आपाधापी की ट्वीट का पंछी मूँह पर बीट कर जाता है

आपाधापी की ट्वीट का पंछी मूँह पर बीट कर जाता है

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सुनील कुमार॥

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक बयान पर की गई अपनी टिप्पणी पर माफी मांगी है। मोदी ने बांग्लादेश के दौरे के बीच वहां एक भाषण में बांग्लादेश की आजादी या उसके निर्माण के संदर्भ में इंदिरा गांधी का भी जिक्र किया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था- बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष में शामिल होना मेरे जीवन के भी पहले आंदोलनों में से एक था। मेरी उम्र 20-22 साल रही होगी, जब मैंने और मेरे कई साथियों ने बांग्लादेश के लोगों की आजादी के लिए सत्याग्रह किया था।

मोदी के इस कथन पर शशि थरूर ने ट्वीट किया था- हमारे प्रधानमंत्री बांग्लादेश को फर्जी खबर का स्वाद चखा रहे हैं। हर कोई जानता है कि बांग्लादेश को किसने आजाद कराया। अब शशि थरूर ने अपनी इस ट्वीट के लिए माफी मांगी है और कहा है कि उन्होंने जल्दबाजी में ऐसा ट्वीट किया था। उन्होंने कहा कि कल खबरों की सुर्खियां पढक़र उन्होंने यह लिख दिया था जबकि बाद में उन्होंने देखा कि मोदी ने इंदिरा गांधी को भी इसका श्रेय दिया था।

आज जब किसी गलत राजनीतिक बयान के लिए माफी मांगना या अफसोस भी जाहिर करना हिन्दुस्तान में चलन से बाहर हो चुका है, और अमरीका में भी ट्रंप-युग में यह आऊट ऑफ फैशन था। ऐसे में शशि थरूर का यह माफी मांगना उनके सज्जन और उदार होने का एक संकेत तो है, लेकिन उनकी यह नौबत यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज का वक्त और इसकी टेक्नालॉजी लोगों के पास सोचने का वक्त भी छोड़ते हैं?

अभी कुछ दशक पहले तक हिन्दुस्तान में लोग टेलीफोन पर बात करने के लिए भी ऑपरेटर को नंबर देकर घंटों तक इंतजार करते थे। किसी को कुछ लिखकर भेजना होता था तो पोस्टकार्ड या अंतरदेशीय पत्र लाकर उसमें लिखकर उसे पोस्ट करने जाना होता था, और यह सबसे तेज प्रतिक्रिया भी कुछ घंटे तो लेती ही थी। फिर यह भी होता था कि छोटे गांवों में डाकिया रोज नहीं आता था, और जब वह अगली बार आए तब तक सोचने का और लिखने का वक्त रहता था। वह तमाम सिलसिला अब खत्म हो गया है। अब तो लोग वॉट्सऐप पर तेजी से टाईप करके उसे भेज देते हैं, एसएमएस टाईप करके भेज देते हैं, या ईमेल भेज देते हैं, और बात खत्म हो जाती है। कुछ दशकों के भीतर क्या इंसान का मिजाज सचमुच ही इस रफ्तार से बदल गया है कि वे अब पलक झपकते जवाब देने के लायक हो गए हैं? कम्प्यूटर और मोबाइल फोन पर किसी भी चैट पर एक मिनट के भीतर लोगों की दस-दस बातें आती-जाती हैं, और लोग इस बात की भी परवाह नहीं करते कि उनका लिखा हुआ सभी है या नहीं, या वे किसी कानूनी उलझन की बातें तो नहीं लिख रहे हैं? आज जब कोई बात जुर्म के दायरे में आ जाती है तो लोगों को समझ पड़ता है कि उनका एक-एक शब्द किस तरह उन्हें सजा दिलाने के लिए काफी है। दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर बहुत से केन्द्रीय मंत्री और सांसद समय-समय पर अपने सार्वजनिक बयानों के लिए अदालतों में या अदालत के बाहर माफी मांगकर, बयान वापिस लेकर कानूनी मामले खत्म करवाते दिखते हैं। ये बयान लोग उत्तेजना में देते हैं, या हड़बड़ी में कही हुई बातें रहती हैं। जब टीवी चैनलों के माइक्रोफोन सामने रहते हैं और कैमरे तने रहते हैं, तो लोग एक अजीब सी दिमागी हालत में बयान देने लगते हैं, और मानो वे अपना आपा खोकर बेदिमाग बातें करने लगते हैं। कई दशक पहले जब सिर्फ अखबारनवीस डायरी में बातों को नोट करते थे, तो लोग प्रेस कांफ्रेंस की शुरूआत में अपनी कही बातों को खत्म होने के पहले तक कुछ सुधार भी लेते थे, और अखबारनवीस भी ऐसी चूक या बदली हुई सोच को मान लेते थे। लेकिन आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो महज चूक, लापरवाही, बददिमागी, या बेदिमागी पर फोकस रहता है, और यही बातें उसे अधिक दर्शक जुटाने में मदद करती हैं। कुछ-कुछ इसी किस्म की बातें लोगों के सोशल मीडिया अकाऊंट्स पर भी काम आती हैं। इसलिए अब कुछ कहने के बाद कुछ पल बाद भी उसमें सुधार या फेरबदल की गुंजाइश नहीं रह जाती। आज टेक्नालॉजी का हर चीज को रिकॉर्ड कर लेने और सुबूत की तरह दर्ज कर लेने का मिजाज ऐसा है कि बहुत सावधान नेता भी कभी-कभी चूक कर ही जाते हैं। इसलिए आधे पढ़े हुए पर डेढ़ दिमाग से की गई टिप्पणी खुद पर भारी पड़ती है, और ट्विटर का पंछी उडक़र आकर लापरवाह के चेहरे पर बीट कर जाता है। आज डिजिटल और सोशल मीडिया पर किसी चूक के लिए, गलती या गलत काम के लिए माफी की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए लोगों को इत्मीनान से पढ़-समझकर, सोच-विचारकर ही जुबान खोलनी चाहिए, या उंगलियों को की-बोर्ड पर चलाना चाहिए। हड़बड़ी महज माफी मांगने या मुकदमा झेलने की गुंजाइश छोड़ती है।

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