कोरोना टीके की दूसरी डोज और असमंजस..

कोरोना टीके की दूसरी डोज और असमंजस..

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खुराक के अंतराल के बीच प्रधानमंत्री की दूसरी खुराक की खबर भी तो देते संपादक भाई लोग..

-संजय कुमार सिंह॥
साथी सुरेन्द्र ग्रोवर ने फेसबुक पर लिखा है, “आप सबको याद होगा कि खबरों और इस तस्वीर के साथ पता चला था कि एक मार्च को शुरू हुए दूसरे दौर के टीकाकरण की अलसुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत बॉयोटेक की कोवैक्सीन (Covaxin) ली थी और उसकी दूसरी डोज दो हफ्ते बाद ली जानी थी लेकिन मामूली से मामूली सी घटना को इवेंट में बदल देने वाले मोदी जी ने अब तलक कोरोना के टीके की दूसरी डोज नहीं ली है जबकि उन्हें पहला टीका लगवाए हुए आज 24वाँ दिन हो गया है।

चूंकि मैं अपने देश को खुद से भी अधिक प्रेम करता हूँ और इस वक़्त नरेंद्र मोदी हमारे देश के प्रमुख व्यक्ति ही नहीं बल्कि दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता भी हैं तो मुझे उनके स्वास्थ्य की चिंता होना भी लाज़िमी है.. हो सकता है कि अपनी व्यस्ततम दिनचर्या के चक्कर में मोदीजी टीके की दूसरी डोज लेना भूल गए हों, अब मेरे पास उनके हॉट लाइन नम्बर तो हैं नहीं इसलिए सोचा कि इस किताब ए चेहरा के ज़रिए ही याद दिलवा दूँ।”


मैंने सुरेन्द्र जी को बताया कि, “आज इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी ‘लीड’ का उपशीर्षक है, कोविन (के मामले) में बदलाव, लाभार्थी दूसरी खुराक की तारीख चुन सकते हैं। केंद्र सरकार ने मंगलवार को यह सूचना राज्यों को दी। पहले पन्ने पर जितनी खबर है उसमें यह भी बताया गया है कि सूचना “सर्वोच्च सूत्रों” के हवाले से है। कहने की जरूरत नहीं है कि एक्सप्रेस ने आज कई दिनों बाद कोरोना की खबर पहले पन्ने पर छापी है लेकिन टीके के अलावा जो खबर है वह बताती है कि कोविड से नौकरी जाने का शिकार होने वालों में महिलाएं ज्यादा हैं।

यह खबर किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। आप जानते हैं कि कल दो टीकों में से एक, कोविशील्ड की दो खुराक में अंतराल बढ़ाने की खबर लीड बनी थी। आज आपकी पोस्ट से पता चल रहा है कि प्रधानमंत्री ने कोविशील्ड नहीं को वैक्सीन लगवाई थी और इसके मामले में अंतराल बढ़ाने की खबर बाद में आई, जो दब गई। कल इस बारे में कुछ नहीं कहा गया था या यही कहा गया था कि कोविशील्ड के मामले में अंतराल बढ़ाया गया है और को वैक्सीन इस तरह संभव है कि प्रधानमंत्री दूसरी खुराक कुछ समय बाद लगवाएं लेकिन आप खबरों पर ठीक से ध्यान नहीं देंगे तो परेशान तो होंगे। पाठकों को यह तथ्य बताना अखबारों का था पर वे यही बताते हैं जो उनसे कहा जाता है।


उदाहरण के लिए, कोविशील्ड के बारे में जितनी प्रमुखता से खबर छपी और दो खुराक के बीच अंतराल बढ़ाने की जानकारी दी गई उससे वह को वैक्सीन के मुकाबले अलग हो। प्रधानमंत्री ने कोवैक्सिन लगवाई है। आम आदमी को प्राथमिकता देनी हो तो किसेे दे? बहुत लोग इसी उधेड़बुन में टीका नहीं लगवाएंगे। बात इतनी ही होती तो ठीक था। अंतर है तो है और बाजार पर उसका असर होगा। लेकिन आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर से ऐसा लगता है कि अंतर दरअसल नहीं है। है तो यही कि एक की खबर छपी एक की नहीं छपी या कम छपी। एनडीटीवी की एक खबर के मुताबिक, नई गाइडलाइंस में कोवैक्सिन के मामले में दो खुराक के बीच का अंतराल चार से छह सप्ताह और कोविशील्ड के मामले में चार से आठ सप्ताह है। यानी दोनों दवाइयों की दो खुराक के बीच अंतराल में दो हफ्ते का अंतर है ही। लेकिन मुझे नहीं लगता कि अखबारों की खबरों से यह किसी आम पाठक को समझ में आया होगा।

