्रकाशन संस्थान में विभिन्न पदों पर काम कर चुके और वर्तमान में बैंकर एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार क्या कहते हैं- “यह ब्रह्माण्ड का सबसे आत्ममुग्ध अखबार है। इसके मालिकान मियाँमिट्ठू बनते रहते हैं। एक ज़माना था जब इन्हें टाटा की साख और अम्बानी का पैसा चाहिए था”।

टाटा की साख और अम्बानी की दौलत चाहिए
बात बिल्कुल सही है। टाटा की साख पाने की चाह में इन्होंने सम्पादकों के लिए थैली खोल दी और अम्बानी जैसा पैसा कमाने के लिए मार्केटिंग के उस्तादों पर पैसा झौंक दिया। हिन्दी अखबार समूह के अग्रणी पदों पर अंग्रेजी अखबारों के वरिष्ठ पत्रकार नियुक्त होने लगे। हिन्दी भाषा और उसे बरतने वाले विशाल समाज की प्रवृत्ति, प्रकृति न समझ पाने की वजह से अखबार में हिन्दी की क़द्र घटती चली गयी। नतीजे में हिंग्लिश जैसा रूप हम सबके सामने है।

चलती-फिरती युनिवर्सिटी

तीन मई के अखबार के ये नमूने पत्रकारिता के उसी माड्यूल से निकले हैं जिसे सामने लाने का सेहरा ‘चलती-फिरती युनिवर्सिटी’ के तौर पर विख्यात एक पूर्व नेशनल एडिटर के नाम बन्धा है जिन्होंने कुछ वर्ष पूर्व अपने जीवन का अन्त कर लिया, हालाँकि अखबार प्रबन्धन ने इसे हार्ट अटैक बताया। तथ्यों के साथ मनमाने खिलवाड़ की यह प्रवृत्ति सेठाश्रित/कार्पोरेट पत्रकारिता की फितरत है।

नेशनल न्यूज़ रूम यानी एनएनआर
संचार तकनीक में आ रहे बदलाव के चलते बाजार में स्पर्धा बढ़ गयी है। कम्यूटर स्मार्टफोन के ज़माने में हर किसी की मुट्ठी में सूचनाएँ हैं। चुटकी बजाते कोई सूचना विश्वव्यापी हो जाती है। स्थिति की तुलना डमरू बजाते मदारी से कर लें या हाट-बाजार में हर माल दस रूपए की हाँक लगाते सेल्समैन से कर लें। नेशनल न्यूज़ रूम यानी एनएनआर की स्थापना इसी कार्पोरेट दबाव के तहत हुई।

पच्चीस लाख रुपए सालाना
ऐसे दौर में दिवंगत सम्पादक को राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारियाँ मिलीं। वे रात दिन मालिकान को आइने में उतारने की तरकीबें सोचते। बात यह है कि इन्हें आज से क़रीब चौदह बरस पहले पच्चीस लाख रुपए सालाना का पैकेज दिया गया। लगभग दो लाख रुपए महीना। मोटे तौर पर पच्चीस हजार महीना कमाने वाले पत्रकार उस दौर में कार रखना शुरू कर चुके थे।

राष्ट्रीय सम्पादक महोदय हर निजी बैठक में इस पैकेज का जिक्र करते। चुनौती के अंदाज़ में कहते- “आप इस पैकेज को हथियाने के लिए क्या कर सकते हैं?”। लम्बे समय तक उन्हें निकट से काम करते देखने का अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार की बात तो जैसे इस पूरे मामले की परतें ही उघाड़ कर रख देती हैं। वे कहते हैं-

मुहर बड़ी चीज़
“हिन्दी में कार्पोरेट एडिटोरियल मैनेजमेंट के प्रमोटर चाहे कोई और हो, मगर हर तरह के फर्जी कंटेंट तैयार करने और नकली प्रयोग शुरु करने वाले महर्षि चरक वे ही थे। उनका मानना था कि मुहर बड़ी चीज़ होती है। अगर नाम बड़ा होगा तो उसका असर ज्यादा होता है। पहले से तैयार किए गए विचार पर बड़े नाम का ठप्पा लग जाए तो माल बिकता है”।

