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अब शायद ही कोई साहित्य प्रेमी हंसते हुए गा पाएगा ‘राग दरबारी’

By   /  October 28, 2011  /  1 Comment

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ज्ञानपीठ पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित तथा राग दरबारी जैसा कालजयी व्यंग्य उपन्यास लिखने वाले मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल का शुक्रवार को सहारा अस्पताल में निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार 16 अक्टूबर को पार्किन्सन के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां शुक्रवार की सुबह 11.30 बजे उन्होंने दम तोड़ दिया।

31 दिसंबर 1925 में लखनऊ के अतरौली गांव में जन्मे शुक्ल वैसे तो आजादी के फौरन बाद के रुतबेदार नौकरशाह रह चुके थे, लेकिन उनकी पहचान इससे कहीं ज्यादा थी। 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल कर उन्होंने 1949 में राज्य सिविल सेवा में अपनी नौकरी शुरू की और 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश ग्रहण किया था। हरिशंकर परसाई के बाद उनकी गिनती उन्हीं के स्तर के बडे़ व्यंग्यकार के तौर पर होती थी।

शुक्ल का पहला उपन्यास 1957 में ‘सूनी घाटी का सूरज’ छपा था और उनका पहला व्यंग्य संग्रह ‘अंगद का पांव’ 1958 में छपा था। उन्हें 1969 में राग दरबारी के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इस उपन्यास ने उन्हें हिन्दी साहित्य में अमर बना दिया। वह अकादमी का पुरस्कार पाने वाले हिन्दी के सबसे कम उम्र के लेखक थे। राग दरबारी का अनुवाद अंग्रेजी के अलगावा 15 भारतीय भाषाओं में हो चुका है।

उन्हें ‘विश्रामपुर का संत’ उपन्यास के लिए व्यास सम्मान से भी नवाजा गया। उन्हें लोहिया सम्मान, यश भारती सम्मान, मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार और शरद जोशी सम्मान भी मिला था। वह भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ के निदेशक तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की मानद फैलोशिप से भी सम्मानित थे।

उनकी प्रसिद्ध कृतियों में ‘जहालत के पचास साल’, ‘खबरों की जुगाली’, ‘अगली शताब्दी का सहर’, ‘यह घर मेरा नहीं’, ‘उमराव नगर में कुछ दिन’ भी शामिल है। एक लेखक के रुप में उन्होंने ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैंड, सूरीनाम, चीन, युगोस्लाविया जैसे देशों की भी यात्रा कर भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

शुक्ल ने आजादी के बाद भारतीय समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, पाखंड, अंतर्विरोध और विसंगतियों पर गहरा प्रहार किया। वह समाज के वंचितों और हाशिए के लोगों को न्याय दिलाने के पक्षघर थे। तीस से अधिक पुस्तकों के लेखक श्रीलाल शुक्ल के निधन पर भारतीय ज्ञानपीठ, जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ ने गहरा शोक व्यक्त किया है।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. Rajkumar Chopra says:

    श्रीलाल शुक्ल जी was a great लेखक philospher and margdarshak . उनकी कृतियाँ सदैव अमर रहेंगी. रागदरबारी तो उनकी सबसे चर्चित कृति थी लेकिन उनका अंदाज़ ए बयां उनकी सभी कृतियों में एक सा था. उनको शत शत नमन और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्राथना. इलाहाबाद से उनका लगाव उनके इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी. ए. करने से ही हो गया था. राजकुमार चोपड़ा, Allahabad

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