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डिजिटल मोदी की डिजिटल राजनीति

-जगदीश्वर चतुर्वेदी॥

नरेन्द्र मोदी की भाषणकला के सब कायल हैं।उनके भाषणों ने एक नए किस्म के श्रोता समुदाय को विकसित किया है।मीडिया और साइबर मीडिया में नए भाषिक छंद को जन्म दिया है।इस भाषिक छंद का नाम है ‘‘अधिनायकवादी छंद’’।दिलचस्प है वे अपने भाषणों में विचारधारा की प्रत्यक्ष बातें कम करते हैं,आम जनता की समस्याओं और सरकारी सुविधाओं और अपने कामों का उल्लेख अधिक करते हैं।उनके कथन में ‘अंतर्वस्तु’महत्वहीन होती है,महत्वपूर्ण होता है ‘भाषण’।उन्होंने ‘भाषण के लिए भाषण’ की कला का रूढिवादी दरबारी शैली में विकास किया है।वे भाषण के जरिए शब्दवर्षा करते हैं। श्रोताओं,मीडिया और साइबर मीडिया को व्यस्त रखते हैं। उनकी शब्दवर्षा ने ‘अधिनायकवादी वाचिक क्रांति’ को जन्म दिया है।उनके भाषण सबसे अधिक सुने और देखे जाते हैं।एक समुदाय है जिसे वे अपने भाषणों से मंत्रमुग्ध करते हैं।शाब्दिक वर्षा के जरिए वे ‘तर्क’ और ‘विवेक’ को सीधे निशाने पर रखते हैं।‘तर्क’ और ‘विवेक’ के साथ भाषिक हिंसाचार करते हैं।इस बमबारी के जरिए वे श्रोता को बंद गली में ले जाकर बंद कर देते हैं।उसके स्वतंत्र चिन्तन और स्वतंत्र एक्शन पर अप्रत्यक्ष ढ़ंग से प्रतिबंध लगा देते हैं।उनके श्रोता को बाहर निकलना तब तक संभव नहीं है जब तक वह उनके भाषणों से घिरा हुआ है।उनकी अवचेतन भाषा में डूबा हुआ है।ये भाषण श्रोता में दर्शकीय भाव पैदा करते हैं।समाज से दूर ले जाते हैं।श्रोता को ‘आस्था’ में बांधते हैं और इसके कारण श्रोता ‘अविवेकवाद की लंबी सुरंग’ में कैद हो जाता है।

मोदी ने अपने भाषणों में ‘संवाद’ की शैली का इस्तेमाल किया है।‘संवाद’ की शैली सहज ही संप्रेषित करने में मदद करती है साथ ही श्रोता को सहज रखती है।श्रोता को यही लगता है कि मोदी जो कह रहे हैं वह तो उसके मन की बात है,जानी-पहचानी बात है।इस क्रम में मोदी ने कईबार डाटा,तर्क,ज्ञान और समस्या को पेश करते हुए समाधान भी पेश किए हैं।इन सबका सामाजिक यथार्थ से कम और काल्पनिक यथार्थ से अधिक संबंध है।इस प्रक्रिया में वे श्रोता की आस्था का ख्याल रखते हैं।उसकी आस्थाओं को अस्त-व्यस्त नहीं करते।अपदस्थ नहीं करते।यथास्थिति बनाए रखते हैं।उनके भाषणों का श्रोता ज्योंही वास्तविकता के साथ उनके भाषणों को मिलाकर देखता है उसके मन में टकराहट शुरू होती है।क्योंकि वे ‘अविवेकवाद’ को संजाते-संवारते हैं,यह ‘अविवेकवाद’ उसकी सामाजिक-आर्थिक यथार्थ को देखते समय मदद नहीं करता।फलतःमोदी और उनके श्रोता के बीच बने राजनीतिक संबंध में दरार पैदा होती है।मोदी के भाषण और ‘विवेकवाद’ में टकराव पैदा होती है।

मोदी के भाषणों और श्रोता की अज्ञानता के सम्मिश्रण के कारण एक नए किस्म की अंधभक्ति या मोदीभक्ति पैदा हुई है। यह विवेकपूर्ण तर्कों को सुनने,समझने और देखने नहीं देती। इसका प्रधान कारण है मोदी का ‘कॉमनसेंस’ के पैराडाइम पर खड़े होकर सम्बोधित करना।वो जब बोलते हैं तो श्रोता की नजर उन पर होती है ,उनके भाषण की अंतर्वस्तु पर नजर नहीं होती।वह मोदी के जादुई असर में रहता है और उनके भाषण की अंतर्वस्तु, उसमें कहे गए तथ्य और सत्य को यथार्थ की कसौटी पर कसता ही नहीं है।मोदी ने अपनी भाषणकला में ‘संदर्भ’ को महत्वहीन बनाया है।

