Home राजनीति चुनावी चादर हुई लहूलुहान

चुनावी चादर हुई लहूलुहान

प.बंगाल में आठ चरणों में चुनाव करवाने के पीछे निर्वाचन आयोग का तर्क था कि सुरक्षा बलों की व्यवस्था के कारण ऐसा करना पड़ा। लेकिन निर्वाचन आयोग का ये तर्क चौथे चरण के मतदान में ही दम तोड़ता दिख गया। राज्य में 10 अप्रैल को चौथे चरण के मतदान के दौरान कूचबिहार के सीतलकुची में एक मतदान केंद्र पर हिंसक झड़प में चार लोगों की मौत हो गई। तीन चरणों तक बंगाल में मतदान शांतिपूर्ण संपन्न हुए थे, तो बड़ी राहत थी कि राजनैतिक दलों के तमाम उकसावे और भड़काऊ बयानों के बावजूद किसी तरह की हिंसा मतदान के दौरान नहीं हो रही। लेकिन 10 अप्रैल को सीतलकुची में सीआईएसएफ के जवानों की कुछ स्थानीय लोगों से झड़प हुई, जिसमें सुरक्षा बलों को गोलीबारी करनी पड़ी।

सीआईएसएफ़ का कहना है कि 150 लोगों का एक झुंड आया और इन लोगों ने बूथ नंबर 186 पर पहुंचकर वहां तैनात कर्मचारियों के साथ अभद्रता शुरू कर दी। उन्होंने बूथ पर तैनात होम गार्ड और आशा कार्यकर्ता से मारपीट की। कुछ लोगों ने सीआईएसएफ़ के कर्मियों से हथियार लूटने की कोशिश भी की। इसके बाद केंद्रीय बल के जवानों ने हवा में दो गोलियां चलाईं लेकिन लोग मनमानी करते रहे। इसी बीच, क्यूआरटी की टीम जब वहां पहुंची तो भीड़ सीआईएसएफ़ के जवानों की ओर बढ़ने लगी। अपनी जान को ख़तरे में देख जवानों ने भीड़ पर सात और गोलियां चलाईं। जबकि स्थानीय लोगों ने बताया कि सीतलकुची के जोड़ापाटकी इलाके में टीएमसी और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प होने से तनाव पहले से था, लेकिन मतदान करने आए लोगों पर सीआईएसएफ के जवानों ने बिना किसी उकसावे के गोलियां चलाईं।

एक ही घटना के जब दो अलग-अलग तरीकों से वर्णित हो, तो वहां निष्पक्ष जांच की जरूरत होती है। लेकिन फिलहाल लगता नहीं कि इस मामले में किसी तरह की निष्पक्षता दिखाई जाएगी। भाजपा और टीएमसी तो इस घटना पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेलने लगे हैं, वह भी सीधे उच्च स्तरीय। प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुरु से ये कहती आ रही हैं कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए सारे पैंतरे आजमा रही है और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर रही है। और इस घटना के बाद वे अपने इस आरोप को कुछ और जोर से सही साबित करने में लगी हैं। इस घटना के बाद उन्हें कूचबिहार नहीं जाने दिया गया, इसे लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए। जबकि गृहमंत्री अमित शाह सीतलकुची में गोलीबारी की घटना को ममता बनर्जी के उकसावे का परिणाम बता रहे हैं। केंद्र और राज्य की सत्ता में बैठे लोगों का इस तरह सीधे किसी निष्कर्ष पर पहुंचना ये बताता है कि वे इस घटना से राजनैतिक लाभ हासिल लेने की कोशिश में हैं, जबकि उनकी राजनीति के खेल में चार लोग असमय इस दुनिया से चले गए हैं।

निर्वाचन आयोग को भी सीतलकुची की घटना के बाद आत्ममंथन की जरूरत है कि आखिर कुछ लोगों को प्रसन्न करने के लिए अपनी साख वह कब तक दांव पर लगाएगा। आयोग एक स्वायत्त, संवैधानिक संस्था इसलिए बनाई गई है, क्योंकि उस पर निष्पक्ष, पारदर्शी चुनाव करवाने की जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी को पूरा करने का मतलब है देश में लोकतंत्र की मजबूती सुनिश्चित करना। लेकिन चुनाव दर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और फैसलों पर सवाल उठने लगे हैं। प.बंगाल का राजनैतिक माहौल अन्य चुनावी राज्यों से अधिक गर्म रहने वाला है, इसका अंदाज चुनावी रैलियों को देखकर ही हो रहा था, बावजूद इसके आयोग ने पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती। ये कोई छात्रसंघ चुनाव तो है नहीं, जहां मतदान केंद्र पर अचानक छात्रों की कोई टोली जा पहुंची और हालात संभालने के लिए गोलियां चलानी पड़ीं। जब सौ-डेढ़ सौ लोग एक जगह इकठ्ठा हो रहे थे, तभी कोई एहतियाती कदम क्यों नहीं उठाया गया। झड़प जैसा माहौल बनने से पहले ही थोड़ी सख्ती दिखा दी जाती तो चुनावों पर खून के धब्बे नहीं लगते।

सीतलकुची कांड पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का बयान काफी निंदनीय है। उन्होंने कहा कि ऐसे शरारती लड़के जो समझते थे कि केंद्रीय बलों की राइफ़ल चुनावी ड्यूटी के दौरान सि$र्फ दिखाने के लिए है, वे सीतलकुची में जो ग़लती की, उसे नहीं दोहराएंगे। ऐसा पूरे बंगाल में होगा। अगर किसी ने भी क़ानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश की तो यह उसके साथ भी होगा। इन शब्दों के साथ उन्होंने चार लोगों की मौत को सही ठहराया है और एक तरह से धमकी भी दी है। दिलीप घोष पर टीएमसी कार्रवाई की मांग कर रही है। देखना होगा कि निर्वाचन आयोग यहां अपना कर्तव्य निभाता है या नहीं। आयोग के साथ भाजपा के फैसले का भी इंतजार रहेगा कि वह अपने प्रदेश अध्यक्ष के बयान पर क्या कदम उठाती है।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.