‘खेला’ ही तो हो रहा है जैसे..

‘खेला’ ही तो हो रहा है जैसे..

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प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले शनिवार को तारकेश्वर इलाके की एक चुनावी जनसभा में अल्पसंख्यकों से अपील की थी कि वे अपना वोट नहीं बंटने दें। साथ ही उन्होंने हिंदुओं से भी अपील की थी कि वे भी अपना वोट हिंदू-मुस्लिम के आधार पर न दें और भाजपा के बिछाए जाल में न फंसें। देश के प्रधानमंत्री और भाजपा के स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने ममता बनर्जी के इस बयान को आधार बना कर जवाब दिया कि, ”दीदी, आपने हाल ही में कहा कि सभी मुसलमान एक हो जाओ, वोट बंटने मत दो।

उन्होंने आगे कहा कि दीदी, वैसे तो आप चुनाव आयोग को गालियां देती हैं, लेकिन हमने ये कहा होता कि सारे हिंदू एकजुट हो जाओ, भाजपा को वोट दो, तो हमें चुनाव आयोग के 8-10 नोटिस मिल गए होते। देश के सारे अखबार पहले पेज पर इससे भरे होते और दुनिया भर में इस पर संपादकीय लिखे जाते और हमारे बाल नोच लेते।” ममता बनर्जी के बार-बार चुनाव आयोग को लेकर शिकायत करने पर मोदी ने कहा, ”दीदी, जिस चुनाव आयोग ने चुनाव कराकर आपको दो बार मुख्यमंत्री बनाया, आज आपको उस चुनाव आयोग से ही दिक्कत होने लग गई और ये दिखाता है कि आप चुनाव हार चुकी हैं।”

मोदीजी के ये बयान दर्शाते हैं कि चुनाव के दौरान सस्ते प्रचार पाने के लिए नीचे उतरने की नई हदें वे तैयार कर चुके हैं। प.बंगाल में अब तक चुनाव बहुत से जरूरी-गैरजरूरी मुद्दों के इर्द-गिर्द हुए हैं, लेकिन उनमें सांप्रदायिकता का तत्व इस तरह से कभी शामिल नहीं था, जैसा इस बार हो चुका है। इस बार के चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच मुकाबले में खेला होबे का जुमला चर्चित हुआ है और ऐसा लग रहा है कि सचमुच निष्पक्ष, लोकतांत्रिक चुनाव न हो कर कोई खेल-तमाशा ही हो रहा है।

ममता बनर्जी ने ये नहीं कहा कि मुसलमान एक हो जाओ, लेकिन मोदीजी ने उनके बहाने ये संदेश दे दिया कि सारे हिंदू एकजुट हो जाएं। बड़ी चालाकी से उन्होंने अपनी बात संप्रेषित कर दी और साथ ही धर्मनिरपेक्षता के समर्थकों को खरी-खोटी भी सुना दी, कि हम ऐसा कहते तो हमारे बाल नोच लेते। प्रधानमंत्री ने सीधे नहीं कहा लेकिन उनका आशय यही था कि अगर मुसलमान एक साथ होते हैं, तो हिंदुओं को भी एकजुट होना चाहिए। क्या मोदीजी वाकई चुनाव प्रचार करते हुए भूल जाते हैं कि जनता ने उन्हें किस पद की जिम्मेदारी सौंपी है, कि वे उस देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव को खारिज करता है और धर्मनिरपेक्षता पर मुहर लगाता है। चुनाव आयोग से उनकी शिकायत भी हैरत में डालती है। देश पिछले विधानसभा चुनावों और आम चुनाव में देख चुका है कि किस तरह नरेन्द्र मोदी पर आचार संहिता के उल्लंघन की गंभीर शिकायतें चुनाव आयोग में दर्ज कराई गईं, लेकिन उन पर कोई कड़ी कार्रवाई कभी नहीं हुई।

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और प्रतिबद्धता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद बड़ी चतुराई से अपनी बात पहुंचाने के लिए चुनाव आयोग की आड़ मोदीजी ने ली है। क्या चुनाव आयोग को इस बात का स्वत: संज्ञान लेकर भाजपा और नरेन्द्र मोदी से पूछना नहीं चाहिए कि नोटिस भेजने की बात वे इस तरह क्यों उठा रहे हैं। क्या आयोग बिना कारण नोटिस भेजता है। ममता बनर्जी को दो बार मुख्यमंत्री बनाने का बयान भी गजब है कि चुनाव आयोग ने ऐसा किया। क्या मोदीजी ये नहीं जानते कि चुनाव करवाना आयोग की जिम्मेदारी है और किसी को जिताना या हराना मतदाता तय करता है।

वैसे इस बात की उम्मीद कम ही है कि चुनाव आयोग इस तरह की बयानबाजी पर कोई कार्रवाई करेगा। अभी तो उससे ईवीएम ही संभाले नहीं संभलती। असम में ईवीएम ले जाती गाड़ी बिगड़ गई तो चुनाव आयोग के अधिकारी ने बड़ी मासूमियत से भाजपा उम्मीदवार की गाड़ी में लिफ्ट ले ली और उसमें ईवीएम रख दी। तमिलनाडु में एक अधिकारी स्कूटी पर ईवीएम ले जा रहा था। प.बंगाल में एक अधिकारी रिजर्व ईवीएम लेकर अपने एक रिश्तेदार के घर चले गए और वहां सो गए। पता चला कि वो रिश्तेदार टीएमसी के नेता निकले। असम में एक और हैरतअंगेज कारनामा सामने आया। एक मतदान केंद्र पर मतदाताओं की संख्या 90 थी, लेकिन वोट पड़े 171। यानी मताधिकार करने की अपील को जनता ने कुछ अधिक गंभीरता से ले लिया औऱ मतदान प्रतिशत सौ के पार चला गया। इस तरह के चुनावी खेल के बाद ईवीएम पर भरोसा बनाए रखने की बात निर्वाचन आयोग किस मुंह से कहता है, यह वही जाने। ईवीएम से जुड़ी इन तमाम घटनाओं पर सफाई तैयार हो चुकी होगी, लेकिन लोकतंत्र में जो गंदगी संवैधानिक संस्थाएं और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग फैला रहे हैं, वो कैसे दूर होगी, ये सोचने वाली बात है।

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