जब सरकार ही अपराध करने लगे..

जब सरकार ही अपराध करने लगे..

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-सुनील कुमार॥

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभी उत्तरप्रदेश की योगी सरकार के घोर साम्प्रदायिक दिखने वाले दर्जनों मामलों को खारिज करते हुए सरकार को बुरी तरह फटकार लगाई है। यूपी में एनएसए, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत दर्ज 120 मामलों में से 94 को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया ह और कई आरोपियों को रिहा भी किया है। इनमें से अधिकतर मामले मुस्लिमों के खिलाफ बनाए गए थे, जिनमें गाय को मारने से लेकर किसी भीड़ में मौजूद होने तक कई किस्म के जुर्म दर्ज किए गए थे। हाईकोर्ट ने पुलिस के बनाए ऐसे मामलों को बाद में जिला मजिस्ट्रेट की मंजूरी पर भी कड़ा हमला किया है और कहा है कि ऐसा लगता है कि डीएम ने दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया है। अदालत ने यह खुले तौर पर पाया और कहा है कि सरकार ने आरोपियों के मामलों की सुनवाई में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई ताकि वे जेलों में बंद पड़े रहें, जबकि इनके खिलाफ कार्रवाई करने में अफसरों ने असाधारण जल्दबाजी दिखाई थी। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के लिए बने सलाहकार बोर्ड के सामने इनके मामलों को रखा भी नहीं गया। एक प्रमुख अंगे्रजी अखबार, इंडियन एक्सपे्रस की एक रिपोर्ट से ये बातें निकलकर सामने आई हैं कि पिछले तीन बरसों में योगी सरकार ने मुस्लिमों के खिलाफ बड़ी संख्या में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम का इस्तेमाल किया गया जिसमें से अधिकतर मामलों में हाईकोर्ट ने या तो केस खारिज किए, या लोगों को रिहा किया और अधिकतर मामलों में अफसरों के रूख को फटकार के लायक पाया।

तीन बरस में ऐसे करीब सवा सौ मामलों की अलग-अलग चर्चा यहां संभव नहीं है, लेकिन इस पूरे दौर में उत्तरप्रदेश से आने वाली खबरों से यह साफ दिखता ही था कि वहां सरकार और उसकी एजेंसी, पुलिस का रूख किस हद तक साम्प्रदायिक हो चुका था। अब देश के कानून में एक बड़ी कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम बनाया गया और जैसा कि इसके नाम से जाहिर है यह राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा होने पर इस्तेमाल के लिए है। लेकिन देश भर में राज्य सरकार या जिला पुलिस इस कानून का मनमाना बेजा इस्तेमाल करते आई हैं। कई बार तो खुद पुलिस की कार्रवाई में लिखा होता है कि कोई व्यक्ति जिले की कानून व्यवस्था के लिए खतरा बन गया है इसलिए उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा रही है। जब सत्ता और पुलिस की मनमानी और गुंडागर्दी में साम्प्रदायिकता और जुड़ जाती है तो वह अल्पसंख्यकों को इस देश का नागरिक भी महसूस नहीं होने देती। हाल के बरसों में ऐसे बहुत से मामले सामने आए हैं जिनमें दस-बीस बरसों से जेलों में बंद बेकसूर मुस्लिमों को अदालत ने बाइज्जत बरी किया है, यह एक अलग बात है कि इस दौरान इनके परिवार तबाह हो चुके रहते हैं, और एक पूरी पीढ़ी उनके बिना या तो जवान हो चुकी रहती है, या मर चुकी रहती है। देश में उत्तरप्रदेश सरकार के साम्प्रदायिक रूख के मामले में अव्वल है। वहां जानवरों की तस्करी, गौवंश को मारना, गोमांस खाना, जैसे आरोप लगाकर किसी की भी भीड़त्या भी की जा सकती है और कानूनी कार्रवाई तो की ही जा सकती है, फिर चाहे उसका हश्र वही हो जो कि अभी करीब सवा सौ मामलों का हाईकोर्ट पहुंचकर हुआ है।

हमारा ख्याल है कि हिंदुस्तान के राज्यों के मातहत काम करने वाली पुलिस, या कि दिल्ली जैसे राज्य में केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली पुलिस को जब तक उसकी ऐसी साजिशों के लिए सजा देना शुरू नहीं होगा, तब तक हालात नहीं सुधरेंगे। राज्यों की सत्ता और वहां की पुलिस के बीच मुजरिमों के गिरोह से भी अधिक मजबूत भागीदारी बन जाती है, और दोनों ही पक्ष सत्ता और कानून का बेजा इस्तेमाल करके कमाने में जुट जाते हैं। पुलिस और राजनीति का यह भागीदारी-माफिया किसी भी लोकतांत्रिक-सिद्धांत से अछूता रहता है।

उत्तरप्रदेश की यह मिसाल तो वहां की सरकार की साम्प्रदायिकता को भी उजागर करने के काम की है, लेकिन देश के बाकी प्रदेशों को भी यह सोचना चाहिए कि पुलिस का बेजा इस्तेमाल सत्ता के लिए सहूलियत का तो हो सकता है, लेकिन वह अपने प्रदेश के भीतर ही कई किस्म की बेइंसाफी की खाईयां भी खोद देता है। केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ने पिछले कई बरसों में जेएनयू से लेकर शाहीन बाग तक, और दूसरे कई आंदोलनों तक केंद्र सरकार की मर्जी की कार्रवाई की, और बार-बार अदालतों में मुंह की खाई, फटकार खाई। यह सिलसिला लोकतंत्र के भीतर पुलिस को वर्दीधारी गुंडा बनाने वाला है और आज से दशकों पहले इसी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अवध नारायण मुल्ला ने पुलिस को वर्दीधारी गुंडा करार दिया था। तब से अब तक कई पार्टियों की सरकारें उत्तरप्रदेश में आई-गईं, लेकिन एक बार मुजरिम बन चुकी पुलिस वक्त के साथ-साथ और खूंखार मुजरिम ही बनती चली जा रही है, चाहे वह उत्तरप्रदेश की साम्प्रदायिक पुलिस हो, चाहे वह बस्तर की मानवाधिकार कुचलने वाली पुलिस हो। इस देश में पुलिस के बेजा इस्तेमाल पर रोक लगाने का संवैधानिक समाधान अगर नहीं निकाला जाएगा, तो लोगों का इंसाफ के सिलसिले की इस पहली कड़ी पर जरा भी भरोसा नहीं रह जाएगा।

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