भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने में सतत विकास की ओर अग्रसर..

भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने में सतत विकास की ओर अग्रसर..

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-डॉ. हनुमन्त यादव॥

संयुक्त राष्ट्र संघ इस संबंध में जलवायु वित्त को बहुत महत्वपूर्ण मानता है। इसलिए जैसा कि यूएन एफसीसीसी और इसके पेरिस समझौते में अनिवार्य है, विकासशील देशों की जलवायु संबंधी क्रियाओं को विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को वित्त प्रवाह द्वारा समर्थन करना होगा। वर्ष 2020 के विषय में ऐसा माना जाता था कि इसमें विकसित देशों द्वारा संयुक्त रूप से जलवायु वित्त के लिए 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का लक्ष्य पूरा करने की प्रतिबद्धता मायावी बन चुकी है।

भारत में आर्थिक नियोजन के माध्यम से विकास के मूल समावेशी एवं चिरस्थायी आर्थिक विकास रहा है। भारत में आर्थिक नियोजन के चार प्रमुख लक्ष्य थे- आर्थिक अभिवृद्धि, आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और असमानता। इन लक्ष्यों के अंतर्गत हर क्षेत्र में अनेक उद्देश्य थे। बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण पत्र में बारहवीं योजना का ध्येय त्वरित, समावेशी एवं सतत विकास दर्शाया गया था। भारत में वर्ष 2015 से योजना आयोग और वर्ष 2017 से पंचवर्षीय योजनाओं की बिदाई हो गई। संयुक्त राष्ट्रसंध विकास कार्यक्रम के सदस्य होने के नाते अन्य देशों की भांति भारत की भी सतत विकास लक्ष्यों को समयावधि में पूरी करने का दायित्व है। यूएनडीपी ने वर्ष 2015 में सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों एमडीजी के कार्यक्रम की समायावधि पूरा होने के बाद सतत विकास लक्ष्यों एसडीजी को प्रारंभ किया है जिसके अंतर्गत वर्ष 2030 तक लक्ष्यों को पूरा करने की समयावधि है।
अंग्रेजी शब्द सस्टेनेब्ल डेवलेपमेंट का हिन्दी रूपान्तर सतत विकास, धारित विकास एवं चिरस्थायी विकास के रूप में किया गया है। हम अपनी इस चर्चा में सस्टेनेब्ल डेवलेपमेंट के लिए सतत विकास शब्द का प्रयोग ही करेंगे। यूएनडीपी के 17 सतत विकास लक्ष्यों एसडीजी और 169 उप- लक्ष्यों के साथ सतत विकास के लिए 2030 के एजेंडा में एक व्यापक विकासात्मक एजेंडा भी शामिल हैं जो सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों को समाहित करता है। सरकार की नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों में सतत विकास लक्ष्यों एसडीजी को मुख्यधारा में लाने के लिए राष्ट्रीय और उपराष्ट्रीय स्तर पर कई पहल की गई हैं। यूएनडीपी के 17 सतत विकास लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन, भुखमरी की समाप्ति, स्वास्थ्य सुरक्षा एवं स्वस्थ जीवन, गुणवत्ता युक्त शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छ जल एवं स्वच्छता की उपलब्धता, सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता, उम्दा रोजगार एवं आर्थिक अभिवृद्धि, औद्योगीकरण, उन्नयन एवं अधोसंरचना विकास आदि प्रमुुख है। सतत विकास लक्ष्यों में 13वां लक्ष्य जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई करना है।
सतत विकास लक्ष्यों में शामिल लक्ष्यों में से भारत में गरीबी, भुखमरी, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ जल एवं स्वच्छत, ऊर्जा, रोजगार, औद्योगीकरण, अधोसंरचना विकास की 2019 में स्थिति, कोविड-19 का उनका प्रभाव, वर्तमान स्थिति और आगामी संभावनाओं के बारे में आगे आने वाले दिनों में विस्तार से चर्चा करेंगे। आज मैं जलवायु परिवर्तन और उससे निपटने वाले कार्यक्रमों के बारे में चर्चा करूंगा। जलवायु परिवर्तन ऐसा विषय है जिस पर आमतौर पर सामान्यजनों के बीच चर्चा बहुत कम होती है। इस पर विशिष्ट पत्र-पत्रिकाओं में अंतरराष्ट्रीय सेमीनारों में विषय विशेषज्ञों के उद्बोधनों पर चर्चा सीमित होती है। गैर-सरकारी विशिष्ट संगठन जलवायु परिवर्तन को रोकने एवं पर्यावरण के संरक्षण के लिए अभियान चलाते रहते हैं। भारत सहित हर देश के नागरिकों का आम जीवन असमय में वर्षा, सूखा, गरमी एवं शीतलहर से बहुत प्रभावित होता है किंतु इन पर नियंत्रण आम आदमी के वश में नहीं है इसलिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के अभियानों से उदासीन वह रहता है।