सारा ‘खेला’ था तो पैकेज के लिए ही… और इसी वजह से ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ न्यूजपेपर के नेशनल हैड निरन्तर सुझाव माँगते और देते। … और सुझाव ये होते कि पहले पाजामा सिल लिया जाए, उसके बाद उसके साइज़ की काया तलाश कर उसकी ‘पेरावणी’ की रस्म अदा कर दी जाए।

राष्ट्रीय आत्ममुग्ध मठ के स्वयम्भू आचार्य
और यह होने के बाद राष्ट्रीय आत्ममुग्ध मठ के स्वयम्भू आचार्य भग्नेश जागनिक के पास करने को सिर्फ इतना भर रह जाता कि MD के सामने खबरों का हिसाब किताब रखने वाली मासिक मीटिंगों में ऐसे कारनामों का क्रेडिट वे अकेले लूट लेते। अख़बार को पठनीय से ज़्यादा दर्शनीय बनाने में ही सारी ऊर्जा खर्च करके बस MD की वाहवाही में ‘सारे तीरथ एक साथ’ की अनुभूति करते थे।

खबर को ‘माल’ बनाने का सेहरा
TOI के समीर जैन पर चाहे अखबार को प्रॉडक्ट बनाने की तोहमत आती हो, मगर पत्रकारिता में खबर को ‘माल’ बनाने का सेहरा आत्ममुग्ध सम्पादक के सिर बन्धेगा। यही नहीं, रात की मीटिंग में भी लीड के शीर्षक को आकर्षक बनाने के लिए खेल शब्द का प्रयोग उन्हीं के दौर में शुरू हुआ। शीर्षक के साथ इतनी हाथा-पायी की जाती कि उसके प्राण ही निकल जाते।

किसी मुद्दे पर टॉप एक्सपर्ट का पैनल बना कर उनकी राय लेना और फिर उसके आधार पर खबर बनाना बेशक एक अच्छी सोच है। ऐसा अंग्रजी अखबार करते रहे हैं।

मशीन कसना
मगर आत्ममुग्ध अखबार में इसका तरीका दूसरा है। आला अन्वेषक गूगल से कुछ तथ्य निकालते हैं। फिर उसके आधार पर सजी-सँवरी खबर बनाई जाती है। डॉक्टरों की राय वाले बॉक्स में फोटो की जगह खाली छोड़ दी जाती है। उसमें सामग्री भरी जाती है। फिर किसी जानकार को यह आयोजना दिखाई जाती है। ज़ाहिर है प्रेस के नाम पर रज़ामंद होना ही है। बस इस तरह चेन बनती जाती है।

यह पूरी प्रस्तुति सभी संस्करणों में इस नोट के साथ भेजी जाती है कि स्थानीय विशेषज्ञों को ये पढ़वा दिया जाए। फिर उनकी तस्वीर के साथ अपने संस्करण में जस का तस छाप लिया जाए।

खबर नहीं, भुजिया
मानो खबर न हो, हल्दीराम की बीकानेरी भुजिया हो। जो स्वाद नागपुर में, वही तंजावुर और सिंगापुर में। रैपर में स्थानीय तस्वीर लगा दो। लम्बे समय से इसी अखबार में कार्यरत एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं- “कार्पोरेट संस्कृति यह नहीं समझना चाहती कि किसी भी खबर पर स्थानीय प्रतिक्रिया भिन्न हो सकती है। बीस बरस पहले यहाँ दिल्ली के अखबारों की दिलचस्प खबरें चुनकर, उन्हें नया चोला पहनाने के लिए अलग डेस्क थी” ।

तो तीन मई को छपी खबर केवल इसी अखबार की नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया की सच्चाई है।

और अन्त में इन्दौर की अनगिनत उजाड़ रातों के एक भुक्तभोगी पत्रकार की नीर क्षीर विवेकी बात से इस प्रकरण का उसंहार करते हैं-

आधी रात के प्रवचन सुनती लद्धड़ आत्माएँ

“देर रात तक अखबार के गेट पर पत्रकारिता की चलती-फिरती युनिवर्सिटी व्याख्यान देती। रात दो बजे से सुबह तीन बजे तक चलने वाले इस सत्र में नियमित उपस्थिति वाले अंधभक्त फ़ायदे में रहे। पाखण्ड भरे लैक्चर्स सुनकर आज अलग अलग संस्करणों की बागडोर सम्भाल रहे हैं। जो फ़सल बोयी गयी, वही काटी जा रही है”

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