एक नेता, जिसका नाम भी नहीं लेना चाहिए..

एक नेता, जिसका नाम भी नहीं लेना चाहिए..

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पूर्व आईएएस अधिकारी श्री अमिताभ पांडे ने लिखा है..


सिविल सेवकों की मेरी पीढ़ी ने इंदिरा गांधी के ‘आपातकाल’ के वर्षों और संजय गांधी के गुंडा राज के साथ मोरारजी देसाई के सनकी शासन, राजीव गांधी के उम्मीदों भरे दिन जो जल्दी ही निराशा के दौर में बदल गया से भ्रमित राजनीतिक उठा-पटक वाले वीपी सिंह के दौर के साथ चन्द्रशेखर, देवेगौड़ा और इंदर गुजराल के भूलने योग्य कार्यकाल के साथ स्थिर और कभी-कभी संयमी नरसिम्हा राव के साथ वाजपेयी के परिपक्व और ठीक-ठाक कार्यकाल को देखा है और फिर अंत में मनमोहन सिंह के धीमे पर स्थिर और ठीक-ठाक पेशेवर ढंग से काम करने वाला कार्यकाल देखा है।


हम समझते थे कि हमने यह सब कुछ देख लिया है, लेकिन वह सब हमें शातिरता, दुर्भावना, असंवेदनशीलता, संवैधानिक नैतिकता के प्रति लापरवाही और क्षुद्रता, अहंकार के साथ तिजोरी भरने की महत्वाकांक्षा, ‘दूसरे’ के प्रति निर्दयता और क्रूरता के साथ सांस्कृतिक अशिष्टता, बौद्धिक रिक्तता और अब हमने पिछले सात वर्षों में जो यादगार प्रशासनिक अक्षमता देखी है उसके लिए तैयार नहीं कर सका। इसके बाद क्या अभी कुछ इससे भी बुरा हो सकता है?


“नेता” जिसका नाम नहीं लेना चाहिए..

