Home राजनीति ममता बनर्जी पर हमले के मायने..

ममता बनर्जी पर हमले के मायने..

मौजूदा दौर की राजनीति में चुनाव को अक्सर जंग का नाम दे दिया जाता है। चुनाव जीतने के लिए तैयारियां नहीं की जातीं, रणनीतियां बनाई जाती हैं। सत्ता हासिल करने के लिए मैदान में उतरे उम्मीदवार भले ही हाथ में तलवार लेकर आमने-सामने नहीं होते हैं, क्योंकि लोकतंत्र बाहुबल से नहीं, बल्कि जनमत से चुनाव जीतने की इजाजत देता है। लेकिन इस वक्त जिस तरह का माहौल है उसमें यही लगता है कि तलवारें भले खुले आम न लहराई जा रही हों, बाहुबल, छल-कपट, षड्यंत्रों का इस्तेमाल तो धड़ल्ले से हो रहा है। इस सबमें जनमत किस कोने में धकेल दिया जाता है, पता ही नहीं चलता। कम से कम प.बंगाल की राजनीति को देखकर तो ऐसा ही लगता है, मानो जंग का कोई बड़ा मैदान तैयार हो गया है, जहां रोज छोटी-मोटी लड़ाईयां हो रही हैं।

प.बंगाल में जब आठ चरणों में मतदान का ऐलान चुनाव आयोग ने किया था, तो कई तरह के सवाल उठे थे। भाजपा का सहयोग करने का आरोप तक आयोग पर लगा था। उस वक्त आयोग का जवाब था कि कानून व्यवस्था को देखते हुए ऐसा किया गया है। अब उसी बंगाल में कानून व्यवस्था का आलम ये है कि राज्य की मुख्यमंत्री एक रैली के दौरान घायल हो जाती हैं। उनके पैर, कंधों में चोट आ जाती है। और एक बार फिर सत्तापक्ष और विपक्षियों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरु हो जाता है। इस बीच ये सवाल हाशिए पर चला जाता है कि जब बड़े राजनेता खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहे हैं तो आम आदमी की बिसात ही क्या है।

प.बंगाल में भाजपा धर्मकेन्द्रित राजनीति करने में काफी हद तक सफल हो गई थी। नंदीग्राम के मंच से प.बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी मुखिया ममता बनर्जी ने देवी पूजा के श्लोक पढ़े तो यह साफ दिखने लगा था कि अपनी हिंदुत्व की राजनीति में भाजपा ने वामदलों को छोड़कर बाकी सभी दलों को लपेटने में सफलता कर ही ली है। जो नेता अब तक धार्मिक आस्था का खुलकर प्रदर्शन करने की जगह जनता से जुड़े मुद्दों की राजनीति करते थे, वे भी हिंदुत्व कार्ड के आगे अपने बचाव में धार्मिक आस्थाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करने लगे हैं। लेकिन प.बंगाल में धर्म की राजनीति का कथानक विस्तार पाता, इससे पहले एक हादसे ने हालात को नया मोड़ दे दिया है। बुधवार को राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नंदीग्राम में रैली के दौरान घायल हो गईं। दर्द से कराहते हुए उन्होंने बताया कि चार-पांच लोगों ने उनके साथ बदसलूकी की और उन्हें चोट लगी, जबकि इस दौरान पुलिस की सुरक्षा उनके पास नहीं थी।

ममता इसे साजिश बता रही हैं, तो वहीं विपक्षी दल, खासकर भाजपा इसमें पहले ही बचाव की मुद्रा में दिखी। घटना के कुछ घंटों बाद ही सरकार समर्थित कुछ चैनलों पर घटना के तथाकथित चश्मदीद गवाहों से बातचीत की गई, जिन्होंने बताया कि उनकी कार का खुला दरवाजा एक खंभे से टकरा गया और ममता बनर्जी को इसमें चोट लग गई। इन गवाहों में से कुछ ने तो बाकायदा फैसला ही सुना दिया कि ये हादसा था, कोई साजिश नहीं। मजे की बात ये कि टीवी एंकर से बात करते-करते ये गवाह जयश्रीराम का नारा भी बुलंद कर बैठे। अतिउत्साह में कभी-कभी ऐसी गलतियां हो जाती हैं।

टीएमसी इसके पीछे विरोधियों को जिम्मेदार ठहरा रही है। टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने तो आरोप ही लगा दिया कि 9 मार्च को राज्य के डीजीपी को चुनाव आयोग ने हटाया और 10 को दीदी के साथ ये हादसा हो गया। उन्होंने जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग करते हुए सवाल उठाया कि जेड प्लस सुरक्षा में होने के बावजूद एक मुख्यमंत्री और चुनाव प्रत्याशी पर हमला कैसे हुआ। वैसे इस सवाल का जवाब देश भी जानना चाह रहा है। क्योंकि मुख्यमंत्री किसी भी दल का हो, उसकी सुरक्षा में जरा सी भी चूक गंभीर घटनाओं का संकेत देती है। वैसे यह देखना दुखद है कि ममता बनर्जी अस्पताल के बिस्तर पर रुग्णावस्था में हैं, उनके पैर पर प्लास्टर चढ़ा हुआ है और कम से कम इन पंक्तियों के लिखे जाने तक देश के प्रधानमंत्री ने संवेदना के दो शब्द उनके लिए नहीं कहे हैं।

अजीब संयोग है कि प्रधानमंत्री ने चुनावी हार-जीत के संदर्भ में चुटकी लेते हुए ब्रिगेड मैदान की रैली में ममता बनर्जी के स्कूटी चलाने पर तंज कसते हुए कहा था कि दीदी की स्कूटी नंदीग्राम में गिरना तय है, हम इसमें क्या कर सकते हैं। संकेत के तौर पर कही गई ये बात अलग तरह से सच हो गई। वैसे दीदी की स्कूटी इस हादसे के बाद रफ्तार पकड़ सकती है, ऐसा अनुमान राजनैतिक प्रेक्षक लगा रहे हैं।

ममता बनर्जी ने अस्पताल से संदेश जारी कर शांति बनाए रखने कहा है, साथ ही व्हीलचेयर से प्रचार की बात कही है। जाहिर है, सहानुभूति का कांटा उनके पक्ष में झुकेगा। नंदीग्राम ने एक बार फिर प.बंगाल की राजनीति का भविष्य तय करने का बीड़ा उठा लिया है।

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