Home मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुचलने की साज़िश..

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुचलने की साज़िश..

-सुनील कुमार॥

हिंदी मीडियम एक जाने-माने पत्रकार रहे आलोक मेहता ने कल एक अजीब सा ट्वीट किया है जिसका स्क्रीनशॉट जब सोशल मीडिया पर चारों तरफ देखने मिला तो पहली नजर में लगा कि यह गढ़ा हुआ फर्जी और फेक ट्वीट है, कोई भी समझदार और जिम्मेदार नागरिक, और खासकर एक पत्रकार (या भूतपूर्व पत्रकार) कैसे ऐसी कोई बात लिख सकता है। लेकिन एक दिन गुजर जाने पर जब आलोक मेहता ने यह ट्वीट अपने पेज से न हटाया है, न ही किसी तरह की शरारत की बात कही है, तो यह मानने की कोई वजह नहीं है कि यह फेक है, या उनका अकाउंट हैक करके किसी और ने लिखा है। 22 अप्रैल को उन्होंने ट्वीट किया कि जब पूरा भारत एक गंभीर संकट में है तो गैर जिम्मेदार नेताओं, पार्टियों, और मीडिया के लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुछ महीनों के लिए निलंबित क्यों नहीं किया जाता? उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अदालतों और सरकार के कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है? इसके साथ ही उन्होंने एक दूसरी ट्वीट में किसान आंदोलन के खिलाफ लिखा उन्हें आढ़तिया, दलाल और लुटेरा कहा, और यह भी सलाह दी कि उन्हें गिरफ्तार करके जेल में क्यों नहीं डाला जा रहा?

खैर, किसान आंदोलन के बारे में उनका जो सोचना है उस पर हम अभी नहीं जाते, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निलंबित करने की जो वकालत उन्होंने की है उस पर जरूर गौर करना चाहिए। और जब एक ऐसा पत्रकार यह वकालत करता है जो कि कई अखबारों या पत्रिकाओं का संपादक रह चुका है, नियमित लेखक है, टीवी की बहसों में जाना-पहचाना चेहरा है, और उनके खुद के लिखे गए परिचय के मुताबिक वे पद्मश्री हैं, और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रह चुके हैं। यह सारा परिचय पहली नजर में ऐसा कुछ भी नहीं सुझाता कि ऐसा कोई व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निलंबित करने की मांग करते हुए सरकार और अदालत को चुनौती दे कि क्या उसके पास ऐसा करने के संवैधानिक अधिकार नहीं है? और खासकर आज के कोरोना खतरे, मुसीबत के संदर्भ में जब यह मांग की जाए, तो वह और अधिक हैरान करती है।

उनके पद्मश्री होने पर हमें कोई हैरानी नहीं है क्योंकि केंद्र की सत्ता पर बैठी पार्टी अपनी पसंद से वैचारिक और सैद्धांतिक आधार पर बहुत से लोगों को पद्मश्री देती है जिनमें से बहुत से पत्रकार भी होते हैं। अब यह तो पत्रकार के अपने निजी सिद्धांत रहते हैं जो उसे यह सुझाएँ कि एक पत्रकार को राजकीय सम्मान लेना चाहिए, या नहीं। हम उनके पद्मश्री होने पर भी ना तो कोई हैरानी जाहिर करना चाहते ना हमें उसमें कोई आपत्तिजनक बात लगती है क्योंकि बहुत से पत्रकार ऐसा सम्मान हासिल करते हैं जो कि उनकी खुद की पसंद और उनके खुद के सिद्धांतों का एक सुबूत होता है, लेकिन वह आज की बातचीत में महत्वहीन है। उनके परिचय का दूसरा पहलू एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का अध्यक्ष रहना है। देश में पत्रकारों की यह एक ऐसी संस्था है जिसने बीते बरसों में बहुत से मौकों पर नौबत आने पर सरकार के साथ तनातनी के तेवर भी अख्तियार किए हैं, और कुछ टकराव से भी कतराई नहीं है। ऐसी संस्था में अध्यक्ष रहने वाले व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व तो आम पत्रकारों से कुछ अधिक होना चाहिए। लेकिन इसमें कुछ कमी दिखाई पड़ रही है। आज जब देश में कोई सा भी तबका, एक वक्त आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस, या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खत्म करने में दिलचस्पी रखने वाली कुछ दूसरी पार्टियां भी, जब कोई भी ऐसी कोई जरूरत महसूस नहीं कर रही हैं, खासकर कोरोना के संदर्भ में, देश की किसी अदालत ने भी मीडिया पर गैरजिम्मेदारी की कोई टिप्पणी नहीं की है, तब बड़े-बड़े ओहदों पर रह चुके आलोक मेहता ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निलंबित करने के फतवे की अपनी ट्वीट में सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री, और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को भी टैग किया है। मतलब यही है कि वे अपनी गंभीरता को इन तीनों तक पहुंचाना चाहते हैं। यह महज बोलचाल में लिखी गई कोई हलकी बात नहीं है, वे उस पर अमल भी देखना चाहते हैं।

