Home गौरतलब सबका मालिक एक है या अलग अलग.?

सबका मालिक एक है या अलग अलग.?

सोशल मीडिया पर राजधानी दिल्ली के शाहपुर जाट इलाके का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक मंदिर में एक मज़दूर बल्लम से साईं प्रतिमा हटा रहा है और पास खड़ा एक आदमी उसे निर्देश दे रहा है कि बल्लम यहाँ नहीं, यहाँ मारो। यही व्यक्ति मूर्ति गिर जाने के बाद उसे भारी हथौड़े से तोड़ने की कोशिश करता हुआ भी दिखता है, लेकिन असफल होने पर हथौड़ा वह मज़दूर को थमा देता है। इस बीच यह व्यक्ति यह कहते हुए भी साफ़-साफ़ सुना जा सकता है कि साईं बाबा मुसलमान थे, उनकी मूर्ति का यहाँ क्या काम। वो तो 1918 में मर गए थे तो वो भगवान कैसे हो सकते हैं। मूर्तियां लगाना ही है तो चंद्रशेखर, भगत सिंह और राजगुरु की लगाना चाहिए। हालांकि इस बारे में स्थानीय लोगों का कहना है कि साईं प्रतिमा खंडित हो गई थी, उसे गांव वालों की सहमति से ही हटाया गया है। इसको लेकर कुछ लोग भ्रम फैला रहे हैं।

यह पहला मौका नहीं है जब साईं बाबा की मूर्ति को तोड़ने या नुकसान पहुँचाने की कोशिश की गई हो। कुछ ही सालों पहले मेरठ के कनौड़ा गांव में साईं बाबा आश्रम की ज़मीन को लेकर उसके कर्ताधर्ताओं में विवाद हुआ तो एक पक्ष ने आश्रम परिसर में बनी कुटिया और साईंबाबा की 16 फीट ऊंची मूर्ति तोड़ दी थी। ग़नीमत यह रही कि इस मामले में कोई धार्मिक कारण नहीं था। इस घटना के एक साल बाद अमेठी के पकसरवा गांव में एक युवक ने साईं की मूर्ति को जलाने का प्रयास किया था। इसी साल काशी के एक शिव मंदिर में साईं बाबा की मूर्ति तोड़े जाने के बाद शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके साथियों के ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला दर्ज किया था। हालाँकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना था कि चूँकि वे विश्वनाथ गलियारे के लिए मन्दिरों को तोड़े जाने के विरोध में पदयात्रा कर रहे हैं, इसलिए यह कार्रवाई की गई।

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का ज़िक्र आया है तो यह याद करना लाज़मी होगा कि साईं बाबा का पहले-पहल विरोध उन्होंने ही शुरू किया था। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ समय बाद ही उन्होंने एक बयान देते हुए साईं बाबा को भगवान मानने से इनकार कर दिया था। साईं को हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मानने से भी उन्होंने मना कर दिया और कहा कि उनकी पूजा को बढ़ावा देना हिन्दू धर्म को बांटने की साजिश है।  शंकराचार्य ने साईं बाबा के मंदिर बनाए जाने का भी विरोध किया। उन्होंने साईं बाबा के नाम पर कमाई किए जाने का भी आरोप लगाया और कहा कि साईं बाबा अगर वाकई हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक होते तो मुसलमान भी उनमें आस्था रखते। शंकराचार्य इतने पर ही नहीं रुके, कुछ समय बाद उन्होंने एक पोस्टर जारी किया जिसमें हनुमान जी को पेड़ की शाख से साईं बाबा की पिटाई करते हुए दिखाया गया था. हालांकि उन्होंने तब कहा था कि उनका विरोध साईं बाबा से नहीं, बल्कि उनके नाम पर फैलाए जा रहे पाखंड से है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वामी रामदेव ने भी साईं बाबा का विरोध किया है। रामदेव के मुताबिक साईं बाबा एक महान व्यक्ति थे लेकिन उन्हें भगवान का दज़ार् देना ग़लत है। संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह भैया जी जोशी ने कहा कि न तो खुद साईं बाबा ने अपने आपको, न ही समाज ने उन्हें भगवान माना। भैया जी का कहना यह भी था कि ऐसे मुद्दों पर विवाद खड़ा करके समाज में विद्वेष नहीं फैलाना चाहिए। संघ के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य ने भी तब कहा था कि प्रत्येक हिन्दू को अपना आराध्य तय करने की आज़ादी है। ज़ाहिर है कि दोनों ही बयान उन लोगों को ध्यान में रखकर दिए गए जो संघ की विचारधारा को तो मानते हैं लेकिन साईं बाबा में भी आस्था रखते हैं। हालांकि हम लगातार यह देख ही रहे हैं कि किन मुद्दों पर कौन और कैसे विवाद खड़े कर रहा है और कौन समाज में विद्वेष फैला रहा है।

गौरतलब है कि साईं बाबा की आराधना तो बरसों से होती आ रही है और पहले कभी उस पर ऐसा विवाद नहीं हुआ। स्वरूपानंद जी जिस पीठ पर आसीन हैं, उसकी स्थापना करने वाले आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म के अनेक पंथों और सम्प्रदायों को परस्पर जोड़ने के लिए अपना जीवन होम कर दिया था। स्वामी स्वरूपानंद आदि शंकराचार्य के उत्तराधिकारी माने जाते हैं, लेकिन उनके बयान उन आदि गुरु के मूल्यों और सिद्धांतों के उलट अपना असर दिखा रहे हैं। यह देखना दुखद है कि जिस संत ने समाज को  ‘सबका मालिक एक’ का सिद्धांत दिया, चंद लोग उसी संत की मूर्ति तोड़ने पर आमादा हो रहे हैं। याद रहे कि मूर्ति तोड़ने से पाखंड खत्म नहीं होगा। बल्कि धर्म के नाम पर समाज में फैलाए जा रहे विद्वेष और नफरत को दूर करने से पाखंड खत्म होगा।

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