मोदी के भाषण ‘अविवेकवाद’ के तर्कशास्त्र से कसकर बंधे होते हैं।‘ अविवेकवादी तर्कों के जादुई असर के कारण श्रोता उनके भाषणों में व्यक्त अंतर्वस्तु,तथ्य,सत्य,डाटा आदि को यथार्थ की कसौटी पर रखकर कभी नहीं परखता।वह भाषण में कहे गए तथ्यों की जांच नहीं करता,उलटे अंधभक्त की  तरह मान लेता है।इस प्रक्रिया में वे अपने तर्कों को वैध बनाने में सफल हो जाते हैं।अविवेकवाद को संवैधानिक संस्थानों के अंदर दैनंदिन उत्पादन-पुनर्रूत्पादन करने में सफल हो जाते हैं। उनके भाषणों में बुद्धिजीवियों जैसी जटिलता नहीं होती।

नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में सचेत ढ़ंग से विवेकपूर्ण भाषा के शब्दों का प्रयोग नहीं करते।वे उन वाक्य और पदबंधों का इस्तेमाल नहीं करते जो विवेक युक्त हैं।कम्युनिकेट करते समय वे जिस अंतर्वस्तु को संप्रेषित करते हैं उसे ‘ सही संदर्भ से काटकर पेश करते हैं।इस प्रक्रिया में ‘भावुकता’ और ‘उन्माद’ के तत्व को सक्रिय करते हैं।उनके भाषणों में हर चीज एक ‘रूपकीय राजनीतिक कहानी’ के रूप में दाखिल होती है। उसे ‘रूपक की भाषा’ में पेश करते हैं।इस प्रक्रिया में शब्दों को उनके असली अर्थ से वंचित कर देते हैं।खोखला कर देते हैं। श्रोता की स्वतंत्रचेतना को बाधित करते हैं। उसे स्वतंत्र रूप से सोचने नहीं देते।जब श्रोता स्वतंत्र नहीं होगा तो उसके मन में स्वतंत्र विचार भी नहीं आएंगे।इस प्रक्रिया में श्रोता उनसे बंधता है।उनका अनुयायी या भक्त बनता है।इसे सामान्य भाषा में राजनीतिक कैद कहते हैं।यह मीठी कैद है जिसमें श्रोता पूरी तरह विवेकवाद से मुक्त होता है, सोचने और विश्लेषित करने से मुक्त होता है।

‘अधिनायकवादी कहानी’ श्रोता को बांधती है।श्रोता इस कहानी का गुलाम होता है। वह कहानी के बाहर देखने-समझने के लिए तैयार नहीं होता।इसमें प्रस्तुत भाषण में अंतर्वस्तु के विस्तार की संभावनाएं नहीं होतीं।यही वजह है कि मोदी के अनुयायी मोदी के बताए आख्यान और तर्कों से परे जाकर सोचने-समढने-विश्लेषित करने को तैयार नहीं होते।उसके बाहर के यथार्थ के साथ तुलना करने को राजी नहीं होते।‘अधिनायकवादी कहानी’ की भाषा में अंतर्वस्तु के विस्तार का अभाव होताहै।कट्टरता और अपरिवर्तनीयता होती है। इसमें ‘भीड़’ सृजित करने और विवेक हरण की ताकत है।यही वजह है मोदी के भाषणों ने विवेकहीन भीड़ का सृजन किया है।इसमें ‘संख्याबल’ पर मुख्य जोर है।यहां ‘तर्क’,‘विवेक’ और ‘सत्य’ से बड़ा है ‘संख्या बल’।मोदी के भाषणों ने जिस भीड़ की सृष्टि की है वह अधिनायकवाद की पूजा करती है और लोकतंत्र से नफरत करती है।यह वह भीड़ है जिसके लिए मोदी के भाषण का संविधान से ऊपर महत्व है।संविधान और संवैधानिक मूल्य और मान्यताएं उसके लिए बेकार हैं।

मोदी ने ‘अधिनायकवादी रूपकीय आख्यान’ के जरिए सभी किस्म की विचारधाराओं को अस्वीकार किया है और एक नए किस्म के वैचारिक नकारवाद पैदा किया है।इस नकारवाद को उन्होंने ‘विकास’ की आड़ में वैध बनाने की कोशिश की है।साथ ही इसमें ‘धर्म की भाषा’ को समाविष्ट किया है।मोदी के ‘राजनीतिक आख्यान’ मूलतः धर्म की भाषा के कंधों पर सवार होकर आए हैं।इससे जहां एक ओर बहुसंख्यकवादी राजनीति के आधार पर जनता को गोलबंद किया गया वहीं दूसरी ओर भाषा और यथार्थ में अलगाव को और भी गहरा बनाया गया।

‘धर्म की भाषा’ की केन्द्रीय विशेषता यह है कि उसे आर्थिक यथार्थ की कसौटी पर परख नहीं सकते।धर्म की भाषा,सामाजिक -आर्थिक यथार्थ से पूरी तरह कटी होती है।मोदी की भी भाषा सामाजिक-आर्थिक यथार्थ से पूरी तरह कटी हुई है।इस भाषा में ‘आस्था’ पर है।बहुसंख्यकवाद को वैधता प्रदान की गई है।‘संख्याबल’ इसके तर्क का सेतु है। बहुसंख्यकवाद के बहाने वे सामाजिक सद्भाव-धार्मिक सद्भाव और धर्म को अपदस्थ करते हैं और अधिनायकवाद की जमीन तैयार करते हैं।समाज को नए सिरे से जातियों के समूहों में गोलबंद करते हैं।जाति समूहों को बनाते समय संस्कृति, सांस्कृतिक कार्यक्रमों ,सांस्कृतिक-धार्मिक, पर्व-उत्सवों का बहाने के रूप में इस्तेमाल करते हैं।इस क्रम में वे संस्कृति के मृतरूपों को जिंदा रखने की कोशिश करते हैं और संस्कृति के जीवन्त रूपों की अवहेलना करते हैं।असल में उनके भाषणों में संस्कृति,राष्ट्रवाद,हिन्दूधर्म आदि एक तरह से आम जनता को मानसिक बंदिशों और घेरेबंदी में कैद करने के उपकरण हैं।इनका उनकी हिन्दूधर्म के प्रति निष्ठा से गहरा संबंध है।

