Home मीडिया मीडिया कोर्स एवं हिंदी पत्रकारिता पर दो (सौ) शब्द-

मीडिया कोर्स एवं हिंदी पत्रकारिता पर दो (सौ) शब्द-

हम कबसे कहते आ रहे हैं कि मास मीडिया का कोर्स करवाने वाले ये मीडिया संस्थान बेरोजगार पत्रकारों की बड़ी जमात खड़ी कर रहे हैं.. हम दिल्ली में ऐसी कई युवतियों से परिचित हैँ जो पत्रकारिता का कोर्स कर काम न मिलने की वजह से कॉलगर्ल बन जीवन गुजार रही हैं.. पढ़िए रंगनाथ सिंह की आँखे खोल देने वाली पोस्ट..

-रंगनाथ सिंह॥

नए अकादमिक सत्र शुरू होने वाले हैं। कब होंगे नहीं पता लेकिन उस समय तक मुझे याद रहे न रहे इसलिए आज ही यह पोस्ट लिख रहा हूँ। यह उस पोस्ट उन नौजवानों के लिए जो पिछले साल या इस साल 12वीं पास कर रहे हैं। मेरे फेफे में ऐसे लोग शायद न के बराबर हैं इसलिए परोक्ष रूप से यह पोस्ट उन लोगों के लिए है जिनके घर-परिवार में ऐसे बच्चे हैं।

साथियों, एक लाइन में कहूँ तो मेरे विचार से आपके घर में या घर के आसपास दस घर तक भी कोई बच्चा बारहवीं पास करके बीए इन मॉस मीडिया जैसा कुछ करना चाहता है तो प्लीज उसे रोक लीजिए। फिलहाल भारत में बीए मॉस मीडिया या मॉस कम्युनिकेशन बच्चों को लूटने और उनकी जिंदगी खराब करने का तरीका है। आपको बेवकूफ बनाने के लिए ऊपर से सफल दिखने वाले कुछ नाम उछाले जा सकते हैं जिन्होंने बीए मॉस मीडिया जैसा कोर्स किया होगा। ऐसे नामों से बचकर रहिए।

जिस किशोर-किशोरी में किसी भी तरह की प्रतिभा है तो मैं उसे मीडिया में आने की सलाह नहीं दूँगा। अगर कोई किशोर अपना भविष्य दाँव पर लगाकर मीडिया में आने को आमादा हो ही जाए तो उसे मेरी सलाह होगी कि वो भारत सरकार द्वारा जारी यूनिवर्सिटी रैंकिंग देख ले और जिस यूनिवर्सिटी में उसका कला, मानविकी या समाजविज्ञान के किसी विषय में स्नातक (प्रतिष्ठा) में प्रवेश हो सके उसमें एडमिशन ले ले। याद रखें कि आईआईएम-आईएएस में भी स्नातक के बाद जाते हैं फिर आपको तो उनसे बहुत नीचे दर्जे पर जाना है तो स्नातक कर लेने से कोई घाटा नहीं होगा।

स्नातक करने तक भी आपकी मीडिया में आने की सनक दूर नहीं होती तो आप किसी सरकारी विश्वविद्यालय से मीडिया का पीजी डिप्लोमा या एमए कर लीजिए। कोशिश कीजिए एमए करने की। आईआईएमसी का हिंदी पीजी डिप्लोमा रैकेट बहुत तगड़ा है लेकिन आप गौर करेंगे तो देखेंगे कि अब उनमें से ज्यादातर की सीवी में लिखा रहता है- एमए फ्रॉम जम्भेश्वर…हिसार।

आईआईएमसी का जिक्र आया है तो कहना चाहूँगा कि पिछले कुछ सालों में मुझे कुछ ऐसे नौजवान भी मिले हैं जिन्हें आईआईएमसी में एडमिशन न मिलने का गहरा अफसोस था। यह सच है कि केवल एक एंट्रेंस पास कर के सालों से तैयार किये गये रैकेट में एंट्री पा लेना हर लिहाज से फायदे का सौदा है लेकिन आईआईएमसी में एडमिशन नहीं हुआ हो तो भी ज्यादा निराश न हों। आईआईएमसी हिंदी पीजीडी का रैकेट मूलतः जातिवादी-क्षेत्रवादी रैकेट है जिसपर आईआईएमसी का रैपर चढ़ाकर बेचा जाता है। आपमें प्रतिभा होगी तो आप इन रैकेट में खुद ब खुद जगह बना लेंगे।