इसके प्रत्युत्तर में सुरेंद्र ग्रोवर का कहना है कि “यदि को वैक्सीन के दूसरे डोज के अंतराल को बढ़ा हुआ मान भी लिया जाए तो यह खबर कब आई.? और हाँ, सभी संचार साधनों तथा मीडिया में यही प्रचारित किया गया है कि कोविशील्ड की दूसरी डोज का अंतराल बढ़ाया गया है व को-वैक्सीन के लिए पुरानी गाइडलाइन्स ही प्रभावी रहेगी..
कुलमिलाकर यह खबरें सिर्फ 48 घण्टों के भीतर आई हैं जबकि मोदीजी ने 1 मार्च को को वैक्सीन लिया बताया था और उस समय चल रहे प्रोटोकॉल के हिसाब से तब 15वें दिन को वैक्सीन की दूसरी डोज लिया जाना जरूरी था, जो 15 मार्च को पूरे हो गए थे.. देश के प्रधानमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति इतनी बड़ी लापरवाही कर कैसे सकता था.? यही नहीं, मोदीजी, इस लापरवाही के ज़रिए देश को क्या संदेश देना चाहते थे.?? इन सवालों के जवाब कौन देगा.??”


यह अलग बात है कि, कोविशील्ड की खुराक का अंतराल बढ़ाने की खबर उन्हीं लोगों के लिए थी जो पहली खुराक लगवा चुके हैं या कुछ दिन में लगवाने वाले हैं। और यह सूचना टीका लगाने वाले अस्पतालों, केंद्रों, कर्मचारियों के जरिए जरूरतमंद लोगों को दी जा सकती थी। प्रेस विज्ञप्ति भी एक तरीका है पर हरेक विज्ञप्ति लीड नहीं बनती। फिर भी लीड बनी तो इसीलिए कि मकसद सरकार का प्रचार करना भी था। बेशक टीके का पूरा मामला इलाज से ज्यादा प्रचार के रूप में चल रहा है। सरकार काम कर रही है तो प्रचार करे, उम्मीद भी करे लेकिन अखबार क्यों सहयोग कर रहे हैं? संदर्भ के रूप में इसके साथ यह खबर होनी चाहिए थी कि प्रधानमंत्री ने एक मार्च को को-वैक्सीन लगवाया था और दूसरी खुराक के बारे में कोई खबर नहीं है। पर ऐसा नहीं हुआ।


आज दूसरी खबर छप गई कि एक अप्रैल से 45 पार वाले टीका लगवा सकेंगे। इस बार यह सूचना केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री ने दी है। द हिन्दू में पहले पन्ने पर एक खबर है, गृहमंत्रालय ने राज्यों को सलाह दी, जांचें, ट्रैक रखें और उपचार करें। इस खबर से लगता है कि आपदा प्रबंध अधिनियम 2005 के तहत कोविड का मामला गृहमंत्रालय देख रहा है और इससे आप समझ सकते हैं कि स्वास्थ्यमंत्री क्यों गायब हैं? अगर ऐसा है तो किस्तों में काम होने का कारण हो सकता है कि गृहमंत्री चुनाव में व्यस्त हैं। यह अलग बात है कि देश में गृह राज्यमंत्री और गृहउपमंत्री भी होते थे। अब राज्य मंत्री या उपमंत्री को कौन जानता है जब स्वास्थ्य मंत्री स्वास्थ्य और टीका जैसे मामलों में सामने नहीं आ रहे हैं।


यह अलग बात है कुछ ही दिन पहले बाबा रामदेव ने कोरोनिल दवा पेश करने का दावा किया तो स्वास्थ्य मंत्री समेत एक और केंद्रीय मंत्री मंच पर मौजूद थे। तस्वीरें भी छपी थीं। बाद में दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने मांग की कि स्वास्थ्य मंत्री कहें कि वे पतंजलि की दवा कोरोनिल को एनडोर्स नहीं कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री कोरोनिल को एनडोर्स करते हैं कि नहीं यह तो नहीं पता चला पर अब तो यह भी पता नहीं चल रहा है कि भारत सरकार के इन आदेशों को एनडोर्स करते हैं कि नहीं। और सूचना प्रचारण मंत्री ने ऐसी घोषणा क्यों की। और की तो प्रधानमंत्री से संबंधित जानकारी क्यों नहीं दी।

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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