मोदी जब बोलते हैं तो ‘पुंसवादी निश्चितता’ या ‘दावे’ के साथ बोलते हैं।‘निश्चित’ के बिना उनका कम्युनिकेशन पूरा नहीं होता। साथ ही ‘वायनरी अपोजीशन’ में अपने तर्क पेश करते हैं।इस प्रक्रिया में ‘तथ्यों की जांच-पड़ताल’ को अर्थहीन बनाते हैं।संप्रेषण को प्रभावशाली बनाने के लिए ‘नाटकीयता’ और ‘सुंदरता’ का खास ख्याल रखते हैं और ‘संवाद का अपहरण’ कर लेते हैं।बीच बीच में ‘धमकी’ भी देते हैं।इससे वे सुनने वाले को तटस्थ बनने के लिए मजबूर करते हैं। उनका इस तरह का अंदाज बताता है कि ‘अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त’ है।मोदी की भाषा में ‘रिएक्शन’ के लिए कोई जगह नहीं है।आपके सामने एक ही विकल्प होता है कि मोदी जो कह रहे हैं उसे नतमस्तक होकर स्वीकार करो।यदि स्वीकार नहीं करते हो तो राष्ट्र शत्रु घोषित कर दिए जाओगे।उनके भाषण में एक्शन हमेशा एडवांस में चलते हैं।यही वजह है मोदी को सही रूप में देखना हो तो उनके भाषणों में नहीं उनके ‘एक्शन’ में देखो।मोदी के ‘एक्शन’ में ‘तर्क’ के लिए कोई जगह नहीं है।वे बार बार कहते हैं यह ‘एक्शन का समय है’।यह सबसे बड़ी अविवेकपूर्ण स्थिति है।उनके एक्शन में शामिल होना अनिवार्य और अपरिहार्य है।वे एक्शन को अस्वीकार करने वाला कोई तर्क मानने को तैयार नहीं हैं।

मोदी जब भी बोलते हैं अतीत को केन्द्र में रखकर बोलते हैं और भविष्य में निश्चित हल का वादा करते हैं।वे भविष्य को ही वर्तमान बनाकर और स्वयं को ‘मुक्तिदाता’ के रूप में पेश करते हैं।भौतिक मुद्दों का आध्यात्मिकीकरण करते हैं।युद्ध की भाषा बोलते हैं।हरेक काम युद्धस्तर पर करते हैं। नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक आभामंडल को बनाने में मीडिया और साइबर तकनीक की केन्द्रीय भूमिका रही है।इस समूचे मीडिया परिदृश्य की खूबी है ‘‘खुला नेटवर्क ,बंद दिमाग’’ , इस नेटवर्क के माध्यम से जिनलोगों ने नए भावबोध को ग्रहण किया है उनमें बड़ी संख्या इन लोगों की है जिनको मोदी पसंद है,लेकिन इनमें अधिकतर वे लोग हैं जिनका बंद दिमाग है या संकीर्ण-कट्टर विचारों एवं मूल्यों से बंधा दिमाग है।

इंटरनेट के विस्तार ने मीडिया के विकास और विस्तार की नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं।इससे खुलेपन के छद्म आभास की सृष्टि हुई है।असल में यहां कम्युनिकेशन प्रवाह है लेकिन इसके अंदर जिस तरह की अंतर्वस्तु का प्रवाह है वह दिमाग को खोलने में असमर्थ है। यहां कम्युनिकेशन की 24घंटे मौजूदगी है लेकिन इस मीडियम की प्रकृति खुले मीडियम की नहीं है।यह मीडियम बंद दिमाग,संकीर्ण जीवन मूल्य,कट्टरता आदि को सहज की विकसित करता है।यह इसकी मीडिया प्रकृति का अंग है।यही वजह है सारी दुनिया में इंटरनेट के  आने बाद संकीर्णतावाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, समानता आदि मूल्यों को लेकर बड़े पैमाने पर नफरत पैदा हुई है।यह ग्लोबल फिनोमिना है।नेटवर्क के उदय के बाद ‘स्वतंत्रता’ के स्थान पर ‘अविवेकवाद की स्वतंत्रता’ , सत्य की स्वतंत्रता स्थान पर ‘झूठ की स्वतंत्रता और स्वीकृति’ का प्रचार-प्रसार अधिक हुआ है। इसके कारण ही कहा गया खुला नेटवर्क और बंद दिमाग।

