हा हा भारत दुर्दशा न देखि जाई..

हा हा भारत दुर्दशा न देखि जाई..

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-सर्वमित्रा सुरजन॥

संविधान में बराबरी और न्याय की बात थी। लेकिन हम भारत के लोगों ने जाति, धर्म, वर्ण और धन की गैरबराबरी को बाकायदा इज्जत देते हुए बनाए और बढ़ाए रखा। नतीजा ये हुआ कि चुनाव-दर-चुनाव जातिगत और धार्मिक समीकरणों में मतदाता आंकड़ों की तरह बंटते गए। अस्पतालों, शिक्षा संस्थानों, पुस्तकालयों, तालाब, कुओं, सड़कों की जगह हमने मंदिर-मस्जिद को तवज्जो दी।

रोअहु सब मिलकै, आवहु भारत भाई।
हा हा भारत दुर्दशा न देखि जाई।।

भारतेंदु हरिश्चंद्र के विख्यात नाटक भारत दुर्दशा के अध्याय एक की शुरुआत इन्हीं पंक्तियों से होती है। जोगी गाते हुए भारत के अतीत की महिमा का बखान करता जाता है और साथ में गुलामी के दौर की दुर्दशा को बतलाते हुए दुखी होता है। अंग्रेजों ने भारत पर राज किया, उसे अपना गुलाम बनाया, यह ऐतिहासिक सत्य है। लेकिन इस गुलामी के लिए क्या केवल अंग्रेजों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। खुद भारत के लोगों ने अपनी मूढ़ता, अंधविश्वास, आलस्य, अकर्मण्यता, भाग्य पर जरूरत से अधिक निर्भरता के कारण अपने बुरे दिन बुलाए, इसकी खबर भी भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बखूबी ली है। अध्याय एक के दूसरे अंक की शुरुआत में उस वक्त के भारत का एक चित्र खींचा गया है- जैसे- शमशान, टूटे-फूटे मंदिर, कौआ, कुत्ता, सियार घूमते हुए, अस्थियां इधर-उधर पड़ी हैं। इन सबके बीच भारत प्रलाप कर रहा है कि ‘हाय अब मुझे कोई शरण देने वाला नहीं। अरे, दैव ने सब कुछ मेरा नाश कर दिया। हाय कोई बचाने वाला नहीं।’

भारतेंदुजी की यह कल्पना आज के भारत का कड़वा सच बन चुकी है। भारत आज अंग्रेजों का गुलाम नहीं है, लेकिन औपनिवेशिक दासता की बेड़ियों से अधिक अंधश्रद्धा, अंधभक्ति की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। और इसी वजह से एक बार फिर भारत दुर्दशा की बात सही साबित हो रही है। चील-कौवे, सियार प्रत्यक्ष मंडराते दिखें न दिखें, मंजर तो वैसा ही है। जब एक साथ 40-45 लाशें जलें और सरकार लाशों की गिनती छिपाने के लिए टीन की दीवारें खड़ी करे, तो मान लेना चाहिए कि भारत की दुर्दशा पर सबको मिलकर रोने वाले दिन ही आ गए हैं। और अपने इन आंसुओं के लिए, अपनी बर्बादी के लिए हम ही जिम्मेदार हैं।

आजादी मिलने के बाद भारत को जो संविधान मिला, उसने एक राह बताई थी कि कैसे सारे भारत के लोग एक साथ मिलकर आगे बढ़ सकते हैं। इस संविधान में बराबरी और न्याय की बात थी। लेकिन हम भारत के लोगों ने जाति, धर्म, वर्ण और धन की गैर-बराबरी को बाकायदा इज्जत देते हुए बनाए और बढ़ाए रखा। नतीजा ये हुआ कि चुनाव-दर-चुनाव जातिगत और धार्मिक समीकरणों में मतदाता आंकड़ों की तरह बंटते गए। अस्पतालों, शिक्षा संस्थानों, पुस्तकालयों, तालाब, कुओं, सड़कों की जगह हमने मंदिर-मस्जिद को तवज्जो दी। अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह भव्य राम मंदिर बनाने के उद्देश्य को लेकर 1990 में लालकृष्ण आडवानी ने सोमनाथ से रथयात्रा निकाली। उस रथ के पहियों के नीचे संविधान की आत्मा बार-बार कुचली गई।