  1. वह मूर्ख है … बुद्धि में कम है और वह इसे जानता है। वह दिमाग वाले किसी भी व्यक्ति से डरता होगा … इसका पता उसकी बुद्धिमत्ता की कमी से चलता है … इसलिए वह उन पर हमला करने के लिए अनावश्यक और गैर-आनुपातिक शक्ति का उपयोग करता है। मुख्य रूप से शब्दों के इस्तेमाल से …. फिर डराने-धमकाने के लिए … फिर सत्ता की ताकत का इस्तेमाल करके अपने दुश्मन को बिल्कुल नेस्तनाबूद कर देना चाहता है।
  2. वह अपने आस-पास के लोगों की एक सेना से समर्थित है जो बुद्धि के मामले में समान रूप से कम हैं …. ये शोर मचाने वाले उसके सैनिक हैं। यदि कोई किसी मुद्दे पर कुछ प्रकाश डालने की हिम्मत करता है … और अगर यह उस नेता और उसकी सेना के विश्वास से अलग है, तो उसपर भारी हमला होता है, आमतौर पर यह चरित्र हत्या की प्रकृति का हमला होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई प्रतिष्ठित विशेषज्ञ एक्स कहता है कि आज देश में ऑक्सीजन की कमी है, तो उसकी सेना की प्रतिक्रिया होगी कि एक्स का विवाहेत्तर संबंध है और इसलिए वह ऑक्सीजन की बात कैसे कर सकता है? अगर एक्स कोई महिला हुई तो सेना की प्रतिक्रिया होगी कि वह एक वेश्या है और उसका ऑक्सीजन से कोई संबंध नहीं है। इस तरह, यह ऑक्सीजन की कमी पर किसी भी समझदार बात का अंत है।
  3. लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती है। ऐसे कई नेता हुए हैं, जो मूर्ख रहे हैं। लेकिन इससे उन्हें प्रभावी नेता होने से नहीं रोका जा सका … अंतर यह है कि वे खुद को सक्षम व्यक्तियों के घेरे में रखते हैं। ये लोग शासन का काम जानते हैं। इस तरह हम ऐसे नेता की तीसरी विशेषता पर पहुंचते हैं, और वह है कि ऐसे लोगों को सिर्फ चाटुकारिता पसंद होती हैं … ये लोग अपने साथ ऐसे लोगों को रख ही नहीं सकते हैं जिनका नजरिया उनसे उलट हो। वे सिर्फ हां सुनना चाहता है मतलब जी हुजुरी। इसकी शुरुआत पहले बिंदु से भी होती है क्योंकि ऐसे नेता के आस-पास वालों का समह जटिल होता है। ये एक खास तरह के सक्षम और उल्लेखनीय लोग होते हैं। इसलिए शासन का वही होता है जो हुआ है।
  4. एक मूर्ख और अहंकार के उन्माद में जीने वाला व्यक्ति पर्याप्त बुरा होता है पर उसकी तीसरी खासियत ऐसी होती है जिससे वह फलता-फूलता है ….. ऐसा नेता अच्छा वक्ता होता है। वह छात्रों, डॉक्टरों, किसानों, महिलाओं से बात करेगा, किसी सवाल का जवाब नहीं देगा ना गंभीर बहस में पड़ेगा। ऐसा करते हुए वह सपने बेचेगा और बड़े पैमाने पर उम्मीदें बनाएगा। बेहद आत्मसंतुष्ट भाषा में गढ़े गए ये सपने भूखे देश में तत्काल हिट होते हैं। विपक्षी दलों के सदस्यों को मौका नहीं मिलता क्योंकि किसी शक्तिशाली मंच से वे ऐसे सपने नहीं बेच सकते हैं।
  5. इस नेता की अगली विशेषता यह है कि वह सार्वजनिक मंच पर बेशर्मी से झूठ बोल सकता है। पलक झपकाए बिना वह कह सकता है कि देश में टीकों की कोई कमी नहीं है। वह अपने कमरे में सुरक्षित सैकड़ों कैमरों को देख कर कह सकता है कि पर्याप्त दवाएं हैं और ऑक्सीजन कोई मुद्दा नहीं है। देश भर से होने वाली मौतों और निराशा की वास्तविक समय की छवियों से उसे परेशान नहीं होती है। वह यह जानते हुए अच्छी नीन्द सो सकता है कि देशवासी तकलीफ में हैं। मेरे हिसाब से यह उसकी बसे बड़ी ताकत है।
  6. और अगर वह बाकी कहीं नाकाम होता है तो भगवान राम हमेशा हैं। उसका नाम हो। इसके शासन और सहानुभूति बटोरने के लिए हिंदुओं के सबसे दयालु देवताओं में से एक को मजाक में बदल दिया गया है।
    भगवान हम सब को बचाएं 🙏
    इसके उपरोक्त घातक गुणों के बीच, कोविद-19 लोकलुभावन नेताओं द्वारा निर्मित रेत के घरों को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए तैयार किया गया लगता है।
    जनवरी में जिन विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने यह चेतावनी दी थी कि देश में संक्रमण की “सुनामी” आने वाली है नरेन्द्र मोदी ने उनका मजाक बनाया। अब भारतीय प्रधान मंत्री की कठोर आलोचना हो रही है कि उन्होंने समय से पहले ही जीत का दावा कर दिया जबकि अब संक्रमण में भारी वृद्धि हो रही है और लोग सड़कों पर मर रहे हैं।
    मोदी नवीनतम, लोकप्रिय योद्धा हैं जो बिना फंसे कुर्सी तक पहुंच गए। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इनकार के कारण दसियों हज़ार लोगों की जान गई। ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने क्रोव-इलाज के पक्ष में कोविद -19 काउंटरमेशर्स को खारिज करके एक आपदा को हवा दी। यूके के पीएम बोरिस जॉनसन ने महामारी के खतरे को जल्द से जल्द अनदेखा करने के लिए भारी व्यक्तिगत और राजनीतिक कीमत चुकाई, हालांकि वे अब तब से अधिक सतर्क हो गए हैं।

कोविद -19 की कोई राजनीतिक प्राथमिकता नहीं हैं। यहां तक कि अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए प्रशंसित कुछ नेता भी देख चुके हैं कि इस वायरस ने उनकी राय की बखिया उधेड़ दी।
लेकिन यह महामारी उन नेताओं की पोल जरूर खोलेगी जो सत्य को कम करके आंकते हैं, वैकल्पिक वास्तविकताओं का निर्माण करते हैं, विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों को अस्थिर करते हैं और जनता को सुरक्षित रखने के लिए सावधानी बरतने से इनकार करते हैं। उदाहरण के लिए, इस महीने की शुरुआत में, मोदी ने पश्चिम बंगाल में चुनावों से पहले भारी भीड़ का दावा किया। वायरस के मामले में उनके चेहरे पर उड़ती हवाइयां याद दिलाती हैं कि ट्रम्प ने गए साल रैलियों नहीं करने की बात नहीं मानी थी। इसमें उन्होंने दावा किया था कि वायरस बाहर निकाले जा रहे थे – जबकि उसी भीड़ ने उस सर्दी में घातक संक्रमण फैलाने में योगदान दिए थे।
हो सकता है कि उनकी लापरवाही उजागर होने से ट्रम्प द्वारा प्रेरित (जो पहले से ही वापसी के लिए परेशान है) से प्रेरित सत्यवादी लोकलुभावन नेताओं को नहीं रोक सकते। लोकलुभावनवाद से आर्थिक और सामाजिक विद्रोह में उपजाऊ मिट्टी मिल जाएगी। लेकिन जब नेता सार्वजनिक स्वास्थ्य पर अपनी राजनीतिक छवि को प्राथमिकता देते हैं, तो लाखों लोग पीड़ित होते हैं।

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