नरेन्द्र मोदी के डिजिटल परिप्रेक्ष्य पर बात करते समय जहां एक ओर मोदी के मिथों से बाहर निकलकर भारत की राजनीति-अर्थनीति-संस्कृति आदि पर विचार करने की जरूरत है,उसी तरह डिजिटल क्रांति के मिथों से बाहर निकलकर डिजिटल कल्चर,वर्चुअल कल्चर पर बातें करने की जरूरत है।सामाजिक –आर्थिक परिवर्तन जमीन पर हो रहे हैं.उनको मीडिया-साइबर के सरकारी दावों के आधार पर स्वीकार करने की बजाय देश के यथार्थ के आधार पर परखना चाहिए।मोदी के अनुयायियों( मीडिया-साइबरयूजर और वोटर) की मुश्किल यह है कि वे मोदी की नीतियों को उनके बयानों के आधार पर वैध मानकर चल रहे हैं।सही मानकर चल रहे हैं,वे मोदी और उनकी सरकार के दावों की भारतीय समाज की वास्तविकता के आधार पर परीक्षा करने को तैयार नहीं हैं।यह एक तरह का मोदी-हठ है।

मोदी हठी लोगों के एक समुदाय का जन्म हुआ है।ये लोग बुनियादी तौर पर जिद्दी,अतार्किक और कल्पनाजीवी है।उसे कल्पना में रहने में आनंद मिलता है।देश की वास्तविकता उनको अपने तार्किकबोध के सामने बेकार लगती है।वे विरोध के किसी भी तर्क को राजनीति और मोदी विरोध से प्रेरित कहकर खारिज करते हैं।मोदी हठी लोगों का यह ऐसा समुदाय है जिसे तर्क के आधार पर सहमत नहीं करा सकते।ये लोग बुनियादी तौर पर वे हैं जिनको अधिनायकवादी राजनीति पसंद है। लोकतंत्र की प्रक्रिया और लोकतांत्रिक मूल्यों से ये नफरत करते हैं और विभिन्न तरीकों,नीतियों और एक्शन के जरिए इन समूह की मनोदशा को मोदी की विचारधारा ने निर्मित किया है।दिलचस्प बात यह है मोदी के अनुयायियों(मीडिया और व्यक्तियों) में अतीत के राजनीतिक पूर्वाग्रहों को व्यापकतौर पर सक्रिय किया है और उनको पुख्ता बनाया है।यह ऐसा समुदाय है जिसे अपने नजरिए से भिन्न तर्क और विश्लेषण नापसंद है।ये लोग किसी भी मसले पर ठहरकर,स्थिर होकर खुले मन से मित्र-संवाद नहीं कर सकते।इनके लिए सोचने का अर्थ है मोदी के मिथों में सोचना और उनके ही तर्कों में जीना।नेटवर्क कल्चर ने उसके इसी हठी भाव को पुख्ता बनाया है और उनमें सोचने-समझने की आदत को क्षतिग्रस्त किया है।

मोदी के नजरिए और डिजिटल पैराडाइम का बुनियादी आघार है ‘गूगल मॉडल’ (गूगल सैद्धांतिकी) गूगल सैद्धांतिकी कम्युनिकेशन वर्चस्व पर केन्द्रित है।इस सैद्धांतिकी की केन्द्रीय विशेषता है ‘सिस्टम की खामियों’ को उजागर करो और वर्चस्व स्थापित करो।मोदी के प्रत्येक भाषण में ‘सिस्टम की खामियों’ पर मुख्य जोर रहता है।‘सिस्टम की खामियों’ के बहाने वे अपने वर्चस्व और झूठ का वैचारिक विस्तार करते हैं।झूठ का विस्तार और विकास कैसे हुआ,इस पर विचार करने की जरूरत है।पहले कहा गया टीवी-रेडियो पर से सरकारी नियंत्रण हटाओ।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विकास के लिए यह जरूरी है।इसके आधार पर टीवी-रेडियो का निजीकरण किया गया।दूरसंचार पर से सरकारी नियंत्रण खत्म करो,रेडियो तरंगों का आवंटन करो,इसके आधार पर दूरसंचार का निजीकरण किया गया।इस तरह की मांगों के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह था कि स्वतंत्रता और विवेक के विकास और स्वस्थ कम्युनिकेशन प्रतिस्पर्धा में सरकारी नियंत्रण बाधक है।लेकिन आज परिणाम हम सबके सामने हैं।सरकारी प्रतिबंध खत्म होने के बाद समाज में स्वतंत्रता का विकास होने की बजाय सरकारी संसाधनों की लूट बढ़ी है।सरकारी तंत्र में चल रहे मीडिया-दूरसंचार तंत्र को पंगु बनाकर निजी क्षेत्र का वर्चस्व स्थापित करने में केन्द्र सरकार लगी हुई है।इससे संचार के लोकतांत्रिकीकरण,स्वतंत्रता के विस्तार,सत्य के प्रचार-प्रसार में बाधाएं आई हैं।निजी क्षेत्र में चंद कंपनियों के हाथों समूचा मीडिया और दूरसंचार तंत्र केन्द्रित हो गया है।वे सभी किस्म के प्रसारण नियमों,प्रकाशन नियमों,प्रेस की स्वतंत्रता,खबरों की स्वतंत्रता आदि के खिलाफ सक्रिय होकर काम कर रहे हैं।आज वास्तविकता है कि मीडिया जनता और सत्य से मित्रता के नजरिए को त्यागकर ‘स्टॉक मार्केट’,सत्ता के प्रौपेगैंडा, मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा अभियान, आरएसएस के प्रचार अभियान,फेक न्यूज वर्षा,मृत खबरों के प्रसारण और  चर्चित व्यक्तियों और मॉडल चर्चा के मीडियम के रूप में विकास किया है।इस सबसे नागरिकचेतना और लोकतांत्रिक चेतना का विकास बाधित हुआ है।इस सबने मिलकर नए किस्म के मीडिया परिवेश और मीडियाचेतना की सृष्टि की है,इसमें फेक ,अतार्किक और अयथार्थ महत्वपूर्ण है।इन सबने मिलकर ‘ संघी अतिवाद’ की शक्ल अख्तियार कर ली है।इसने यथार्थ या रीयल में आस्था को क्षतिग्रस्त किया है।प्रौपेगैंडा को मूल्यवान और महत्वपूर्ण बनाया है।प्रौपेगैंडा में आमलोग विश्वास करने लगे हैं।उनको अ-यथार्थ मसले पसंद हैं।यथार्थ मसलों से वे नफरत करते हैं।यही वजह है कि मीडिया ने खासकिस्म की मानसिक अवस्था निर्मित की है।इसमें यथार्थ समाज, वास्तविक समस्या और सही तथ्यों के साथ –साथ लोकतांत्रिक आंदोलनों से मध्यवर्ग की दूरी बढ़ी है।यहीवजह है मध्यवर्ग के लोग या मीडिया उपभोक्ता नए नागरिकता कानूनों के खिलाफ चले जनांदोलन को संदेह की नजर से देख रहे थे.इन दिनों वे किसान आंदोलन को संदेह की नजर से देख रहे हैं।कहने का आशय यह कि मीडिया ने गलत और अवास्तविक में व्यस्त रहने, उस पर विश्वास करने की मनोदशा निर्मित की है।सरकार ने इस स्थिति का फायदा उठाकर जनांदोलन करने वाले नेताओं पर झूठे मुकदमों का तांता लगा दिया है।         