हिंदुस्तान का बहुसंख्यक समाज खुश था कि उसके हिंदुत्व की रक्षा अब होकर रहेगी। राम मंदिर बन जाएगा और बाबरी मस्जिद टूट जाएगी तो देश के सारे दुख-दर्द और तकलीफें दूर हो जाएंगी, गोया एक 5 सौ साल पुरानी मस्जिद के कारण ही सारी मुसीबतें देश पर थीं।  6 दिसम्बर 1992 को एक ऐतिहासिक धरोहर धर्मोन्मादी लोगों ने चीखते-चिल्लाते ढहा दी। उन चीखों पर राजनीति के पांव आगे बढ़ाते-बढ़ाते देश में भाजपा ने सत्ता पर बैठने का सुख प्राप्त कर लिया। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर का शिलान्यास भी कर लिया। लेकिन देश की तकलीफें दूर नहीं हुईं, बल्कि पहले से कई गुना बढ़ गईं।

हमने अस्पताल, डॉक्टरों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों की अहमियत नहीं समझी, संविधान को बार-बार मुंह चिढ़ाया, तो अब उसकी सजा देश को मिल रही है। पिछले सात सालों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को अपनी लच्छेदार बातों में उलझा कर रखा है। पांच साल तक बेरोजगारी, महंगाई, सांप्रदायिक तनाव, विदेशों में आलोचना झेलने के बाद देश ने 2019 में उन्हें दोबारा मौका दिया और दोबारा उन्होंने अपनी बातों में देश को उलझाया।

2020 की शुरुआत में जब कोरोना का प्रसार शुरु हुआ था, तब वे गुजरात के मोटेरा स्टेडियम में नमस्ते ट्रंप कर रहे थे। एक साल में दुनिया का यह सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में बदल गया। भारत दुर्दशा में एक पात्र है निर्लज्जता, जिसकी भूमिका यहां काफी प्रमुख रही। इस एक साल में खुद को देश का प्रधानसेवक मानने वाले मोदीजी चाहते तो युद्ध स्तर पर अस्पताल, आक्सीजन संयंत्र, दवाइयां तैयार करवा सकते थे, ताकि किसी भी तरह की मुसीबत का सामना करने में देश सक्षम होता। लेकिन उन्होंने एक साल में छह चुनावों में प्रचार की कमान संभाली। देश को पांच ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था बनाने का वादा था, लेकिन सरकार की लापरवाही के कारण पांच ट्रिलियन मरीज देश में होने की नौबत आ गई।

देश में महामारी की आग दावानल की तरह फैल चुकी है और अब प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि देश में तेजी से आक्सीजन संयंत्र लगाने चाहिए। पिछले शनिवार एक उच्च स्तरीय बैठक में मोदीजी ने कहा कि भारत ने पिछले साल एकजुट होकर कोविड-19 महामारी को परास्त कर दिया था और इस बार भी वह हरा सकता है। क्या इसे इस साल का सबसे बड़ा झूठ नहीं मानना चाहिए। क्या वाकई हमने पिछले साल कोरोना को परास्त कर दिया था। लॉकडाउन के बाद अनलॉक करना मजबूरी थी और लोगों को डर के बावजूद काम पर निकलना पड़ा था। लेकिन जिंदगी सामान्य कहां हो पाई थी। कोरोना के आंकड़े कम जरूर हुए थे, लेकिन दो कदम पीछे हटकर इस बार महामारी ने ऊंची छलांग लगाई है, तो इसका मतलब यही है कि हमने कोरोना को परास्त नहीं किया था, बल्कि कुछ वक्त के लिए लुका-छिपी का खेल चला और फिर जनता की पीठ पर महामारी ने जोर का धप्पा किया। हम इस खेल में जीत सकते थे, बशर्ते इसमें ईमानदारी से नियमों का पालन होता। लेकिन सरकार ने यहां भी बेईमानी भरी चालाकी की। लोगों को फिर राष्ट्रवाद के खेल में उलझाया जा रहा है। अयोध्या के बाद काशी को केंद्र में लाया जा रहा है।

लोगों को आक्सीजन मिले न मिले, वैक्सीन मिले न मिले, धर्मांधता की खुराक भरपूर दी जा रही है। इसके साथ कुतर्कों का खेल भी चल रहा है। गृहमंत्री अमित शाह महाराष्ट्र और प.बंगाल की तुलना कर रहे हैं कि महाराष्ट्र में चुनाव नहीं हैं, फिर भी वहां मामले ज्यादा हैं। वे कह रहे हैं कि कोरोना के साथ पूर्ण युद्ध चल रहा है और हम निश्चिंत हैं कि हम जीतेंगे। क्या वे इस निश्चिंतता का आधार बता सकते हैं। क्योंकि देश तो ये देख रहा है कि एक महीने में रोजाना मामले बढ़ते-बढ़ते एक लाख से ढाई लाख तक पहुंच गए हैं। भारत दुर्दशा पर भारत भाग्य विधाता आंसू बहा रहा है। लेकिन सरकार निश्चिंत है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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