आज देश में केंद्र सरकार की लापरवाही या गैर जिम्मेदारी से, या किसी राज्य सरकार की लापरवाही और गैरजिम्मेदारी से कोरोना के मोर्चे पर तबाही चल रही है, यह बात सबसे अधिक तो मीडिया के एक हिस्से में सामने आ रही है, सोशल मीडिया पर सामने आ रही है। अब नेताओं में बहुत से ऐसे नेता भी हैं जो जिम्मेदारी के साथ सच बोल रहे हैं, हकीकत सामने ला रहे हैं। पत्रकारों में भी बहुत से हैं जो सरकारी गैरजिम्मेदारी या लापरवाही के सुबूत सामने रखते हुए उन्हें अपना काम सुधारने को मजबूर कर रहे हैं या कम से कम उसकी कोशिश तो कर ही रहे हैं। क्या यह मौका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का है? उसे निलंबित करने का है? ऐसी बात तो आपातकाल के बाद से आज तक किसी सबसे अधिक तानाशाही की सोच ने भी कभी नहीं की है, और ऐसे में एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष रहे हुए व्यक्ति की यह बात एक बड़ा बुरा सदमा पहुंचाती है, और उसकी लोकतांत्रिक समझ की बुनियाद पर एक सवाल भी खड़ा करती है। हमारा आलोक मेहता से ना कोई परिचय है न कोई वास्ता कभी उनसे पड़ा। न उनसे दोस्ती है न दुश्मनी। इसलिए पूरी तरह तटस्थ भाव से, उनसे किसी लाग-लपेट के बिना यह बात लिखना जरूरी लग रहा है कि हिंदुस्तान में आज ऐसी सोच एक खतरे से कम नहीं है क्योंकि यह नेताओं को एक ऐसा रास्ता सुझाने की कोशिश कर रही है जो उनको किसी भी दिन सुहा भी सकता है। आपातकाल की यादें जरूर लोगों के दिमाग में ताजा हैं, लेकिन आपातकाल जैसी असीमित ताकतों से नेताओं को कोई परहेज होगा ऐसा भी नहीं लगता है। अगर तानाशाही की तोहमत के बिना, आपातकाल जैसे आरोपों के बिना, वैसे अधिकार अगर किसी नेता, सरकार, या पार्टी को मिल जाएं तो भला किसे नहीं सुहाएंगे? इसलिए आज जब ऐसी कोई सोच सार्वजनिक रूप से देश की सबसे बड़ी अदालत और देश की सबसे बड़ी सरकार के सामने रखी जा रही है, उन्हें कोंचा जा रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निलंबित कर देनी चाहिए, तो यह एक बहुत ही खतरनाक नौबत है। यह लोकतंत्र के लिए भी बहुत ही खतरनाक सोच है।

आलोक मेहता के ट्विटर पेज पर कई लोगों ने उनके बारे में आलोचना की कई बातें कही हैं, कई लोगों ने उन्हें पद्मश्री मिलने को लेकर सत्ता से उनके घरोबे की बात लिखी है, कई लोगों ने उनकी राज्यसभा जाने की हसरत की बात लिखी है, लेकिन हम मुद्दे की बात से हटकर व्यक्ति की बात पर आना नहीं चाहते। कई पत्रकार हुए हैं जिन्होंने पद्मश्री लेना ठीक समझा है और कल पत्रकार हुए हैं जो राजनीतिक दलों के सहयोग से राज्यसभा में गए हैं। इसलिए हम उस पहलू को लोकतंत्र का दुश्मन नहीं मानते, यह लोगों की अपनी प्राथमिकता और अपने सिद्धांतों की बात है। लेकिन जब लोकतंत्र को खत्म करके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निलंबित करने का फतवा दिया जा रहा है, तो उस पर लोगों को गौर करना चाहिए, उस पर लोगों को सोचना चाहिए। आज के वक्त जब कोरोना पर लोगों की, संगठनों की, और मीडिया की लगातार निगरानी की जरूरत है लगातार कमजोरियों को उजागर करने की जरूरत है, उस वक्त अगर कोई ऐसी सेंसरशिप की वकालत करके उसे लागू करने की बात करते हैं तो उसके पीछे के अलोकतांत्रिक खतरों को समझना चाहिए। हम सोचने वाले लोगों को सोचने के लिए यह मुद्दा दे रहे हैं, आलोक मेहता की निंदा करना हमारा मकसद नहीं है क्योंकि उनका भारतीय लोकतंत्र में आज वैसा कोई महत्व नहीं है। लेकिन हम इस बात पर चर्चा जरूर करना चाहते हैं कि बिना किसी मौके के, बिना किसी खतरे के तानाशाही का यह फतवा क्यों दिया जा रहा है? क्या यह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के बर्दाश्त को टटोलने की कोई कोशिश है?

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