प्याले में तूफ़ान..

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-कँवल भारती॥

कुरआन की 26 आयतों को हटाने के संबंध में वसीम रिज़वी की रिट से प्याले में तूफ़ान आ गया. जो इस्लाम 1400 साल से आजतक खतरे में नहीं पड़ा, वह अब खतरे में पड़ गया है. वसीम रिजवी का चौतरफा विरोध हो रहा है. उसे इस्लाम से खारिज कर दिया गया है, और कत्ल करने की आवाजें आने लगी हैं. मुरादाबाद के एक वकील अमीरुल हसन जाफरी ने वसीम रिजवी का सर कलम करने वाले को 11 लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की है, तो अलीगढ़ की मशहूर शायरा रिहाना शाहीन ने रिजवी को 11 जूते मारने वाले को एक लाख रुपए देने का एलान किया है. ये बुजदिल लोग हैं, जो दूसरों को उकसाकर अपराध करवाते हैं. क्या अमीरुल हसन जाफरी और रिहाना शाहीन अपंग हैं, उनके अपने हाथ नहीं हैं? वे खुद क्यों नहीं इस अपराध को अंजाम देते? अमीरुल हसन जाफरी खुद जाकर सर क्यों नहीं काट लेते और शायरा खुद जाकर उसे 11 जूतें क्यों नहीं मारतीं? लेकिन खुद नहीं करेंगे, धर्म के नाम पर दूसरों को उकसाकर उन्माद भड़काकर दूसरों से अपराध कराने वाले ये लोग वसीम से ज्यादा खतरनाक हैं.


इसी तरह का प्याले में एक तूफान नब्बे के दशक में मेरे शहर में भी आया था. शहर के मशहूर वकील और लेखक दिवाकर राही ने स्थानीय अखबार में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने अपनी दलीलों से कुरआन के आसमानी होने का खंडन किया था. बस, फिर क्या? इस्लाम खतरे में पड़ गया, आज़म खान ने पूरे शहर को मजहबी उन्माद की आग में झोंक दिया. ऐसे कामों को नेता बखूबी अंजाम देते हैं. लेखक और संपादक दोनों की गिरफ्तारियां हुईं और आज़म खान मुसलमानों के एक मात्र नेता हो गए. आज़म और दिवाकर राही के बीच इस विषय को लेकर खतोकिताबत हुई, जो एक पुस्तिका में छपे. उस पर चर्चा करना मैं आज ठीक नहीं समझता. पर दिवाकर राही की एक बात जरूर कहूँगा, जो उन्होंने कहि थी कि खतरे में धर्म नहीं पड़ता, बल्कि उसके नेता और धर्मगुरु पड़ते हैं.


वसीम रिजवी ने किन 26 आयतों का जिक्र किया है, उस पर कोई चर्चा नहीं है. आम मुसलमान शायद उन आयतों को जानता भी नहीं. अधिकांश मुसलमानों को यह भी नहीं मालूम कि कुरआन में कितनी आयतें हैं और उनमें क्या लिखा है? उनको भड़काने वाले भी उन आयतों पर चर्चा नहीं करेंगे. वसीम रिजवी एक मोहरा भर हैं, सूत्रधार कोई और ही है. यह वसीम रिजवी के दिमाग का फितूर नहीं है, यह आरएसएस और हिंदू महासभा के दिमाग का फितूर है. अस्सी के दशक में हिंदू महासभा ने कुरआन की 24 आयतों को लेकर एक पत्रक निकाला था. यह चार पृष्ठों का पत्रक था, जिसका शीर्षक था : ‘देश में दंगे क्यों होते हैं?’ इस पत्रक में 24 आयतों के हवाले से कहा गया था कि ये आयतें मुसलमानों को दूसरे धर्मों के लोगों, खासकर हिंदुओं से झगड़ा करने का आदेश देती हैं, और जब तक इन आयतों को कुरआन से हटाया नहीं जायेगा, तब तक देश में दंगों को नहीं रोका जा सकता. वसीम रिजवी द्वारा 26 आयतों को हटाने की खबर पढ़कर मुझे यह पत्रक याद आया. फिर मुझे यह भी याद आया कि इसके जवाब में मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी, दिल्ली की ओर से एक जवाब भी शाया किया गया था. ये दोनों चीजें मेरे संग्रह में होनी चाहिए. आज सुबह से ही मैं इनकी खोज में लग गया. पत्रक हाथ नहीं आया, पर इस्लामी किताबों के ढेर में जवाब में लिखी पुस्तिका मिल गयी. सीमेंट की अलमारी में वह सीलन से खराब हो गयी. बड़ी मुश्किल से स्टील के पतले स्केल से उसके एक-एक पन्ने को अलग किया, जो चिपके हुए थे. यह सब करने में कवर आधा फट गया. यह 16 पृष्ठों की पुस्तिका है, नीले रंग का कवर है, जिस पर पुस्तिका का नाम है : ‘यह अन्याय क्यों?’ इस पुस्तिका के छपने की कोई सन-तारीख नहीं दी गई है, और न ही इस पर किसी लेखक का नाम है. उन दिनों मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी, दिल्ली में हिंदी में दो मौलना सक्रिय थे : मुहम्मद फारुख खां और कौसर यजदानी. संभव है इन्हीं में से कोई एक इसका लेखक हो. लेकिन संयोग से इस पुस्तिका में मुझे एक छपा हुआ पर्चा भी मिला, जिस पर ‘सहरी और अफ्तार के वक्त का नकशा रमजानुल मुबारक, अप्रैल-मई 1988 जिला ललितपुर’ लिखा है. इससे याद आया कि यह पुस्तिका मुझे ललितपुर प्रवास में ही मिली थी, जब मैं जमाते इस्लामी के कुछ लोगों के संपर्क में आया था, जिसके सदस्य मशहूर शायर ज़हीर ललितपुरी मेरे अच्छे दोस्त हो गए थे. अत: संभव है कि यह पुस्तिका 1988 में ही या इससे पहले के वर्ष में छपी हो.


इस पुस्तिका में वे सारी 24 आयतें हैं, जिन पर हिंदू महासभा को आपत्ति थी. वसीम रिजवी ने इनमें 2 आयतों का इजाफा करके इनकी संख्या 26 कर दी है. सब जानते हैं कि वसीम रिजवी आरएसएस के बल पर और आरएसएस के एजेंडे पर ही काम कर रहे हैं. उनका एजेंडा है, मुसलमानों को उत्तेजित करके उन्माद भडकाना, सद्भाव बिगाडना, और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक आधार को तोडना. रिजवी ने अपना काम कर दिया है, मुसलमान उत्तेजित हो गए हैं.
आयतें 24 हों या 26 इससे फर्क नहीं पड़ता. कुरआन में संशोधन करने का अधिकार भी किसी को नहीं है, और सिर्फ कुरआन में ही नहीं, बाइबल में भी नहीं, आदिग्रंथ में भी नहीं, किसी अन्य धर्मग्रंथ में भी नहीं. यह सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से भी बाहर है. इसलिए वसीम रिजवी की रिट को खारिज ही हो जाना है. मर्कज़ी मक्तबा इस्लामी ने जो जवाब दिया है, वह माकूल है, पर नाकाफी है. बेहतर होता, इन आयतों पर और भी बेहतर चर्चा होती. मेरा मुसलमानों से आग्रह है कि कौवा कान ले गया, सुनकर कौवे के पीछे अंधे होकर मत भागो, पहले अपने कान देखो, जब वह अपनी जगह पर है, तो फिर क्यों भाग रहे हो?

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