एंटालिया में बम – बचकाने नाटक से ज्यादा नहीं है..

एंटालिया में बम – बचकाने नाटक से ज्यादा नहीं है..

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हो तो रही थी अंबानी सेवा – कर कौन रहा होगा?

-संजय कुमार सिंह॥

मुंबई में अंबानी के घर के बाहर एक कार में विस्फोटक मिलने का मामला उलझता जा रहा है और यह कई पुराने मामलों की तरह है। अगर यह भी पहले के मामलों की तरह अनसुलझा रह जाए तो कई बड़ी बात नहीं होगी। मेरी दिलचस्पी का कारण यह है कि अंबानी की सेवा का यह काम महाराष्ट्र की शिवसेना सरकार कर रही थी या उसकी धुर विरोधी भाजपा सरकार। पहली नजर में लगता है कि शुरुआत महाराष्ट्र सरकार ने की होगी केंद्र सरकार ने मौका देखकर जांच का काम एनआईए को दे दिया। और पता चला कि अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार करने वाले अधिकारी से यह काम करवाया गया था या इसमें उनकी भूमिका है। अगर ऐसा है तो क्या केंद्र सरकार एक पुलिस अफसर (और उसके बहाने महाराष्ट्र सरकार) से हिसाब बराबर करने के लिए अंबानी को भी नहीं बखशेगी? जवाब आगे जो होगा उसमें मिलेगा या संभव है नहीं भी मिले।


अखबारों की खबरों और परिस्थितजन्य साक्ष्यों से लग रहा है कि पूरा मामला सुरक्षा बढ़ाने के लिए बहाना तलाशने का हो सकता है। इसे इन दो तथ्यों (नहीं, खबरों) के साथ जोड़कर देखिए कि आस-पास के लोगों ने एंटालिया से हेलीकॉप्टर उड़ाने पर एतराज किया था और अब नीता अंबानी शायद बनारस क्लास लेने आया करेंगी। अभी तक इस मामले में जो बात समझ में नहीं आई है वह यह कि महाराष्ट्र सरकार क्या इतनी आसानी से फंस जाएगी? इसमें कोई दो राय नहीं है कि केंद्र सरकार के साथ उसका युद्ध चल रहा है और उसे बचाव की मुद्रा में होना चाहिए। ऐसे में क्या वह किसी पुलिस अधिकारी से विस्फोटक रखवाने की गलती करेगी। अगर नहीं करेगी तो क्या कोई पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर ऐसा काम कर सकता है। राजनीति का कोई ठिकाना नहीं है – इसलिए सवाल यह भी उठता है कि दोनों सरकारों में मुकाबला दिखावा है? कुछ भी हो सकता है।

अभी तक की खबरों से पुलिस अधिकारी फंस गए लगते हैं। आज के अखबारों में उनकी टीम की गाड़ी जब्त किए जाने की खबर है। आरोप है कि यह बम वाली गाड़ी खड़ी करने के समय पुलिस की गाड़ी साथ गई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज दोनों गाड़ियों की फोटो छापी है। इस तरह, एनआईए हवा में तीर नहीं चला रहा है और जो कहा है उसके सबूत भी हैं। ऐसे में राज तो सचिन वाजे ही खोल सकते हैं और वे मौत की आशंका जता चुके हैं। पुलिस वालों से ऐसे काम कराए जाते हैं यह भी कोई छिपा हुआ नहीं है। मीडिया में पोल खोल की खबरें छपती थीं तो यह सब पता चल जाता था अब ऐसा नहीं होता है। हालांकि, मीडिया को इसमें कुछ करना नहीं होता था। जानकार लोग अपने परिचय के साथ या बिना परिचय दिए पूरे सबूत भेजते रहे हैं। इस बारे में अरुण शौरी ने लिखा था कि लोग रिसेप्शन पर फाइल छोड़ जाते थे और फिर फोन करते बताते थे। तब कॉलर आईडी नहीं होती थी और फोन ट्रेस करना आसान नहीं था। सबूत पूरा होता था।
अब भी खबर छपवाने वाले परेशान रहते हैं। सोशल मीडिया पर लिखते हैं, सुपात्र तलाशते हैं लेकिन उनपर ब्लैकमेल करने का आरोप लगा दिया जाता है। बहुत ही मुश्किल समय चल रहा है। दूर भ्रष्टाचार को करना था पर उसकी जांच की संभावनाएं ही जड़ मूल से खत्म होती जा रही हैं। आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार पुलिस अफसर को जमानत मिल जाती है रिपोर्टिंग के लिए गिरफ्तार पत्रकार को जमानत नहीं मिलती। जो पुलिस अफसर फंसाए गए और जिन्हें ईनाम मिला उसकी सूची से बहुत कुछ साफ है पर जनहित याचिका यह दायर की जा रही है कि 1991 के पूजास्थल कानून पर विचार किया जाए। और सुप्रीम कोर्ट ने इसपर नोटिस भी जारी कर दिया है। पर जो मामले अदालत में लंबित हैं उसकी कोई परवाह नहीं है।
एंटालिया में बम रखे जाने के इस मामले में एक मौत हो चुकी है। पुलिस अधिकारी अपनी मौत की आशंका जता चुके हैं। पर आरोप तो यह भी है कि एक खबर यह भी है कि शिवसेना के सांसद संजय राउत ने जानना चाहा है कि सुरक्षा का खतरा जानबूझकर पैदा किया गया था। उन्होंने एनआईए द्वारा जांच किए जाने की निन्दा की है और गिरफ्तार पुलिस अधिकारी की तारीफ की है। ऐसे में अलग-अलग अखबार अलग पहलुओं को प्रमुखता देते रहते हैं। जहां तक एंटालिया वाली खबर की बात है, रिटायर आईपीएस, केरल के पूर्व पुलिस प्रमुख और बीएसएफ / सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी रहे डॉ. एनसी अस्थाना ने ट्वीट किया है, 180 ग्राम प्रत्येक के 20 टुकड़े यानी कुल 3.6 किलो जिलेटिन से एसयूवी भी ठीक से क्षतिग्रस्त नहीं होगा ना कोई सुरक्षा गार्ड जख्मी होगा। इसलिए यह ड्रामा था और वह भी बहुत ही बचकाना। मकसद अभी तक नामालूम है। उन्होंने लिखा है 27 मंजिल की इमारत के लिए कोई 1500 किलो के अच्छे विस्फोटक की जरूरत होगी और इसे 4000 से ज्यादा सुराख बनाकर उनमें भरना होगा। 3.6 किलो से जो बिल्डिंग में खरोंच भर आएगी।
ऐसे नाटक पर एनआईए जांच और उस पुलिस अफसर का शिकार हो जाना जो पहले भी एक मामले में फंस चुका है और वह मामला अभी नहीं निपटा है। इसके बावजूद इतवार को हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक था, “वाजे गिरफ्तार, विस्फोटक प्लांट करना ‘स्वीकार’ किया”। और यह एक सम्मानित पुलिस अफसर का मीडिया ट्रायल है। अगर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ गवाही देने वाले पुलिस अफसर को जेल होगी, जमानत नहीं मिलेगी, अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार करने वालों को जेल होगी और क्लीन चिट देने वालों को तरक्की मिलेगी तो पुलिस भी कैसे काम कर पाएगी और कानून का राज कैसे स्थापित होगा।

फोटो क्रेडिट: ANI and Midday

About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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