Home गौरतलब उस दिन बंधन टूटे, बेड़िया टूटी..

उस दिन बंधन टूटे, बेड़िया टूटी..


महाराष्ट्र के पुणे में पहली मर्तबा लड़किया स्कूल की देहरी चढ़ी ! कोई 172 साल पहले उस दम्पति ने जब कन्या पाठशाला शुरू की , भूचाल आ गया। ज्योतिबा फुले और उनकी रफिके हयात सावित्री देवी ने जब स्कूल की बुनियाद रखी तो समाज के एक हिस्से को यह ‘अनर्थ’ लगा। यह पहला मौका था जब लड़किया स्कूल में दाखिल हुई।

-नारायण बारेठ॥

आज ज्योतिबा फुले का जन्म दिन है।
वे औरतो और दलितों के हको हकूक के पैरोकार थे। उनके व्यक्तित्व की बुनावट में शिक्षक ,लेखक,कवि ,तर्क शास्त्री ,समाज सुधारक और बहुत कुछ था। कोई कल्पना कर सकता है उस वक्त यह सब कितना दुश्वार रहा होगा। ज्योतिबा 21 के थे और सावित्री की उम्र महज 17 साल थी। उनके शिक्षा आंगन में 9 विद्यार्थी थे। 1848 में भारत में यह बालिकाओ का पहला स्कूल था। चार साल में ही स्कूलों की संख्या तीन हो गई और प्रागण 150 बालिकाओ की मौजूदगी से गुलो गुलजार हो गया।

जब दोनों की शादी हुई ज्योतिबा फुले 12 साल के थे। सावित्री बाई सिर्फ 9 वर्ष की थी। दोनों ने साथ साथ जिंदगी का सफर तय किया। सावित्रीबाई ने अपने पति की प्रेरणा से आगे पढाई जारी रखी और भारत की पहली महिला शिक्षक बनी।यह साबित करता है कोई घर गृहस्थी में रहते हुए भी समाज को बहुत कुछ दे सकता है। फुले कहते थे ‘ प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ है और मनुष्यो में महिला। औरत मर्द जन्म से ही स्वतंत्र होते है। इसलिए दोनों के अधिकारों में कोई भेद नहीं होना चाहिए’। महिलाओ के बारे में फुले के विचार ठीक वैसे ही है जैसे समाज शास्त्र के पितामह ऑगुस्ट कॉम्टे कहते थे। कॉम्टे कहते थे नारी मानवता की सबसे अहम नैतिक तत्व है [Woman is the most moral element in all humanity].

जब वे स्त्री शिक्षा और दलितों की तालीम के कारवां को आगे ले जाने लगे ,उन पर कीचड़ फैका गया। फब्तियां कसी गई और अपमानकारी बातें कही गई। उस वक्त फातिमा बेगम शेख भी सावित्रीबाई के साथ आ गई। कहते है फातिमा मुस्लिम समाज में पहली शिक्षिका थी। इन दोनों को अपने अपने धर्म के परम्परावादियों ने निशाने पर रखा।

फुले ने स्कॉटिश मिशन स्कूल में तालीम ली। वे सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़े / फुले शिक्षा की महत्ता का बखान करते थे /
कहते थे -विद्या बिना मति गई,
मति बिना गति गई,
गति बिना नीति गई,
नीति बिना वित्त गई
वित्त बिना शूद्र चरमराये,
इतना सारा अनर्थ एक अविद्या से हुआ.!

वे 1890 में अलविदा कह गए। यह इत्तेफाक ही है कि उनके जाने के एक साल बाद अम्बेडकर का संसार में आगमन हुआ। फुले सच में महात्मा थे। उन्हें यह ख़िताब पहली मर्तबा समाज सेवी विट्ठलराव कृष्णजी वंदेकर ने दिया।
आज उनका जन्म दिन है। मानवता उनकी कृतज्ञ है।

Facebook Comments
(Visited 1 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.