Home कोरोना टाइम्स ये नफरत का वक़्त नहीं, एक दूजे का सहारा बनें..

ये नफरत का वक़्त नहीं, एक दूजे का सहारा बनें..

पिछले सप्ताह वडोदरा में कोविड के कारण भाजपा के एक स्थानीय नेता की मौत हो गई। उसका शव अंतिम संस्कार के लिए श्मशान लाया गया। भाजपा के नेताओं ने देखा कि एक मुस्लिम युवक वहां चिता तैयार करने में मदद कर रहा था। उन्होंने इस बात पर ऐतराज जताया। पार्टी के शहर अध्यक्ष विजय शाह ने वडोदरा नगर निगम को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि श्मशान में मुसलमानों का प्रवेश न हो। हालांकि नगर निगम ने यह मांग स्वीकार नहीं की। महापौर केयूर रोकड़िया ने कहा कि महामारी के समय समुदायों को एक साथ काम करना चाहिए। श्मशान घाट पर अगर मुस्लिम स्वयंसेवक काम कर रहे हैं तो इसे सांप्रदायिक सद्भाव की दृष्टि से देखा जाना चाहिए, इसमें आपत्ति करने का कोई कारण नहीं है।
यह उसी वडोदरा शहर का किस्सा है जहां एक मस्जिद को कोविड अस्पताल में बदल दिया गया है। यहां की जहांगीरपुरा मस्जिद में 50 से अधिक बिस्तर ऑक्सीजन की सुविधा के साथ लगाए गए हैं। कोरोना के जिन मरीजों को शहर के अस्पतालों में जगह नहीं मिल पाती, उनका इलाज यहां किया जाता है। जहांगीरपुरा मस्जिद के अलावा दारूल उलूम में भी 120 बिस्तरों का इंतजाम किया गया है। गौरतलब है कि महामारी के डर से सभी धर्मस्थलों पर ताले लगे हुए हैं। जहांगीरपुरा मस्जिद के ट्रस्टी ने कहा कि माहे रमजान में इससे बेहतर इबादत नहीं हो सकती, लेकिन भाजपा के एक कार्यकर्ता धीरूभाई मकवाणा का कहना है कि ये गलत है, हम हिन्दू वहां नहीं जाएंगे।
दूसरी तरफ किसी बड़े निजी अस्पताल का एक डिस्चार्ज पेपर सोशल मीडिया पर तैर रहा है, जिसमें लिखा गया है कि मरीज को डॉक्टरी सलाह के विरुद्ध अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है, क्योंकि वह एक मुस्लिम डॉक्टर से अपना इलाज नहीं करवाना चाहता। इस कागज में मरीज की पहचान छिपा दी गई है लेकिन उसका इलाज कोरोना के लिए हो रहा था, ये साफदिखाई दे रहा है। प्रसंगवश, यह याद दिलाना गलत नहीं होगा कि पिछले साल इन्हीं दिनों राजस्थान के भरतपुर के सरकारी अस्पताल में एक गर्भवती महिला को दाखिला इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह मुसलमान थी। किसी दूसरे अस्पताल तक पहुंचने के पहले एम्बुलेंस में ही उसकी प्रसूति हुई लेकिन बच्चा बच नहीं सका।
लॉकडाउन से लेकर अब तक न जाने कितने हिन्दुओं के शव मुसलमानों ने श्मशान तक पहुंचाए हैं और उनका अंतिम संस्कार किया है, क्योंकि उन्हें लावारिस छोड़ दिया गया था या किसी मजबूरी में मृतकों के परिजन ये काम नहीं कर पा रहे थे। मुस्लिम समुदाय के किसी सदस्य ने कोरोना पीड़ितों को ऑक्सीजन मुहैय्या करवाने के लिए अपनी महंगी गाड़ी तक बेच दी तो किसी ने अपने कारखाने के तमाम सिलिंडर नगर निगम को दे दिए कि वे मरीजों के लिए ऑक्सीजन भरने के काम आ जाएं। एक बन्दे ने तो पूरा का पूरा टैंकर ही दान कर दिया। एक शहर में अल्पसंख्यकों ने किसी पुराने अस्पताल को अपने खर्च पर जरूरी साजो-सामान जुटाकर कोरोना मरीजों के लिए तैयार कर दिया।
ऐसे किस्से अनगिनत हैं, लेकिन दिलीप शाह, धीरूभाई मकवाणा और अस्पताल से छुट्टी लेने वाले उस गुमनाम शख़्स जैसों को यह सब दिखाई नहीं देता। श्मशान में खड़े होकर या उम्र के आखिरी दौर में पहुंचकर भी उनके भीतर वैराग्य नहीं जागता, जबकि कोरोना वायरस हिन्दू-मुसलमान, अमीर-गरीब, औरत-मर्द या गोरे-काले में फर्क नहीं कर रहा है। उसकी दूसरी लहर कहीं पूरे परिवार का नामो-निशां मिटा दे रही है तो कहीं लोगों को बेसहारा और बेरो•ागार बना कर छोड़ दे रही है। बड़े से बड़ा कोई भविष्यवक्ता भी नहीं बता सकता कि कल कौन बचेगा, कौन नहीं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम सब मजबूती से एक-दूसरे का हाथ थाम लें, एक-दूसरे का सहारा बनने को तैयार हो जाएं।

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