मोदी ने अपने प्रचार के जरिए  लोकतंत्रविरोधी आंधी,साम्प्रदायिक आंधी,घृणा की आंधी पैदा की है।दूसरी ओर इंटरनेट यूजर को सरकारी नीतियों के विश्लेषण-विवेचन से दूर ह्वाटस एप मैसेज का गुलाम बना दिया है।अब ये मैसेज ही उसके मुख्य खाद्य हैं।अब जमीनी स्तर पर लोकतंत्र और अपने हकों के लिए लड़ने की बजाय लोग डिजिटल दुनिया की वैचारिक  जंग में मशगूल हैं। यह नई संस्कृति है जो बताती है जुलूस में मत जाओ।नेट पर जाओ।जुलूस में नारे मत लगाओ,ह्वाटस एप मैसेज करो।नारे मत लगाओ,ट्विट करो।लोकतांत्रिक आंदोलन का हिस्सा मत बनो, फेसबुक पोस्ट लिखो।इस तरह फेक किस्म की लोकतांत्रिक सक्रियता को नेट सक्रियता के बहाने महत्व दिया जा रहा है।असल समस्या है वास्तविक जीवन में जनांदोलन खड़े करने की, जनांदोलनों से जुड़ने की। जनांदोलनों से जुड़े बिना सामाजिक परिवर्तन,मनुष्य के जीवन में परिवर्तन या सरकारी नीतियों में परिवर्तन संभव नहीं है।इंटरनेट कम्युनिकेशन तो उसका पूरक है।

इंटरनेट और टीवी न्यूज चैनलों के टॉक शो देखकर राय बनाने की आदत का सबसे बुरा असर यह पड़ा है कि आम जनता की नीतियों के सवालों पर विचार करने की आदत खत्म हो गई है।किसान आंदोलन ने इस स्थिति को चुनौती दी है।किसानों में नीतिगत सवालों पर जमकर प्रचार और संवाद हो रहा है।वहीं दूसरी ओर नियोजित न्यूज,नियोजित टॉक शो,नियोजित हिंसा आदि की प्रवृत्ति बढ़ गई है।पूर्वाग्रहों की बाढ़ आ गयी है।मृत मूल्यों और संस्कारों को पुनर्रूज्जीवित किया जा रहा है।नीतिगत अचेतनता और सामाजिक भाईचारे में गिरावट आई है।सूचनाएं संदर्भहीन ढ़ंग से प्रवाहित हो रही हैं।इस प्रवाह को बनाने में गूगल और सोशलमीडिया की केन्द्रीय भूमिका है।सवाल उठता है क्या हम गूगल या सोशल मीडिया के बारे में सवाल उठा रहे हैं ॽउनके सूचना कदाचार ,कु-कम्युनिकेशन और कु-खबरों के तंत्र और परिप्रेक्ष्य को चुनौती दे रहे हैं ॽअब तक का रवैय्या निराशाजनक रहा है।लोकतंत्र को बचाने के लिए गूगल और सोशल मीडिया के कदाचार के बारे में सवाल उठाने और इन कंपनियों पर दबाव पैदा करने की जरूरत है।इंटरनेट और टीवी न्यूज चैनलों के आने के बाद से देश में लोकतंत्र कमजोर हुआ है।अधिनायकवाद और साम्प्रदायिकता बढ़ी है।सामाजिक विभाजन और एक-दूसरे के प्रति नफरत और अविश्वास में इजाफा हुआ है।


