Home कोरोना टाइम्स लॉकडाऊन के भय के साथ बेबसी में घरवापिसी..

लॉकडाऊन के भय के साथ बेबसी में घरवापिसी..

-सुनील कुमार॥

हिंदुस्तान में जिस रफ्तार से कोरोना बढ़ रहा है, और एक-एक करके बहुत से राज्य लॉकडाऊन कर रहे हैं, पूरे देश में मजदूरों के बीच भगदड़ मची हुई है। जो मजदूर अपने शहर में काम कर रहे हैं, उन्हें तो उम्मीद है कि रियायती या मुफ्त सरकारी अनाज के भरोसे उनके परिवार जिंदा तो रह लेंगे, लेकिन जो मजदूर दूसरे प्रदेशों में काम कर रहे हैं, उनके मन से पिछले बरस वाली दहशत जा नहीं रही है, और वे अपने प्रदेशों के लिए रवाना हो रहे हैं। कहीं वे रेलगाडिय़ों पर हैं, तो कहीं सडक़ों पर सवारी ढूंढ रहे हैं कि कैसे घर लौटें।

हिंदुस्तान में ऐसे असंगठित और प्रवासी मजदूरों की हालत में पिछले बरस के भयावह तजुर्बे के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कोई सुधार नहीं लाया गया है। और बेबस मजदूर बेहतर मजदूरी की तलाश में दूसरे प्रदेशों में तो जाएंगे ही। यह बात अकेले हिंदुस्तान पर लागू नहीं होती है, दुनिया के बहुत से देशों में गरीब पड़ोसी देशों से रोजाना लाखों मजदूर सरहद की चौकी पार करके काम करने जाते हैं। भारत में तो मजदूर न सिर्फ दूसरे प्रदेशों में काम करने जाने के आदी हैं, बल्कि सैकड़ों बरस से मजदूर फिजी, मॉरिशस जैसे कई देशों में जाकर काम करते आए हैं। आज खाड़ी के हर देश में दक्षिण भारत के तकनीकी-कामगार बड़ी संख्या में काम करते हैं, और केरल जैसे राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी-मजदूरों से आता है। वैसे भी प्रवासी मजदूरों के बारे में यह माना जाता है कि वे जब अपनी जगह से निकलकर बाहर जाते हैं, तो वे अधिक मेहनत करते हैं, अधिक काम करते हैं क्योंकि उन पर अपनी स्थानीय रिश्तेदारियों को निभाने का कोई दबाव नहीं रहता है। ऐसे मजदूर बाहर जाने के लिए एकदम से बेबस भी नहीं रहते, बल्कि अमूमन वे बेहतर मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं, और वहां हर दिन अधिक से अधिक घंटे काम करके कमाते हैं, और लौटकर या तो कर्ज चुकाते हैं, या थोड़ी सी जमीन खरीद लेते हैं, या मकान बना लेते हैं। इस तरह मजदूर कमाते तो बाहर हैं लेकिन वेे अपने गृह राज्य की अर्थव्यवस्था में हर बरस कुछ न कुछ जोड़ते हैं। चूंकि ये मजदूर पूरी तरह असंगठित हैं, इसलिए किसी मुसीबत के वक्त उनकी कोई योजनाबद्ध मदद नहीं हो पाती है, या शायद यह कहना अधिक सही होगा कि सरकारें उनकी अधिक परवाह नहीं करती है।

यह बात समझने की जरूरत है कि कोरोना या इस किस्म की कोई दूसरी संक्रामक-महामारी जाने कब तक लॉकडाऊन की नौबत लेकर आएगी। इसलिए अब सरकार और कारोबार, इन दोनों को अपने-अपने स्तर पर ऐसे प्रवासी मजदूरों के बारे में सोचना चाहिए कि उन्हें मजबूरी में लौटने से कैसे रोका जाए, कैसे उनके लिए कामकाज के प्रदेश और शहर में ही जिंदा रहने, पेट भरने, और इलाज पाने का इंतजाम किया जाए। देश के बचे-खुचे मजदूर कानूनों में भी मजदूरों के बच्चों की देखभाल तक का इंतजाम है, लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ भी नहीं है। हाल के बरसों में उदार अर्थव्यवस्था के नाम पर सबसे संगठित मजदूर-तबकों के हक भी खत्म किए गए हैं, इसलिए हमारी यह सलाह पता नहीं केंद्र सरकार के किसी काम की है या नहीं, लेकिन राज्य सरकारें तो अपने स्तर पर महामारी और लॉकडाऊन के लंबे भविष्य के खतरे से निपटने की योजनाएं बना सकती हैं। ऐसी हर नौबत पर मजदूरों की गांव या घरवापिसी बहुत अच्छी नौबत नहीं है, क्योंकि उससे उनके उत्पादक हफ्ते या महीने भी खराब होते हैं, और बीमारियों के फैलने का खतरा भी रहता है। इसलिए ऐसे हर राज्य को ऐसा आपदा प्रबंधन करना चाहिए कि लॉकडाऊन में प्रवासी मजदूर अपने काम के शहरों में ही किस तरह हिफाजत से रखे जाएं। हमको मालूम है कि यह सलाह देना आसान है, इस पर अमल एक नामुमकिन किस्म की चुनौती रहेगी क्योंकि आज जब किसी प्रदेश में अस्पतालों में बिस्तर बचे नहीं हैं, तब कौन सा प्रदेश चाहेगा कि प्रवासी मजदूरों के इलाज का अतिरिक्त बोझ उस पर आए। लेकिन यहीं पर इंसानियत को दखल देना होगा, देश में बची-खुची, थोड़ी-बहुत साख वाली अदालतों को दखल देना होगा ताकि काम की जगह पर जिंदा रहने का इंतजाम तय किया जा सके।

लॉकडाऊन से हिंदुस्तान जैसे सबसे गरीब मजदूरों वाले देश में करोड़ों लोगों के सामने भुखमरी से जरा ही कम बुरी नौबत आ रही है। आज 21वीं सदी में भी केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर भी लोगों को बस जिंदा रहने लायक अनाज दे पा रही हैं, पिछले बरस तो हजार-हजार किलोमीटर का वापिसी-सफर भी मजदूरों को पैदल ही तय करना पड़ा था। इस देश के बड़े-बड़े राष्ट्रीय प्रबंधन संस्थानों से निकले हुए गे्रजुएट नौजवान दुनिया की सबसे बड़ी कई कंपनियों को संभाल रहे हैं। अगर सरकारों में राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो ऐसी कोई वजह नहीं है कि ऐसे प्रबंधन-विशेषज्ञ जानकार लोग इस देश के प्रवासी मजदूरों के लायक कोई कामयाब योजना न बना सकें। कोई प्रदेश भी ऐसी पहल कर सकता है, और केंद्र सरकार को तो करना ही चाहिए। आगे-आगे देखें कि किसके मन में कितना दर्द है।

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