Home कोरोना टाइम्स चुनावी कुंभ में कोरोना का दंश झेलता देश

चुनावी कुंभ में कोरोना का दंश झेलता देश

देश में कोरोना के मामले बढ़ते-बढ़ते ढाई लाख के पार चले गए हैं। ऐसी भयावह स्थिति है कि न अस्पतालों में मरीजों को दाखिला मिल रहा है, न अंतिम संस्कार के लिए जगह। कई राज्य सरकारें इंतजाम को लेकर हाथ खड़े कर चुकी हैं, लेकिन देश के प्रधानमंत्री ने अब तक अपने मुंह से यह स्वीकार नहीं किया कि उनसे हालात नहीं संभले, या महामारी की गंभीरता को वे समय रहते समझ नहीं पाए। बल्कि वे अब भी प.बंगाल में अपनी रैलियों में उमड़ी भीड़ देखकर गदगद हैं। दूसरी ओर कुंभ के कारण भी कोरोना के विस्फोट जैसी स्थिति बनी। कई दिनों से समझदार लोग कुंभ के आयोजन को लेकर सवाल उठा रहे थे कि शाही स्नान में लाखों लोगों का एक साथ पहुंचना ठीक नहीं हैं, क्यों न कुंभ को खत्म किया जाए।

पिछले साल तो तब्लीगी जमात को कोरोना फैलाने के लिए जिम्मेदार बताते हुए खूब कोसा गया था, स्वास्थ्य मंत्रालय के बुलेटिन में बाकायदा ये बताया जाता था कि तब्लीगी जमात से जुड़े कितने लोग कोरोना संक्रमित हैं। लेकिन कुंभ को लेकर ऐसी घोषणा करने की हिम्मत सरकार या मीडिया किसी ने नहीं दिखाई। बल्कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने पिछले दिनों कहा कि मरकज में आए लोग एक बिल्डिंग के अंदर जमा थे, जबकि कुंभ में आए लोग खुले में रह रहे हैं। और यहां तो गंगा बह रही है। मां गंगा का प्रवाह और आशीर्वाद से कोरोना का संक्रमण दूर ही रहेगा। मां गंगा इसे फैलने नहीं देंगीं। तब्लीगी जमात के जमावड़े से इसकी तुलना करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

जबकि सच ये है कि कुंभ शुरू होने से पहले 31 मार्च को 293 नये कोरोना के मरीज मिले थे। लेकिन महज 15 दिन बाद यह आंकड़ा 2,225 हो चुका था। जाहिर है कुंभ के कारण कोरोना संक्रमण का प्रसार हुआ। पिछले साल जब इस महामारी को लेकर लोगों में जागरुकता नहीं थी, तब निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात के लोगों का आना और वहां से निकलना अज्ञान के कारण हुई गलती थी,  इसमें सरकार भी जिम्मेदार थी, क्योंकि बाहर से आने वाले लोग सरकार के दिए वीजा के बगैर देश में नहीं आ सकते थे। लेकिन एक साल में तो कोरोना के बारे में देश को काफी कुछ पता चल गया है, उसके बावजूद कुंभ का ऐसा आयोजन गलती नहीं कहला सकता, बल्कि इसे आपराधिक लापरवाही कहना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने अब जाकर अपील की है कि कुंभ को कोरोना के संकट के चलते प्रतीकात्मक ही रखा जाए। इससे इस संकट से लड़ाई को एक ताकत मिलेगी। काश उन्हें ये आत्मज्ञान थोड़ा पहले मिला होता।

कुंभ को लेकर तो मोदीजी ने अपील कर दी, लेकिन चुनावी रैलियों का मोह वे अब तक नहीं छोड़ पा रहे हैं। विडंबना है कि प्रधानमंत्री एक ओर मुख्यमंत्रियों के साथ आपदा बैठक करते हैं, दूसरी ओर इस आपदा में सत्ता के अवसर तलाशने के लिए रैलियां करते हैं, जिनमें हजारों लोग शिरकत करते हैं। क्या देश के मुखिया को इस बात का अहसास नहीं होता कि उनकी राजनीति के कारण लाखों लोगों की जान खतरे में पड़ रही है। प.बंगाल में कोरोना के बढ़ते मामले देख पिछले दिनों वामदलों ने ऐलान कर दिया कि वे वर्चुअल रैलियां करेंगे। और रविवार को राहुल गांधी ने भी घोषणा कर दी कि प.बंगाल में वे अपनी सारी रैलियां स्थगित कर रहे हैं।

उन्होंने ट्वीट किया कि कोविड के कारण पैदा हुए हालात को देखते हुए मैं पश्चिम बंगाल में अपनी सारी रैलियां रद्द कर रहा हूं। मैं दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी अपील करता हूं इन हालात में ऐसी रैलियों के परिणाम के बारे में गंभीरता से सोचें। अपने इस फैसले से राहुल गांधी ने एक बार फिर अपनी राजनैतिक परिपक्वता और उसके साथ जनसरोकारों को उजागर किया है। इससे पहले टेस्टिंग की रफ्तार बढ़ाने, लॉकडाउन के बाद हालात संभालने, विदेशों से वैक्सीन मंगाने, गरीबों को सीधी आर्थिक मदद करने जैसे कई सुझाव उन्होंने मोदी सरकार को दिए थे। सरकार ने पहले उन्हें अनसुना किया, बाद में पानी सिर के ऊपर से गया तो उन पर अमल किया। अब एक बार फिर राहुल गांधी ने मापदंड स्थापित किया है।

लेकिन उनके जैसी हिम्मत बाकी दल नहीं दिखा रहे हैं। टीएमसी और भाजपा के बीच तो अब भी होड़ लगी है कि कौन कितने रोड शो करता है, किसकी रैली में कितने लोग जमा होते हैं। इन सबके बीच चुनाव आयोग संभल कर रहिए जैसी नसीहत देने की औपचारिकता निभा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान आचार संहिता और कोविड प्रोटोकॉल दोनों की धज्जियां उड़ रही हैं, लेकिन चुनाव आयोग से कोई कड़ा कदम नहीं उठाया गया। ममता बनर्जी ने चौथे चरण के मतदान के बाद अपील की कि अब बाकी के चरणों के मतदान एक साथ हो जाएं, लेकिन भाजपा के पार्टनर की तरह काम कर रहे चुनाव आयोग ने ऐसा कोई फैसला नहीं लिया। प.बंगाल के साथ उत्तरप्रदेश में भी पंचायत चुनाव चल रहे हैं। चुनावी कुंभ में देश को डुबकियां लगवाई जा रही हैं और उसके बीमार होने की चिंता सरकार को नहीं है।

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