एवर गिवेन के बहाने..

एवर गिवेन के बहाने..

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दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में से एक मिस्र की स्वेज नहर में लगा जाम एक हफ्ते बाद खुल ही गया। यहां पिछले हफ्ते मंगलवार को एवर गिवेन नाम का व्यापारिक जहाज फंस गया था।  400 मीटर लंबा एवर गिवेन तेज हवाओं के बीच स्वेज नहर में तिरछा होकर फंस गया था। इसकी वजह से यूरोप और एशिया के बीच के इस सबसे छोटे जहाज मार्ग पर जहाजों के ट्रैफिक जाम की स्थिति बन गई थी। जिसके कारण सैकड़ों जहाज न आगे बढ़ पा रहे थे, न पीछे हो पा रहे थे। इस ऐतिहासिक जाम के कारण दुनिया नए आर्थिक संकट में फंस रही थी। गौरतलब है कि भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ने वाली स्वेज नहर अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक आवागमन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।

यह एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा समुद्री लिंक है। यह नहर मिस्र में स्वेज इस्थमस (जलडमरूमध्य) को पार करती है। करीब 193 किमी लंबे इस नहर में तीन प्राकृतिक झीलें भी शामिल हैं। 2015 में, मिस्र सरकार ने स्वेज नहर का चौड़ीकरण किया था। इसके बाद ये नहर और गहरी हो गई और वहां से गुजरने वाले जहाजों को 35 किलोमीटर का एक समानांतर चैनल मिल गया। दुनिया के कुल व्यापार का 12 प्रतिशत स्वेज नहर मार्ग से होता है, इसलिए इसे विश्व व्यापार की रीढ़ माना जाता है। वैश्विक व्यापार में लगे जहाजों में से 30 प्रतिशत जहाज यहां से रोजाना गुजरते हैं। हर रोज करीब 9.6 अरब डॉलर का सामान इस नहर के रास्ते एक देश से दूसरे देश की यात्रा करता है। स्वेज नहर में लगे जाम के कारण अभी रोजाना हजारों करोड़ का नुकसान हो रहा था। कच्चे तेल की कीमतों में करीब पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी पिछले छह दिनों में हो गई, क्योंकि कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हो रही थी।

एवर गिवेन जब तक स्वेज नहर में फंसा रहा, दुनिया की सांसें अटकी रहीं। जिस तरह की बेचैनी लंबे ट्रैफिक जाम में फंसने पर होती है, कुछ ऐसा ही हाल स्वेज में लगे जाम को देखकर अर्थव्यवस्था का हो रहा था। अब जहाज को हटाने में कामयाबी मिल गई है, तो फंसे जहाजों की आवाजाही फिर शुरु हो गई है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही स्थिति सामान्य हो जाएगी। पिछले हफ्ते जाम के कारण जो घाटा हुआ है, उसकी भरपाई के उपाय भी तलाश ही लिए जाएंगे। लेकिन स्वेज नहर में लगे जाम से दुनिया को एक और मौका मिला है कि वह व्यापार के बहाने ही सही, लेकिन ये समझे कि अब विश्व एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुका है, जहां परस्पर निर्भरता जीवन जीने की अनिवार्यता बन चुकी है। हम अपने-अपने द्वीपों में स्वार्थपरक जीवन नहीं जी सकते। वसुधैव कुटुंबकम जैसी अवधारणाएं अब हकीकत में बदलने का वक्त आ गया है।

मौजूदा संकट और उसके समाधान का विश्लेषण करें तो बात थोड़ी और स्पष्ट होगी। गौरतलब है कि एवर गिवेन जहाज पनामा में रजिस्टर्ड है, लेकिन इसके स्वामित्व वाली कंपनी इमाबारी शिपबिल्डिंग, जापान की है। ताइवान की ट्रांसपोर्ट कंपनी एवरग्रीन मरीन की ओर से इसका संचालन होता है, जबकि प्रबंधन जर्मनी की कंपनी बर्नहार्ड श्यूलटे शिप मैनेजमेंट (बीएसएम) करती है। इसके चालक दल के सदस्य भारतीय हैं। और यह जहाज एशिया से यूरोप सामान लेकर जा रहा था। यह मध्यपूर्व की तेज हवाओं के कारण फंसा। और इसे निकालने का बीड़ा उठाया, जहाज को हटाने में मदद करने वाली नीदरलैंड की कंपनी, बोसकालिस और मिस्र की टगबोट्स ने। कह सकते हैं कि एक वैश्विक समस्या का समाधान वैश्विक सहयोग से ही निकाला गया।

संकुचित सोच और स्वार्थपरक नीतियों का ही परिणाम है कि दुनिया में असमानता बढ़ी है। और इस असमानता के कारण पर्यावरण संकट से लेकर आतंकवाद तक तमाम बड़े-बड़े खतरे दुनिया के सामने पेश आए हैं। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए तीसरी दुनिया के देशों को भुगतना पड़ा है। जहां आज भी भूख, गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण, महिला उत्पीड़न, बाल शोषण जैसी भयावह समस्याएं नागरिक अधिकारों को चुनौती दे रही हैं। कहीं गृहयुद्ध छिड़े हैं, कहीं सैन्य तानाशाही हावी हो रही है। चंद शक्तिशाली देश अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए इन समस्याओं को सुलझाने की जगह इन्हें और गहराने में लगे हैं। इन हालात में विश्व शांति की उम्मीदें क्षीण हो जाती हैं। स्वेज नहर के ताजा संकट ने दुनिया को आत्ममंथन का एक अवसर दिया है कि हम अपने लोग, अपनी सीमाएं, अपने हित, अपनी बात, ऐसी स्वार्थवृत्ति छोड़ें। और सब परस्पर सहयोग से विश्व शांति, आर्थिक समृद्धि, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर काम करें।

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