इतिहास की गलती न सुधारने के नतीजे

इतिहास की गलती न सुधारने के नतीजे

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जब हम इतिहास से सबक नहीं लेते हैं, तो बार-बार गलतियां करते हैं और फिर उसकी सजा भी हमें ही भुगतनी पड़ती है। यह बात इस दौर की सत्ता को देखकर सौ फीसदी सच लगती है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों के भयावह परिणाम देखकर भी हमने कोई सबक नहीं लिया और उसके बाद उसी तरह की आग में देश को कई बार झुलसना पड़ा। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो नीति का दुष्परिणाम हमने भुगता, लेकिन उसके बाद भी उस चालाकी को अनदेखा किया, नतीजा ये हुआ कि सत्ताधीश आज तक उसी दांव को जनता पर आजमाते रहते हैं। अपनी सत्ता की पकड़ मजबूत बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने कई दमनकारी कानून बनाए, जिनके कारण जनता पर अत्याचार और बढ़ा। अब आजाद भारत में भी इसी तरह मनमाने तरीके से कानून बन रहे हैं और जनता एक बार फिर प्रताड़ित की जा रही है। केंद्र सरकार ने तो जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने से लेकर कृषि कानूनों तक बहुमत का बेजा इस्तेमाल किया। अब बिहार सरकार भी उसी नक्शेकदम पर चल रही है। आखिर भाजपा दोनों ही जगह सत्ता में है।

मंगलवार को बिहार विधानसभा में तमाम हंगामे के बीच बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 को पारित हुआ मान लिया गया। अंग्रेजों ने 1919 में राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने, स्वाधीनता सेनानियों के दमन के लिए रोलेट एक्ट पारित किया था। जिसमें अपील, वकील और दलील की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया था, यानि किसी भी भारतीय को मुकदमा चलाए बगैर जेल में बंद किया जा सकता था। यह कानून पुलिस को असीमित शक्ति देता था। इसी के विरोध में जलियांवाला बाग में सभा हो रही थी, जिसमें जनरल डायर ने क्रूरता के साथ गोलियां चलवाकर नरसंहार किया था। अगले माह 13 अप्रैल को इतिहास के इस पन्ने को झाड़-पोंछकर सरकार पढ़ेगी और शहीदों को याद करेगी। अंग्रेजों ने अब अपनी इस क्रूरता पर खेद प्रकट किया है। लेकिन भारत में शासक पुलिस को असीमित शक्तियों से लैस करने की इच्छा अब भी रखते हैं, ताकि उन्हें शासन में आसानी हो। बिहार का विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 इसका प्रमाण है।

विशेष सशस्त्र पुलिस बल सीआईएसएफ की तर्ज पर होगा। ये बिहार में स्थित बड़ी फैक्ट्रियों, मेट्रो, एयरपोर्ट जैसी जगहों की सुरक्षा करेगा। विधेयक में सीआईएसएफ की तरह इस नए सुरक्षा बल को भी बिना वारंट के तलाशी और गिरफ्तारी का अधिकार होगा। विपक्ष इस विधेयक का विरोध कर रहा था, उसके मुताबिक यह बल भले ही औद्योगिक इकाइयों के लिए हो, लेकिन इसकी आड़ में विपक्ष के नेताओं को परेशान किया जा सकता है। इस विधेयक का मंगलवार को सदन में जबरदस्त विरोध हुआ और विपक्षी विधायकों को प्रदर्शन करने से रोकने के लिए आखिरकार मार्शल और पुलिस की मदद ली गई। जिसमें पुलिस पर कई विधायकों के साथ मार-पीट करने, किसी की छाती पर जूते रखने, अपशब्दों का इस्तेमाल करने और महिला विधायकों के कपड़े खींचने जैसी बदसलूकी के आरोप लगे हैं। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश इस कानून को लेकर उठ रही आशंकाओं पर ये कहते हैं कि मैं ये स्वीकार करता हूं कि जब ये कानून बन रहा था तो अधिकारियों को प्रेस के सामने इसकी पूरी जानकारी देनी चाहिए थी। अगर ऐसा होता तो इसको लेकर कंफ्यूजन नहीं होता। जिस बात को महज कंफ्यूजन बताकर हल्का करने की कोशिश सरकार कर रही है, वह दरअसल लोकतंत्र को ताबूत में बंद करने की एक और कोशिश है।

यह कड़वी सच्चाई है कि लोकतंत्र के बूते सत्ता में बैठे लोग लोकतांत्रिक अधिकारों का दुरुपयोग करके लोकतंत्र को ही चोट पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। विधानसभा या संसद में जनप्रतिनिधित्व होने का अर्थ ही ये है कि कोई भी विधेयक कानून की शक्ल लेने से पहले पूरी तरह से जांचा-परखा जाए, उस पर विधायकों-सांसदों की राय ली जाए। लेकिन अभी सारा खेल बहुमत का बना दिया गया है। केंद्र में तो भाजपा को पूर्ण बहुमत है, लेकिन बिहार में न नीतीश कुमार की जदयू के पास, भाजपा के पास अकेले बहुमत हासिल है। फिर भी सत्ता का घमंड उन पर सिर चढ़कर बोल रहा है। बिहार विधानसभा में विपक्षी विधायकों ने चाहे जिस तरह का विरोध किया हो, उन पर इस तरह का पुलिसिया दमन अस्वीकार्य है। यह काम किसी गैरभाजपाई सरकार में होता तो प्राइम टाइम में यही चर्चा का विषय होता। भाजपा फौरन सरकार से इस्तीफे की मांग करती और शायद राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश हो जाती।

मंगलवार को ही बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था आदि पर राजद ने विधानसभा घेराव के नाम का मार्च निकाला था। जिसमें तेजस्वी और तेजप्रताप यादव के साथ सैकड़ों कार्यकर्ता थे। इन लोगों को भी पुलिस ने पानी की बौछार, लाठी चार्ज आदि कर रोकने की कोशिश की। कई राजद नेताओं पर प्राथमिकी दर्ज की गई। नीतीश सरकार का ये रवैया बतलाता है कि केंद्र सरकार की ही तरह उसे सदन या सड़क कहीं भी अपना विरोध बर्दाश्त नहीं है। और जहां विरोध के लिए जगह न हो, वो कैसा लोकतंत्र होगा, यह समझा जा सकता है। इतिहास हमें गलतियां याद दिला रहा है और हम उन गलतियों को सुधार ही नहीं रहे हैं।

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