Home गौरतलब सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही इनका मकसद है..

सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही इनका मकसद है..

 गाजियाबाद के मंदिर में पानी पी लेने पर एक मुस्लिम बच्चे की बेरहम पिटाई का वीडियो हाल ही में वायरल हुआ था। सोशल मीडिया पर बहुत सारे लोगों ने इस घटना पर सवाल उठाए, आपत्ति जताई और पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ़्तार कर लिया। अब एक दूसरी घटना का वीडियो सामने आया है जिसमें मेरठ के किसी सैलून में काम करने वाले फैज खान की कुछ लोग इसलिए पिटाई कर रहे हैं कि उसने अपने गले में रुद्राक्ष की माला पहनी हुई थी। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी एक स्थानीय पत्रकार के अनुसार पिटाई करने वाले भाजपा युवा मोर्चा के कार्यकर्ता थे। वीडियो में एक व्यक्ति फैज की मूंछें खींचते हुए और गंदी गालियां देते हुए पूछ रहा है कि क्या वह मंदिर में गीता और हनुमान चालीसा भी पढ़ेगा?

https://twitter.com/imMAK02/status/1373533808574656512?s=09

गनीमत है कि पुलिस ने इस मामले में पत्रकार के ट्वीट का संज्ञान लिया और तुरंत कार्रवाई की। लेकिन इस घटना पर भी लोगों ने सवाल खड़े किए हैं, मसलन क्या रुद्राक्ष की माला सिर्फ कट्टर तथाकथित हिन्दू ही पहन सकता है? क्या रुद्राक्ष की माला किसी और धर्म के अनुयायी द्वारा पहनने पर रोक का कोई कानून उत्तर प्रदेश में बना है? यह भी पूछा जा रहा है कि फैज को ऐसी माला पहननी चाहिए? क्या उसका धर्म ऐसी मालाएं पहनने की इजाजत देता है? दोनों ही तरह के सवाल अपनी जगह जायज हैं लेकिन इनसे अलग यह सवाल भी तो उठता है कि किसी गैर हिन्दू के मंदिर में पानी पी लेने या रुद्राक्ष की माला पहन लेने जैसी मामूली बातों पर मारपीट करना कैसे जायज है और कौन ऐसा करने का अधिकार देता है?

ये घटनाएं देखने में भले ही छोटी लगती हों लेकिन हमारी गंगा-जमुनी रवायत को ये कितना बड़ा नुक्सान पहुंचा रही हैं, ये समझने की जरूरत है। अयोध्या में बाबू टेलर्स के नाम से मशहूर सादिक खान ने दो साल तक रामलला विराजमान के लिए कपड़े सिले। अहमदाबाद में मुस्लिम समुदाय के लोग कई सालों से जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा से पहले चांदी का रथ भेंट करते आ रहे हैं। बनारस में कई मुस्लिम परिवार है जो नवरात्र के समय माता की चुनरी बनाने का काम करते हैं। रामपुर में तो न जाने कितने हिन्दू एक मुस्लिम परिवार द्वारा बनाई जाने वाली चुनरियों से रोजगार हासिल करते हैं। कितने ही हिन्दू दरगाहों में चादर चढ़ाते हैं और मन्नत मांगते हैं। वे रोजे भी रखते हैं और ताजिए भी बनाते और उठाते हैं।

लेकिन पिछले कुछ समय से भावनाओं की आड़ लेकर बात-बेबात बवाल खड़ा किया जा रहा है। लॉकडाऊन के दौरान वैष्णोदेवी श्राइन बोर्ड ने मुसलमानों को अपने आशीर्वाद भवन में क्वारंटीन में रखा और रमजान के मद्देनजर उनके खाने-पीने की व्यवस्था की तो भावनाएं आहत हो गईं, मथुरा के नंद बाबा मंदिर परिसर में खुदाई खिदमतगार संस्था के लोगों ने जल्दबाजी में नमाज पढ़ ली तो भावनाएं आहत हो गईं, टाइटन के विज्ञापन में मुस्लिम परिवार की हिन्दू बहू की गोदभराई की रस्म दिखाई गई तो भावनाएं आहत हो गईं। बरसों से धार्मिक तस्वीरों वाले पटाखे बनते और बिकते आ रहे थे, लेकिन पिछली दिवाली भावनाओं के आहत होने के नाम पर जगह-जगह पटाखा व्यापारियों को धमकाया-चमकाया गया।

गरज ये कि इन विघ्नसंतोषियों को हर दिन, हर पल कोई न कोई बहाना चाहिए जिसे लेकर वे हंगामा खड़ा करते रहें। उनकी करतूतों से समाज टूटता हो तो टूट जाए। लेकिन हमने पहले भी कहा है और बार-बार कहेंगे कि कल को हममें से कोई भी धर्म या मजहब के नाम पर फैलाई जा रही नफरत का शिकार हो सकता है। हो सकता है किसी से यही पूछ लिया जाए कि वह सिख नहीं है तो उसने हाथ में कड़ा क्यों पहना है, ब्राह्मण है तो जनेऊ क्यों नहीं पहनी है या हिन्दू है तो माथे पर बिंदी क्यों नहीं है, शादीशुदा है तो गले में मंगलसूत्र या मांग में सिन्दूर क्यों नहीं है। मुसलमान है तो टोपी या बुर्का कहां है और ईसाई है तो नाम हिन्दुओं जैसा क्यों है। अब यह जनता पर है कि वह ऐसे तत्वों का प्रतिरोध करे या फिर उनके हाथों पिटने के लिए तैयार रहे।

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