Home राजनीति प. बंगाल की हिंसा के लिए कौन है ज़िम्मेदार.?

प. बंगाल की हिंसा के लिए कौन है ज़िम्मेदार.?

प. बंगाल में ममता बनर्जी ने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। महामारी के इस दौर में कार्यकर्ताओं को जश्न न मनाने की नसीहत वे पहले ही दे चुकी थीं और यह भी साफ कर दिया था कि शपथग्रहण सादगी से होगा। ऐसा ही हुआ भी, टीएमसी के कुछ नेता, ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी और रणनीतिकार प्रशांत किशोर इस समारोह में मौजूद रहे। हालांकि इस सादगीपूर्ण आयोजन में भी सियासी तनाव की झलक देखने मिल गई। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने इस मौके पर कहा कि, उम्मीद है कि मुख्यमंत्री कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए तत्काल कदम उठाएंगी। मुझे यह भी उम्मीद है कि मेरी छोटी बहन मुख्यमंत्री मौजूदा हालात पर बेहतर तरीके से कार्रवाई करेंगी। आपको पक्षपातपूर्ण हितों से ऊपर उठना होगा। मुझे यकीन है कि आप एक नया शासन पैटर्न लिखेंगी।

ममता बनर्जी को उनके राजनैतिक समर्थक और विरोधी दोनों ही अक्सर दीदी का संबोधन देते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने चुनावी रैलियों में दीदी ओ दीदी इस तरह कहा कि उसमें अपमान की झलक दिखाई दी। बहरहाल, जनता ने उस अपमान का जवाब अपनी ओर से भाजपा को दे दिया। लेकिन राज्यपाल धनखड़ ने ममता बनर्जी को छोटी बताकर अलग संदेश देने की कोशिश की। वे शायद ममता बनर्जी को ये नसीहत दे रहे हैं कि अब उन्हें चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर प्रदेश के लिए काम करना चाहिए। नैतिकता का तकाजा भी यही है। अब ममता बनर्जी केवल टीएमसी समर्थकों की नहीं, समूचे प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं और राज्य के हरेक नागरिक की सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी है।

दरअसल प.बंगाल में चुनाव के दौरान कूचबिहार में जिस हिंसा की झलक देखने मिली थी, रविवार को नतीजे आने के बाद उसका विस्तारित रूप राज्य में देखने मिल रहा है। रविवार शाम से यहां हिंसा का दौर शुरु हो गया है और अब तक कम से कम 17 लोग अलग-अलग इलाकों में हिंसा के कारण जान गंवा बैठे हैं। भाजपा दावा कर रही है कि उसके नौ कार्यकर्ता मारे गए, जबकि टीएमसी अपने सात लोगों की हत्या का आरोप भाजपा पर लगा रही है। दोनों ही दल एक-दूसरे को इस हिंसा का जिम्मेदार बता रहे हैं। सत्ता के लिए ऐसे खून-खराबे की लोकतंत्र में कोई जगह नहीं होनी चाहिए और कोई ऐसा करने की कोशिश करे, तो सत्ताधारियों को उस पर तत्काल रोक लगानी चाहिए। लेकिन फिलहाल बंगाल में हिंसा रोकने की जगह आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह रही हैं कि सोमवार तक प्रशासन तक पूरा प्रशासन चुनाव आयोग के हाथों में था, लेकिन उसने चौबीस घंटे के दौरान इस पर अंकुश लगाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। उनका यह भी कहना है कि चुनाव में अपनी शर्मनाक हार नहीं पचा पाने की वजह से ही भाजपा यह सब कर रही है। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि हिंसा को सांप्रदायिक रूप देने की कोशिश भाजपा की है और वह राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना चाहती है। चुनाव आयोग पर उनके आरोप का जवाब तो आयोग को ही देना होगा। रहा सवाल भाजपा का, तो ममता बनर्जी को इस तरह की अप्रिय स्थिति का सामना करने और उसे रोकने के लिए पहले ही तैयार रहना चाहिए था। अगर जीती हुई पार्टी के कार्यकर्ता ठान लें तो राज्य में अमन कायम करने से उन्हें कोई नहीं रोक सकेगा। भाजपा पर आरोप लगाने का वक्त गया अब टीएमसी के लिए काम करने का वक्त है।

इस हिंसा का राजनैतिक लाभ उठाने में भाजपा भी पीछे नहीं रही। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा दो दिन के दौरे पर कोलकाता पहुंचे और मंगलवार शाम को कुछ पीड़ित परिवारों के साथ उन्होंने मुलाकात की। श्री नड्डा का कहना है कि इस हिंसा के कारण उनके 9 लोग मारे गए, सैकड़ों घायल हुए और हजारों लोग आतंक के मारे घर छोड़ कर भाग गए हैं। उन्होंने ये भी कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं की शहादत बेकार नहीं जाएगी। इस तरह के बयानों से क्या बदला लेने की बू नहीं आती है। आखिर श्री नड्डा वहां पीड़ितों के जख्मों पर मलहम लगाने गए हैं या आग में घी डालने। वैसे भी भाजपा प्रचारकों ने रैलियों के दौरान कुछ ऐसे बयान दिए थे, जो हिंसा के लिए उकसाते हैं। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी ने एक रैली में कहा था कि टीएमसी के गुंडे दो मई के बाद जान की भीख मांगेंगे। इसी तरह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने टीएमसी को खुली धमकी दी थी कि हमने हाथ-पांव चलाए, तो बैंडेज कम पड़ जाएंगे। इससे पहले फरवरी में दिलीप घोष ने चुनाव बाद विरोधियों को देख लेने की धमकी दी थी।

इन बयानों से साफ है कि जनता की फिक्र छोड़ इन दलों को केवल सत्ता की फिक्र थी। फिलहाल इसमें बाजी टीएमसी के हाथ लगी है। अब ममता बनर्जी ने शपथग्रहण के बाद हिंसा रोकने की बात तो कही है, लेकिन इसके लिए उन्हें तुरंत कड़े कदम उठाने होंगे। रहा सवाल भाजपा का, तो कंगना रानौत ने मोदीजी को 2000 वाला गुजरात ट्विटर पर याद दिलाकर, उनके लिए और पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर ही दी हैं। कंगना रानौत का एकाउंट तो प्रतिबंधित हो गया, अब भाजपा को भी सत्ता हथियाने और न हथिया पाने पर खीझ उतारने के अपने कुछ तौर-तरीकों पर प्रतिबंध लगा ही लेना चाहिए।

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