इंटरनेट के बारे में यह मिथ है कि वह कम खर्चीला है।असल में वह बहुत खर्चीला है।आप इंटरनेट से कोई भी चीज मुफ्त में हासिल नहीं कर सकते।इंटरनेट फार्मूला है ‘बार बार आओ-खर्च करके जाओ।’इंटरनेट बहुत प्रभावशाली माध्यम है लेकिन मनुष्य के संकट के क्षणों में यह मीडियम मदद नहीं करता,बल्कि उलटा नुकसान करता है।संकट की घड़ी में जब जनता आंदोलन करती है तो इंटरनेट-गूगल-सोशलमीडिया आदि के जरिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर जनता के ऊपर विभिन्न किस्म के सरकारी हमले शुरू हो जाते हैं।सूचना और कम्युनिकेशन के डिजिटलाइजेशन ने बड़े पैमाने पर सूचना के केन्द्रीकरण,केन्द्रीकृत निगरानी और प्राइवेसी के अंत को संभव बनाया है।आज प्रत्येक मनुष्य साइबर निगरानी में है।पुलिस और सरकार की निगरानी में है।सेंसरशिप के निशाने पर है। प्रौपेगैंडा के निशाने पर है। यह सब कुछ हो रहा है।सस्ती सूचना,सस्ता मनोरंजन और सस्ते कम्युनिकेशन के नाम पर रद्दी खबरों का सबसेबड़ा कूड़ाघर है। यहां अधिकतम सरकार विरोधी चीजें मिलेंगी।सतह पर इंटरनेट हमेशा सरकार विरोधी आंदोलन को व्यापक कवरेज देता है, नई पहचान देता है।इस प्रक्रिया में रीयल प्रतिवाद को वर्चुअल प्रतिवाद में रूपान्तरित करता है और ज्योंही प्रतिवाद पर हमले शुरू होते हैं ,गूगल-फेसबुक आदि तुरंत सरकारी दमन का अंग बन जाते हैं और दमन को वैध ठहराना शुरू कर देते हैं।अरब जगत में चले लोकतांत्रिक जनांदोलन से लेकर विकसित पूंजीवादी मुल्कों में चले युद्धविरोधी जनांदोलनों का यही अनुभव है।इंटरनेट-गूगल-सोशलमीडिया के लिए कम्युनिकेशन में प्रौपेगैंडा महत्वपूर्ण है। इस दौर में नीतिगत कम्युनिकेशन और जनांदोलन इसका गौण पक्ष है।



नरेन्द्र मोदी को महानायक बनाने में इंटरनेट-सोशलमीडिया और गूगल की महत्वपूर्ण भूमिका है।इसने मोदी के बारे में पारदर्शिता के भ्रम की सृष्टि की है।सतह पर डिजिटल कम्युनिकेशन पारदर्शी लगता है।लेकिन मूलतः डिजिटल का काम है सारवान को छिपाना।सतह पर लोकतांत्रिक लगता है लेकिन बुनियादी तौर पर डिजिटल कम्युनिकेशन अ-लोकतांत्रिक है।अधिनायकवादी कम्युनिकेशन है।इसके केन्द्र में छिपाने का भाव है।इंटरनेट-टीवी न्यू चैनलों ने मोदी के बारे में यह मिथ निर्मित किया कि वह पारदर्शी है,ईमानदार है,लोकतांत्रिक हैं।लेकिन वास्तविकता इसके एकदम विपरीत है।मोदी स्वभाव से अहंकारी और निरंकुश हैं।वह ऐसे नेता हैं जिसके पास मानवीय संवेदनाओं का अभाव है।वे दमन और उत्पीड़न में विश्वास करते हैं।वे नेट के प्रचार के जरिए अपने दमनात्मक और बर्बर चरित्र को छिपाने की कोशिश करते हैं।नेट तकनीक के जरिए आम लोगों को हिंसक और असहिष्णु बनाने में लगे रहते हैं।यह सब काम वे ‘राष्ट्र सेवा’ और ‘विकास’ की आड़ में कर रहे हैं। 
सूचना क्रांति और सूचना तकनीक के विकास से जनतंत्र आता है,यह धारणा अनेक नेताओं और सूचना विशेषज्ञों की रही है।इनमें राजीव गांधी भी शामिल हैं।वे भी सूचना क्रांति को लोकतंत्र की शक्ति मानते थे।लेकिन वास्तविकता यह नहीं है।तथ्य और जीवनानुभव बताते हैं कि इंटरनेट ने अधिनायकवादी,साम्प्रदायिक, आतंकी और पृथकतावादी गिरोहों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।सूचना क्रांति-नेट क्रांति से लोकतंत्र आएगा,इस धारणा को बल मिला सोवियत संघ के विघटन और थ्येनमैन स्क्वेयर की घटना से।लेकिन वास्तविकता यह है सोवियत संघ में लोकतंत्र नहीं आया उलटे सोवियत संघ का विघटन हुआ।विभिन्न नवोदित देशों में तानाशाही आई,फंडामेंटलिस्ट और फासिस्ट सत्ता में आए।यही स्थिति चीन में हुई।भारत में तमाम किस्म के लिबरल उपायों का पालन के बाद भी इंटरनेट प्रचार के कंधों पर सवार होकर नरेन्द्र मोदी जैसा नेता सत्ता में आया,जिसकी बुनियादी प्रकृति लोकतंत्र विरोधी है,जो खुलेआम कारपोरेट घरानों का हिमायती है।यहां तक कि अमेरिका में ईसाई फंडामेंटलिस्टों और फेक न्यूज के कंधे पर सवार होकर डोनाल्ड ट्रंप आ गए।

