जनता हैरान परेशान, सरकार और मंत्री खुशहाल..

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भारत उदास है, यानी भारत के लोग खुश नहीं हैं। ये बात वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट से सामने आई है। संतोषं परम सुखम के दर्शन पर चलने वाले भारतीय शायद सचमुच इतने संतोषी हो गए हैं, कि अब उन्हें जो जैसा मिलता है, उसमें काम चला लेते हैं। इसमें जीवन तो गुजर रहा है, लेकिन खुशियां हासिल नहीं हो रही हैं। दरअसल संयुक्त राष्ट्र का एक संस्थान ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशन नेटवर्क’ (एसडीएसएन) हर साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वे करके वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट जारी करता है। इसमें अर्थशास्त्रियों की एक टीम समाज में सुशासन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, जीवित रहने की उम्र, दीर्घ जीवन की प्रत्याशा, सामाजिक सहयोग, स्वतंत्रता, उदारता आदि पैमानों पर दुनिया के सारे देशों के नागरिकों के इस अहसास को नापती है कि वे कितने खुश हैं। इस बार जो रिपोर्ट सामने आई है, उसमें भारत पीछे से अग्रणी कुछ देशों में शामिल हो गया है। भारत से आगे कुछ पिछड़े माने जाने वाले अफ्रीकी देश भी हैं। यानी यहां के लोग भारतीयों से अधिक खुशहाल हैं।

2021 की हैपिनेस रिपोर्ट में भारत को 149 देशों में से 139वां स्थान मिला है। पिछले बरस 156 देशों में भारत 144वें पायदान पर था। उससे पहले यानी 2019 में 140वें, 2018 में 133वें और 2017 में 122वें पायदान पर था। यानी साल दर साल भारत के लोगों की खुशहाली कम होती गई, उदासी का साया गहराता गया। जबकि इन बरसों में भारत पर शासन करने वाली भाजपा की सदस्य संख्या और चंदे दोनों में इजाफे के कारण उसकी ताकत बढ़ी है। शेयर बाजार ने भी उछाल के रिकार्ड तोड़े हैं और कुछ उद्योगपतियों की संपत्ति में रिकार्ड तोड़ इजाफा हुआ है।

भारत में लोगों की उदासी का एक बड़ा कारण अर्थव्यवस्था का कमजोर होना है। जीडीपी में गिरावट, महंगाई दर का बढ़ना, तेल की कीमतों में उछाल, गैस सिलेंडर के दाम बेतहाशा बढ़ना, इन सबने आम भारतीय की कमर तोड़ कर रख दी है। हाल ही में एक और रिपोर्ट आई थी, जिसके मुताबिक लॉकडाउन के बाद भारत में मध्यवर्ग का दायरा घटा है। अमेरिका के प्रतिष्ठित प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के अनुसार इस महामारी ने भारत में 3 करोड़ 20 लाख लोगों को मध्य वर्ग की श्रेणी से चले गए। मध्य वर्ग से मतलब उन लोगों से है जो हर रोज 700 रुपये से लेकर 1400 रुपये की कमाई कर लेते हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कोरोना महामारी और लॉकडाउन में बड़े पैमाने पर नौकरियां गईं और इसने लाखों लोगों को गरीबी में धकेल दिया।

वहीं सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर में राष्ट्री्रय बेरोजगारी दर 9.06 प्रतिशत पर पहुंच गई। यह नवंबर में 6.51 प्रतिशत थी। इसी तरह ग्रामीण बेरोजगारी दिसंबर में 9.15 प्रतिशत पर थी, और नवंबर में 6.26 प्रतिशत पर थी। यानी लॉकडाउन के बाद भी बेरोजगारी दर बढ़ती ही दिखी। अंतरराष्ट्रीय संस्था ऑक्सफैम ने भी अपनी रिपोर्ट ‘द इनइक्वैलिटी वायरस’ में कहा है कि कोरोना वायरस और उस वजह से हुए लॉकडाउन की वजह से जहां एक ओर 12 करोड़ लोगों का रोजगार गया, वहीं सबसे धनी अरबपतियों की जायदाद 35 प्रतिशत बढ़ गई। इस दौरान भारत के सौ अरबपतियों की संपत्ति में 12.97 खरब रुपए का इजाफा हुआ।

लेकिन भारत में खुशहाली न दिखने के पीछे केवल आर्थिक कारण ही नहीं हैं। इसके अलावा भ्रष्टाचार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अघोषित अंकुश, समाज में बढ़ती गैरबराबरी, समुदायों के बीच तनाव जैसे कारण भी भारतीय लोगों की खुशहाली कम करने के पीछे जिम्मेदार हैं। गौरतलब है कि वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट में फिनलैंड लगातार चौथे साल पहले स्थान पर काबिज है। रिपोर्ट में इसे सबसे सुरक्षित और सबसे सुशासन वाले देश का दजार् दिया गया है। फिनलैंड में भ्रष्टाचार कम है, सामाजिक तौर पर यह प्रगतिशील देश है। फिनलैंड की पुलिस दुनिया में सबसे ज्यादा साफ-सुथरी और भरोसेमंद है। वहां हर नागरिक को मुफ्त इलाज की सुविधा प्राप्त है। यही सब इस देश के नागरिकों की खुशहाली का कारण है।

हम रातों रात खुशहाल नहीं हो सकते। न फिनलैंड की तरह हमारा समाज और प्रशासन में इतना बदलाव आ सकता है कि सारी गैरबराबरियां एक झटके में दूर हो जाएं। लेकिन फिर भी ये वक्त आत्ममंथन का है कि आखिर देश में उदासी का घेरा बढ़ क्यों रहा है। सत्ता में बैठी भाजपा भारतीय दर्शन को हाशिए पर धकेलती हुई सत्ता की लिप्सा में बुरी तरह घिरी हुई है और इसमें जनता के सरोकार पीछे छूट रहे हैं। खुद भारतीय जनता भी एक ओर धर्म के शोर में आत्मा की आवाज को सुन नहीं पा रही है। नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों और वैश्वीकरण के बाद से समाज में अंधी प्रतियोगिता शुरु हो चुकी है। बचपन से अच्छे अंक लाने,  कॅरिअर बनाने, पैसे कमाने और सुविधाएं-संसाधन जुटाने की एक होड़ सी शुरू हो गई है। तरह-तरह के क्रेडिट कार्ड लिए लोग आवश्यकता और विलासिता का फर्क भुला चुके हैं। बाजार की दौड़ में जो पिछड़ता है वह निराशा और अवसाद का शिकार हो जाता है, लेकिन जो सफल होता है वह भी अपनी मानसिक शांति गंवा बैठता है।

खुशहाली इंडेक्स में लगातार गिरावट हमारे लिए एक चेतावनी है कि हम उदारता, बराबरी, सत्य, अहिंसा जैसे अपने मूल्यों को सहेजें। और सरकार से खुशहाली की केवल उम्मीद न करें, बल्कि इसके लिए उसे जिम्मेदारी का अहसास भी कराएं। तभी हालात बदलेंगे।

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