गलती स्वीकारने के लिये भी हिम्मत चाहिये..

गलती स्वीकारने के लिये भी हिम्मत चाहिये..

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-हिना ताज़॥

देश दुनिया में कोरोना एक बार फिर विकराल रूप धर चुका है। हालात बेहद खराब हैं देश के कोने कोने से अशुभ समाचार मिल रहे हैं। अस्पतालों के बाहर सैंकडों एंबुलेंसों के वैटिंग की कतार में खड़े होने की तस्वीरें हों या शमशान में एक साथ जलती 40 चिताओं का दर्दनाक दृश्य हो। ये सब कुछ ह्रदय विदारक है। आज की खबरों के हिसाब से उत्तराखंड में चल रहे कुंभ मेले में भी कई कोरोना संक्रमित मिलने की पुष्टि हुई है, जिसके बाद निरंजन अखाड़े ने कुभ छोड़कर जाने का एलान कर दिया और इस पर बात इतनी बिगड़ गई की कई अखाड़े इस मुद्दे पर आपस में भिड़ गये कि संक्रमण किस अखाड़े की वजह से फैला।

वैसे यहां याद दिलाने वाली बात ये है कि कुछ ही दिन पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने एक बयान में कहा था कि गंगा में नहाने से कोरोना नहीं फैलेगा। उन्होंने कुंभ और मरकज़ की तुलना को भी गलत बताया था। अब जबकि करीब करीब 35 लाख लोग कुंभ के दौरान गंगा में डुबकी लगा चुके हैं और संक्रमण फैला चुके हैं तब उत्तराखंड सीएम की ओर से इसे लेकर कुछ नहीं कहा जा रहा। कम से कम सीएम रावत को नैतिकता के आधार पर अपनी कही गलत बात को स्वीकारना चाहिये था मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। आखिर अपनी कमी को आसानी से कौन मान लेता है, वह भी वे व्यक्ति जो एक मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हो !


गलतियों या कमियों को स्वीकारना बहुत बड़ी बात है। ये साहस, चरित्र और आत्म अनुशासन की परिचायक स्वीकारोक्ति है। जो दुर्भाग्य से बीजेपी के हर नेता से नदारद है। क्योंकि इनके सत्ता संभालने के बाद से ही कितने ही कांड हुए जहां नैतिकता के आधार पर इनसे इस्तीफों की उम्मीद की गई। ललित मोदी मामले में राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को लेकर ये मांग उठी थी कि उनको इस्तीफा देना चाहिये, इनकी कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी कई मुद्दों पर इस तरह घिरीं कि लगा अब वह नैतिकता का कुछ भान करेंगी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। #MeToo कैंपेन के दौरान बीजेपी नेता एमजे अकबर का नाम उछला, रेप जैसे जघन्य आरोप में फंसे केंद्रीय मंत्री निहाल चंद मेघवाल से मोदी सरकार ने इस्तीफा नहीं लिया तो इससे बढ़कर अनैतिकतावादी सरकार का और क्या उदाहरण मिल सकता है।


पर अब यही बीजेपी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को नैतिकता का पाठ पढ़ाने चली है। गहलोत ने हाल ही ट्वीटर के माध्यम से कोरोना के प्रसार में राजनेताओं की भूमिका पर एक नैतिक स्वीकारोक्ति क्या कर ली बीजेपी सीएम पर हमलावर हो गई। हालांकि गहलोत का यह कहना उनके उस आरोप का एक हिस्सा था जो वह चुनाव आयोग और न्यायपालिकाओं की भूमिका पर लगा रहे थे। जिन्होंने कोरोना की विकट स्थितियों को देखते हुए भी और राज्यों की मांगों के बावजूद पंचायतों और निकय चुनावों के आयोजनों का एलान किया। गहलोत ने तो बस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह, इन स्वायत्त संस्थाओं पर भी सवालों से बचने का आरोप लगाया था। हां उन्होंने कोरोना के प्रसार के लिये ज़िम्मेदार चुनावी रैलियों की बात को स्वीकार किया तो क्या वे इतने बड़े अपराधी मान लिये जाएंगे जिससे उनके द्वारा कोरोना प्रबंधन के लिये उठाए जा रहे मिसाली कदमों को नज़रअंदाज़ किया जा सके। नैतिकता के आधार पर अपनी कमी को मान लेना उतना बड़ा अपराध नहीं होता जितना अड़ियल रवैया अपनाते हुए बार बार उन्हीं गलतियों को दोहराना होता है।


बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया तो गहलोत की कथनी और करनी में अंतर गिनाने पर उतर आए हैं। लेकिन क्या कोविड गाइडलाइन का उल्लंघन उन्हें अपनी रैलियों में या अपनी केंद्र सरकार द्वारा किये जा रहे चुनाव प्रचार में नज़र नहीं आ रहा है ? क्या कोविड गाइडलाइन की पालना सरकार में होने के नाते केवल कांग्रेस की ज़िम्मेदारी थी और उनकी नहीं ? गहलोत सरकार से यदि कोई गलती हुई तो बीजेपी ने ऐसा कौनसा उदाहरण पेश किया जो कांग्रेस को सुधार की याद दिलाने वाला था ? असल बात ये है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की एक स्वीकारोक्ति ने बीजेपी को संकट में डाल दिया है, एक ऐसी जवाबदारी जिसे उठाने के लिये बहुत साहस चाहिये जो बीजेपी के पास कतई नहीं है। तभी इनके प्रधानमंत्री जवाबदेही वाले विषयों पर चुप्पी साध लेते हैं। कोरोना वैक्सीन की कमी पर बीजेपी सरकार के मंत्री झूठ बोलने लग जाते हैं। इसलिये सवालों से घबराने वाली पार्टी सच को पचाने में भी कैसे कामयाब हो सकती है। मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने गलत फैसलों की बदौलत जनता को बहुत बर्बाद किया है लेकिन कभी अपने शासन की कमी को स्वीकार नहीं किया ।
“मैंने गलती की” कहने वालों पर विश्वास बहाल होता है और गलतियां छिपाने वालों को एक दिन खारिज कर दिया जाता है। ऐसा भी नहीं है कि कोरोना सिर्फ चुनावी रैलियों से ही फैला हो फिर भी गहलोत द्वारा राजनेताओं की भूमिका पर दिया बयान हज़ार आलोचनाओं के बावजूद उनके व्यक्तितव के सकारात्मक पक्ष की ओर ही ध्यान आकर्षित करता है। एक ऐसा नेता जो सच स्वीकारने और अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं कतराता।

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