उल्लेखनीय है अमेरिका में श्वेत नस्लवाद ,ईसाई फंडामेंटलिज्म और युद्धोन्माद का माहौल बनाए रखने में कम्प्यूटरजनित कम्युनिकेशन की केन्द्रीय भूमिका रही है।आज भी नस्लवाद विकसित पूंजीवादी मुल्कों की सबसे बड़ी चुनौती है।इंटरनेट कम्युनिकेशन और सूचनाओं पर बातें करते समय उसके ‘ग्लोबल फ्लो’, ‘राष्ट्रीय संदर्भ’ और ‘राष्ट्रीय सूचना प्रवाह’ को ध्यान में रखना चाहिए।यहां सिर्फ सूचना के लिए सूचना के प्रवाह की बजाय ‘ग्लोकल’ (ग्लोबल-लोकल) सूचना विचारधारा का अबाधित प्रवाह काम करता है।इस प्रवाह में सत्ता और जनता,सत्ता और जनांदोलन के अन्तर्विरोध तैरते रहते हैं और उन्हीं के आईने में सूचनाएं बनती-बिगडती रहती हैं।सतह पर इंटरनेट का सूचना प्रवाह सबके लिए कम्युनिकेशन का आधार देता नजर आता है लेकिन व्यवहार में इस कम्युनिकेशन का सत्ता और अधिनायकवाद के प्रति झुकाव होता है।तमाम देशों में इंटरनेट जन क्रांति के बाद ही अधिनायकवादी दमनतंत्र तेजी से सामने आया है।इंटरनेट जिस वर्चुअल कम्युनिटी को जन्म देता है।वह रीयल संकट की अवस्था में  सड़कों से नदारत मिली है।विभिन्न देशों में विगत 30सालों में आए जनउभार और लोकतांत्रिक आंदोलनों  के अनुभवों में यही देखा गया।

सवाल यह है क्या वर्चुअल कम्युनिटी नागरिक समाज की मदद करती है ॽवर्चुअल कम्युनिटी तब ही मदद करती है जब यथार्थ में नागरिक समाज या आंदोलनकारी जनता सक्रिय हो,सिर्फ वर्चुअल सक्रियता मूलतःनिष्क्रियता है। सतह पर देखेंगे तो पाएंगे इंटरनेट दो कम्प्यूटरों के जरिए संबंध स्थापित करके काम करता है।तयशुदा प्रोटोकॉल के जरिए काम करता है।उसके जरिए ही हम सूचना हासिल करते हैं।लेकिन इंटरनेट को देखने का यह अति सरलीकृत रूप है।किसी भी देश में इंटरनेट-गूगल-सोशलमीडिया किस तरह आचरण कर रहे हैं यह इस बात से तय होता है कि उसका लोकतंत्र और सत्ता के साथ किस तरह का संबंध है।देशज सामजिक-राजनीतिक समूहों के प्रति उसका नजरिया कैसा है ॽअर्थव्यवस्था और विदेशनीति के प्रति उसका कैसा रवैय्या है ॽनागरिक समाज और नागरिक आंदोलनों के प्रति किस तरह का रूख है ॽइत्यादि सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

भारत के संदर्भ में देखें तो यहां पर नागरिक समाज बेहद कमजोर है।आम प्रौपेगैंडा में सिविल सोसायटी के सक्रिय कार्यकर्ताओं-नेताओं को ‘विदेशी एजेंट’ कहकर कलंकित करने की कोशिश की जाती है।‘अन्य के पक्षधर’ के रूप में उन पर वैचारिक हमले किए जाते हैं।नंदीग्राम आंदोलन से लेकर शाहीनबाग आंदोलन तक इस तरह के नजरिए को साफतौर पर देख सकते हैं।नागरिक समाज आंदोलन को शक की नजर से देखने से वह कमजोर बनता है।हमें नागरिक समाज आंदोलन के प्रति अपने सशंकित भावबोध से मुक्ति पानी होगी।नागरिक समाज में दूरी कोटि उन लोगों की है जो जमीनी स्तक पर सक्रिय नहीं हैं लेकिन इंटरनेट में सक्रिय हैं।ये वे लोग हैं जो राजनीतिक नहीं हैं बल्कि इंटरनेट यूजर हैं।इनमें सबसे अधिक उपभोक्ता मनोरंजन और शेयर बाजार के हैं।ये भी अबाध सूचना और मनोरंजन प्रवाह चाहते हैं।ये भी अपने लिए सामाजिक जीवन और इंटरनेट में ‘सार्वजनिक स्पेस’ चाहते हैं।सवाल यह है कि इंटरनेट पर ‘सार्वजनिक स्पेस’ बना है या नहीं,यदि बना है तो इसमें लोकतांत्रिक विचारधारा का स्पेस कितना है और लोकतंत्रविरोधी विचारधाओं का स्पेस कितना बना है।‘इसी तरह सार्वजनिक स्पेस’ का आर्थिक निवेश की अवस्था से गहरा संबंध है।क्या इंटरनेट के स्पेस विस्तार से आर्थिक निवेश बढ़ा है या नहीं ,इन सवालों पर विचार करने की जरूरत है। 

