भरी संसद में संविधान और लोकतंत्र का चीरहरण..

भरी संसद में संविधान और लोकतंत्र का चीरहरण..

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2014 में भाजपा जब केंद्र की सत्ता में आई थी, तभी शायद उसने यह प्रण ले लिया था कि वह धीरे-धीरे सभी राज्यों में भी सरकार बनाएगी। शायद इसी का नतीजा था कि विधानसभा चुनावों में प्रचार के लिए प्रधानमंत्री और पूरा केन्द्रीय मंत्रिमंडल अनके सभाएं, रैलियां करने लगा। विधानसभा चुनावों में पिछले छह-सात सालों से जितनी हलचल मची है, जिस बड़े पैमाने पर मीडिया कवरेज, दलबदल, खरीद-फरोख्त, ध्रुवीकरण आदि हुए हैं, शायद ही पहले कभी हुए हों। अब तो भाजपा निगम और पंचायत चुनावों में भी राष्ट्रीय स्तर की दखलंदाजी करने लगी है। हर वक्त चुनाव जीतने की फिराक में रहने वाली भाजपा अगर किसी राज्य में हार जाती है, तो कुछ समय में ही आपरेशन लोटस जैसे अभियान शुरु हो जाते हैं। निर्वाचित सरकारों को अस्थिर कर परेशान करने की कोशिश की जाती है और मौका देखते ही उनसे कुर्सी छीनकर अपना मुख्यमंत्री बैठा दिया जाता है। मणिपुर, गोवा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, पुड्डूचेरी में हम ये सब देख चुके हैं।

राजस्थान में उसे सफलता नहीं मिली। जम्मू-कश्मीर में भी विशेषाधिकार छीनकर उसके दो टुकड़े कर दिए और अपना उपराज्यपाल बिठा कर सत्ता की कमान हाथों में ली। दिल्ली में भी भाजपा राज करने के अरमान संजोए हुए है। चुनावों में तो लगातार उसे हार मिल रही थी। यहां की जनता ने भाजपा को हराकर कैसे राष्ट्रविरोधियों का साथ दिया, इसका उलाहना एक गोदी मीडिया के चाटुकार पत्रकार ने पिछले चुनावों के नतीजे आने के बाद दिया था। लेकिन अब दिल्ली की जनता को भाजपा उसके किए की सजा देने जा रही है। जनता ने तो आम आदमी पार्टी पर भरोसा जताकर उसके हाथों में सत्ता सौंपी। लेकिन अब भाजपानीत एनडीए सरकार ने ऐसा विधेयक पारित कराया है, जिसमें उपराज्यपाल ही सरकार होंगे और निर्वाचित मुख्यमंत्री केवल नाम के होंगे।

राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक यानी जीएनसीटीडी विधेयक को लोकसभा से सोमवार को ही मंजूरी मिल गई थी और बुधवार 24 मार्च को राज्यसभा में इसे हंगामे के बावजूद पारित करा लिया गया। एक दर्जन से अधिक राजनैतिक दलों ने संसद में इस विधेयक का विरोध किया, लेकिन फिलहाल भारत का हाल ऐसा है कि होई है वही जो मोदी रची राखा। जो बात मोदीजी ने सोच ली है, उसे मुमकिन करने ही दम लेते हैं, फिर चाहे इसके लिए संविधान की धज्जियां उड़ानी पड़े, या नैतिकता और उसूलों को ताक पर रखा जाए।

राज्यसभा में तो हंगामा इतना हुआ कि कार्यवाही 2 बार स्थगित करनी पड़ी। विपक्षी सदस्यों ने ‘तानाशाही बंद करो’ के नारे तक लगाए और आखिर में कार्यवाही का बहिष्कार कर दिया। लेकिन विधेयक फिर भी पारित हो ही गया। अब राष्ट्रपति के दस्तखत से ये कानून बन जाएगा। केंद्र सरकार इस विधेयक के जरिए दिल्ली में पिछले दरवाजे से सरकार चलानी चाहती है, ऐसे आरोप उस पर लग रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने इसे काला कानून बताया है, जो चुनी हुई सरकार के अधिकारों को खत्म करेगा। राज्यसभा में विधेयक पर बहस के दौरान आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने इसे ‘संविधान का चीरहरण’ बताया। अरविंद केजरीवाल ने इसे लोकतंत्र के लिए शोक का दिन बताया।

आम आदमी पार्टी का गुस्सा जायज है, क्योंकि उसकी चुनावी जीत, एक विधेयक के कारण हार में बदल रही है। काश कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आज जिस बात पर इतने दुखी और नाराज हैं, वही गुस्सा उन्होंने जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार के फैसले के वक्त दिखाया होता। क्योंकि तब भी केंद्र सरकार ने कश्मीर के लोगों से किया भारत का वादा तोड़ा ही था। तब भी पिछले दरवाजे से सत्ता पर काबिज होने की चाल रची गई थी। तब केजरीवाल ने इस फैसले का स्वागत किया था, आज खुद पर वही जबरदस्ती हुई तो संविधान का तकाजा याद आ रहा है।

किसी बहाने से ही सही, संविधान की याद आना अच्छी बात है। वैसे भी यहां मसला आम आदमी पार्टी की नाराजगी या खुशी का नहीं है, यहां मसला लोकतंत्र का है। केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में निर्वाचित मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों के बंटवारे की लड़ाई कई सालों से चल रही है। 2018 में इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनी हुई सरकार के पास शक्ति होनी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 239 ए ए की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा था कि दिल्ली में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के पास 3 मुद्दों के अलावा राज्य और समवर्ती सूची के बाकी सभी मुद्दों पर निर्णय लेने का अधिकार है।

उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के लिए गए निर्णयों में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे। लेकिन अब जीएनसीटीडी विधेयक से उपराज्यपाल ही दिल्ली की सरकार बन जाएंगे। पुलिस, भूमि और पब्लिक आर्डर के अलावा अन्य शक्तियां भी एलजी को मिल जाएंगी। दिल्ली सरकार को जनता के हित के हर मुद्दे को पास करवाने के लिए एलजी से अनुमति लेनी होगी। हरेक फाइल को मंजूरी के लिए उपराज्यपाल के पास भेजना होगा। नए कानून के बनने से केजरीवाल मंत्रिमंडल की भूमिका भी खत्म हो जाएगी। कैबिनेट में कोई भी फैसला लेने से पहले उपराज्यपाल की मंजूरी जरूरी होगी। केंद्र सरकार इस विधेयक के विरोध में उठ रही सारी आवाजों को नकारते हुए इसे दिल्ली के हित में जरूरी बता रही है।

ठीक वैसे ही जैसे किसानों के हित में कृषि कानूनों को बताया था। अरविंद केजरीवाल अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। इससे पहले वे जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर चुके हैं। अब देखना होगा कि वे दिल्ली के हक और संविधान को बचाने के लिए अन्ना दौर वाले अनशन जैसा कोई दांव चलते हैं या भाजपा की रणनीतियों के आगे परास्त होते हैं। वैसे सत्ता की लालसा में लोकतंत्र को लगातार परास्त किया जा रहा है, यह जनता को अब समझ लेना चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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