भारत सामान्य किन्तु विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं और न्यायसंगत सिद्धांतों के अनुसार अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए कई सक्रिय जलवायु संबंधी कार्रवाई कर रहा है। भारत ने शमन और अनुकूलन दोनों रणनीतियों पर कई पहलें की हैं, जिनमें स्वच्छ और कुशल ऊर्जा प्रणाली पर जोर दिया गया है, लचीला शहरी बुनियादी ढांचा, जल परिरक्षण और संरक्षण, सुरक्षित, स्मार्ट और टिकाऊ हरित परिवहन नेटवर्क, योजनाबद्ध वनीकरण, साथ ही विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि कृषि, वानिकी, तटीय और निम्न-क्षेत्रीय प्रणाली और आपदा प्रबंधन शामिल है। आईएसए और सीडीआरआई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की महत्वपूर्ण कार्रवाई के प्रमाण हैं। भारत सीएचजी उत्सर्जन में अपने आर्थिक विकास की दिशा में राह पर है। सौर ऊर्जा क्रांति में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का प्रयास उल्लेखनीय है और इसके द्वारा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘एक सूरज एक दुनिया एक ग्रिडÓ संकल्पना लागू की गई है।
सतत विकास और जलवायु परिवर्तन ‘राष्ट्रस्तरीय निर्धारित योगदान (एनडीसी) देश की विकासात्मक अत्यावश्यक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है और यह ‘सर्वोत्तम प्रयासÓ के दृष्टिकोण पर आधारित है। भारत ने अपने एनडीसी में वर्ष 2030 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद में उत्सर्जन की मात्रा को वर्ष 2005 के स्तर से 33 से 35 प्रतिशत तक कम करने, गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से 40 : संचयी विद्युत शक्ति स्थापित क्षमता प्राप्त करने तथा 2.5 से 3 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक निर्मित करने के लिए वन एवं वृक्ष क्षेत्र को बढ़ाने की इच्छा दर्ज कराई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ इस संबंध में जलवायु वित्त को बहुत महत्वपूर्ण मानता है। इसलिए जैसा कि यूएन एफसीसीसी और इसके पेरिस समझौते में अनिवार्य है, विकासशील देशों की जलवायु संबंधी क्रियाओं को विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को वित्त प्रवाह द्वारा समर्थन करना होगा। वर्ष 2020 के विषय में ऐसा माना जाता था कि इसमें विकसित देशों द्वारा संयुक्त रूप से जलवायु वित्त के लिए 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर का लक्ष्य पूरा करने की प्रतिबद्धता मायावी बन चुकी है। सतत विकास लक्ष्यों के आधिकारिक अंगीकरण के रूप में अपनी चौथी वर्षगांठ पर पहुंचते ही, 30 जनवरी, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्लूएचओ ने कोरोना वायरस कोविड-19 रोग के प्रकोप को घोषित किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कालांतर में कोविड-19 को महामारी घोषित किए जाने के बाद एक प्रकार से सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल लागू कर दिया गया। इसने मानव और आर्थिक लागतों को अपने विकास लक्ष्यों पर वापस लाने और सतत विकास लक्ष्यों एसडीजी को प्राप्त करने में गंभीर बाधाएं पैदा की हैं। कोविड-19 महामारी द्वारा दुनिया के देशों में उत्पन्न किए गए अभूतपूर्व संकट का सामना अन्य देशों के समान भारत भी कर रहा है। भारत महत्वपूर्ण आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करने, आजीविका के नुकसान का पता लगाने और आर्थिक सुधारों को प्रारंभ करने तथा व्यापक रूप से लागू करने और परिचित कराने की आवश्यकता से उभर रही चुनौतियों का सामना कर रहा है। हालांकि, निरंतर विकास की आवश्यकता देश की विकास रणनीति के मूल में बनी हुई है। कोविड-19 महामारी और उसके परिणामस्वरूप किया गया लॉकडाउन का अविश्वसनीय प्रभाव इस तथ्य को दोहराता है कि सतत विकास ही भविष्य का एकमात्र मार्ग है।

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