नरेन्द्र मोदी के पीएम बनने के बाद ‘राजनीतिक कम्युनिकेशन’ को लेकर सबसे अधिक उथल-पुथल मची है।मीडिया का एक बड़ा अंश सत्तारूढ़ भाजपा और मोदी की जी-हुजूरी में लग गया है।उसने एकदम दरबारी मीडिया के रूप में अपनी इमेज विकसित कर ली हैं।इस स्थिति को बनाने में समाचार टीवी चैनलों,राजनीतिक कम्युनिकेशन और राजनीतिक मार्केटिंग की केन्द्रीय भूमिका है।टीवी चैनलों में ’मनोरंजन केन्द्रित’ और ‘समाचार केन्द्रित’ ये दो मॉडल आरंभ हुए,बाद में मनोरंजन ने समाचार को हजम कर लिया और समाचार भी मनोरंजन केन्द्रित हो गए।इस समूची प्रक्रिया को व्यापक मीडिया प्रक्रिया के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने की जरूरत है।मनोरंजन-समाचार केन्द्रित मॉडल की ओर जाते समय सार्वजनिक प्रसारण सेवाओं पर नव्य-आर्थिक उदारीकरण के 1990-91 से लागू किए जाने के बाद से जमकर हमले हुए।सार्वजनिक प्रसारण सेवाओं के रूप में चल रहे टीवी-रेडियो माध्यमों के निजीकरण की मुहिम चलायी गयी।इसके चलते टीवी के क्षेत्र में निजी प्रसारणों की खुली छूट दी गई।रेडियो को भी मनोरंजन के लिए खोल दिया गया।यही वह प्रस्थान बिंदु है जिसके आधार पर टीवी संस्कृति का विकास हुआ।इसका आरंभ सरकारी केन्द्रीकरण का विरोध करते हुआ लेकिन आज स्थिति यह है कि अम्बानी ग्रुप का 80फीसदी चैनलों पर कब्जा है।खासकर न्यूज चैनलों पर उनका एकाधिकार है।टीवी-रेडियो के निजीकरण से विज्ञापन और जनसंपर्क एजेंसियों की भूमिका बढ़ गयी।इस प्रक्रिया में ‘राजनीतिक मार्केटिंग’ की संस्कृति नए कलेवर के साथ समाचार टीवी चैनलों में दाखिल हुई।इसने राजनीतिक विशेषज्ञ,वोट विशेषज्ञ, जन-सर्वेक्षण विशेषज्ञ,प्रायोजित टॉक शो,प्रायोजित समाचार आदि को जन्म दिया।इस समूची कम्युनिकेशन प्रक्रिया ने जनप्रतिनिधि और जनता के बीच के संबंध को खत्म कर दिया।इस दौरान ‘नायक केन्द्रित’ कम्युनिकेशन और ‘सिस्टम के प्रति अनास्था’ इन दो कम्युनिकेशन मॉडलों को केन्द्र में रखकर व्यापक संप्रेषण हुआ।इसने संस्थान,व्यवस्था और संविधान विरोधी राजनीतिक असंतोष को हवा दी,राजनीतिक संशयवाद और स्वयं पर अविश्वास इन दो चीजों को पैदा किया।मुद्दे और नीति केन्द्रित कम्युनिकेशन की बजाय सतही और कॉमनसेंस कम्युनिकेशन को बढ़ावा दिया।समाज विश्लेषण,तथ्यपूर्ण विवेचन की बजाय नारेबाजी और प्रौपेगैंडा सामग्री को टॉक शो और समाचार के रूप में प्रस्तुत किया।उसे ही टीवी पर राजनीतिक न्यूज के रूप में पेश किया।इस तरह के संप्रेषण ने जनता और सरकार के बीच संबंध को पूरी तरह तोड़ दिया।मनमोहन सरकार के साथ इसी प्रक्रिया में जनता और सरकार के अलगाव को विकसित करने में टीवी मीडिया ने भूमिका अदा की।टीवी न्यूज चैनलों ने टॉक शो के जरिए ‘राजनीतिक न्यूज में शिरकत’ का विभ्रम पैदा किया।जबकि यह तो प्रौपेगैंडा और प्रायोजित प्रचार  था। इसने राजनीतिक परजीविता और साम्प्रदायिक फंडामेंटलिज्म को बढ़ावा दिया।टीवी न्यूज चैनलों से न्यूज और आलोचना की
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