अगर आप मीडिया में आने के लिए आमादा हैं तो कम से कम किसी मीडिया हाउस द्वारा चलाये जा रहे मीडिया कोर्स में कतई एडमिशन न लें। अगर मैं देश का शिक्षा मंत्री होता तो ऐसे कोर्सों के माध्यम से किशोरों के शोषण के लिए मीडिया हाउसों पर मुकदमा चलवाता। याद रखिए जितनी सम्भावना मेरे शिक्षा मंत्री बनने की है उतनी ही सम्भावना आपके मीडिया हाउस से पत्रकारिता करके बड़ा पत्रकार बनने की होगी।

मीडिया कोर्स करना है तो ग्रैजुएशन के बाद कोई सरकारी या फिर सस्ता कोर्स चुनिये। किसी नामी सरकारी संस्थान में एडमिशन न हो तो इग्नू से पत्रकारिता कर लीजिए। काम सीखना है तो किसी भी आसपास के अखबार/टीवी/न्यूजसाइट वगैरह में तीन-चार महीने इंटर्नशिप कर लीजिए। लाखों रुपये देकर किसी फर्जी मीडिया संस्थान से जाली पढ़ाई करने से बेहतर होगा कि आप उन लोगों से काम सीखें जिन्हें काम आता है। इसका दूसरा फायदा यह होगा कि आप जन्नत की हकीकत भी जान जाएंगे।

मीडिया में आना चाहते हैं तो 35-40 साल की उम्र तक रिटायर होने के लिए भी तैयार रहिए। मीडिया में 40+ के ऊपर अब उन्हीं के पास जॉब है जो टीम लीडर या सेक्शन हेड सरल भाषा में कहें तो मैनेजरी वाले रोल में हैं। मैनेजरी वाले रोल की रिटायरमेंट वाली सीमा 50 साल है। 50 के ऊपर आप तभी बचेंगे जब आपके पास कोई लाइजनिंग या सेल्स एंड मार्केटिंग स्किल होगी। यह भी याद रखें कि मीडिया में ठीक से नौकरी करने लायक मुश्किल से दस-पंद्रह संस्थान हैं। इन पंद्रह संस्थानों के छोटे-मझोले-बड़े मैनेजरों की कुल संख्या गिन ली जाए और मीडिया कोर्सों की संख्या गिन ली जाए तो मेरे ख्याल से इस वक्त जितने लोग भी मीडिया की पढ़ाई कर रहे हैं उन सभी क्लास में बमुश्किल एकाध बच्चा ही 35-40 तक मैनेजर बन पाएगा। बाकी इस उम्र तक रिटायर हो जाएंगे।

ऊपर मैंने सामान्य अंकगणित के हिसाब से एक कोर्स एक मैनेजर टाइप जुमला गढ़ने की बचकानी कोशिश की है। आप भी जानते हैं कि स्कूल की कॉपी के बाहर असली दुनिया में कोई सीधी रेखा नहीं होती। आप अगर कठकरेजा हैं और एक कोर्स एक मैनेजर के जुमले पर आस बाँध रहे हैं कि वह एक मैं ही बनूँगा तो आपसे मेरा अनुरोध है कि आगे बढ़ने से पहले वर्तमान मैनेजरों की पृष्ठभूमि देख लें। अभी एक-दो दिन पहले कॉमस्कोर की शीर्ष हिंदी न्यूज वेबसाइटों के मैनेजरों का नाम सोशलमीडिया पर घूम रहा है। उस लिस्ट को आप जाति, क्षेत्र या संस्थान जिस कोण से देखेंगे आपको दिख जाएगा कि मैनेजर बनने-बनने तक एक कोर्स एक मैनेजर का औसत पीछे छूट जाता है।

ऐसा नहीं है कि टॉप 15 न्यूजसाइटों का ही यह हाल है। टॉप 15 के बाद जो 15 हैं उनका भी वही हाल है। टॉप 15 के बाद वाले 15 को आप इंडिया ए की टीम समझिए यानी जब इंडिया टीम वाले रिटायर या रिटायर्ड हर्ट होंगे तो उनकी जगह टॉप 15 के बाद वाले 15 में से कुछ लोग टॉप 15 में आ जाएँगे। यह सिलसिला सिलसिला फिल्म की तरह एवरग्रीन है। जाति, क्षेत्र और संस्थान के रैकेट सभी औसत पर भारी पड़ते हैं। साल-दस साल में एकाध अपवाद सामने आ सकते हैं लेकिन यदि आप अपवाद के सहारे अपना करियर चुनना चाहते हैं तो आप महान हैं।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.