राजा तिरीचन्द और टेढ़ापुर की अर्थव्यवस्था..

राजा तिरीचन्द और टेढ़ापुर की अर्थव्यवस्था..

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-सुधीन्द्र मोहन शर्मा॥

तो एक थे राजा तिरीचंद, और एक उनका राज्य था टेढ़ापुर
कुछ दिनों से टेढ़ापुर राज्य की अर्थव्यवस्था बिगड़ती ही जा रही थी.
तो एक बार तिरीचंद जी ने टेढ़ापुर के विद्वान अर्थशास्त्रियों की बैठक बुलाई.

ना, ये जानने के लिए नही कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर कैसे लाया जाए , उसमें तो तिरीचंद को कोई राय दे ही नही सकता था. तिरीचंद तो अपने आपको विभिन्न विधाओं में निष्णात मानता था. वो ऐसा राजा था जिसे अपने विद्वान होने के बारे मे सारे भ्रम थे लेकिन प्रजा के मन मे उसके मूर्ख होने के बारे में कोई भ्रम नही था.

तो अर्थशास्त्री इसलिए नही बुलाए गए थे कि वे राजा को कोई ज्ञान की बात, कोई उपाय बताएं , और ये बात वो अच्छी तरह जानते थे कि तिरीचंद के सामने मुंह खोलने के सिर्फ दो ही कारण हो सकते है और वह हैं कि या तो उसकी हां में हां मिलाओ या उसकी तारीफ में कुछ कहो.
ज्ञान की बात कही कि जान गई समझो.

तो अर्थव्यवस्था के लिए बुलाई गई इस बैठक का प्रयोजन क्या हो सकता है, इसे ले कर वे आपस मे खुसुर पुसुर कर ही रहे थे कि “तिरीचंद पधार रहे हैं” की उद्घोषणा हुई. सब ने साष्टांग दंडवत कर तिरीचंद का अभिवादन किया और राजा के आसन ग्रहण करने के पश्चात उठ कर खड़े हो गए.

राजा ने गदगद होते हुए सभी अर्थशास्त्रियों को बैठने का इशारा किया. थोड़ी देर मौन रहने के बाद प्रमुख अर्थशास्त्री से अचानक पूछा , क्या लाभ होता है इन बैठकों से ?
प्रमुख अर्थशास्त्री असल मे अर्थशास्त्री होने के पूर्व एक विद्यालय में व्यायाम शिक्षक थे. प्रमुख अर्थशास्त्री इसलिए बना दिये गए थे क्योंकि तिरीचंद को किसीने कहा था कि राज्य की अर्थव्यवस्था का स्वास्थ्य सुधारना है, और इसीलिए तिरीचंद ने दूर की कौड़ी ला कर और अपनी विलक्षण समझ का उपयोग कर व्यायाम शिक्षक को प्रमुख अर्थशास्त्री बना दिया कि वे व्यायाम करवा कर देश की अर्थव्यवस्था की सेहत सुधार देंगे.

अब ये बात अलग थी कि व्यायाम गुरु जी का सबसे प्रिय व्यायाम शीर्षासन था तो उन्होंने सबसे पहले अर्थव्यवस्था को शीर्षासन करवा दिया .अस्तु .

खैर तो व्यायाम शिक्षक उर्फ प्रमुख अर्थशास्त्री ने अपना गला साफ करते हुए राजा के प्रश्न की गुगली को भांपा और फिर पूरी निगाह गेंद अर्थात प्रश्न पर रखते हुए एकदम सुरक्षात्मक ढंग से जवाब दिया महाराज फायदे तो कई हैं , अगर हम लोग कायदे में रहें . राजा ने इस उत्तर से अत्यंत प्रसन्न हो कर मुस्कुराते हुए कहा अरे वाह प्रमुख अर्थशास्त्री जी आप तो शायरी करने लगे.

राजा के लिए हर तुकबंदी शायरी होती थी.
पर कोई विशेष फायदा हो तो बताएं, राजा ने फिर से एक टॉप स्पिन बॉल जैसा प्रश्न फेंका.

प्रमुख अर्थशास्त्री की इच्छा तो हुई कि इस प्रश्न रूपी बॉल को टप्पा खाने के पहले ही आगे बढ़ कर छक्का लगा दे , पर फिर उसे अपने बीबी बच्चों की सूरत याद आ गयी, और उसने फिर से सुरक्षात्मक ढंग से पीछे हट कर जवाब रूपी स्ट्रोक मारा – हुजूर आपके आने पर जो साष्टांग दंडवत हम करते हैं इससे हमारे सर्वांग स्वस्थ्य रहते हैं और मस्तिष्क में रक्त संचार सुचारू रूप से होने के कारण मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहता है जिससे अर्थव्यवस्था पर बेहतर चिंतन किया जा सकता है.

राजा ने अपने मंत्रियों को देखा और गर्व से कहा – देखा हमारी पसंद के अर्थशास्त्री को , कितने बड़े विद्वान को हम यहां लाये हैं. मंत्रियों ने भी तुरंत पुनः साष्टांग दंडवत करते हुए अपने मानसिक स्वास्थ्य हेतु प्रार्थना की और खड़े हो कर तिरीचंद की जय के नारे लगाए.
खैर, राजा मूल विषय पर आते हुए बोला , क्या आप सबको पता है कि ये बैठक क्यों बुलाई गई है ?
एक युवा प्रशिक्षु अधिकारी बेचारा बोल पड़ा महाराज अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए. तिरीचंद का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया, मूर्ख अधिकारी क्या कहना चाहते हो हमारे राज्य की अर्थव्यवस्था खराब है !!!
सभा मे सुईपटक (pindrop) सन्नाटा छा गया. राजा ने सिपाहियों से उस अधिकारी को गिरफ्तार करने के आदेश दिए और फिर कहा , आप सब जान लीजिए कि हमारे राज्य की अर्थव्यवस्था खराब नही है और इसे और अच्छी बनाना है, खैर कैसे और अच्छी बनाना है वह कौन बताएगा ?
मंत्रियों और अर्थशास्त्रियों ने एक स्वर में कहा, महाराज वह तो आप ही मार्ग दिखाएंगे प्रभु.
राजा फिर प्रसन्न हुआ और कहा तथास्तु, आप लोग कहेंगे तो मैं इसका भी उपाय खोज ही लूंगा.
अब आज की बैठक का प्रयोजन किसी बड़े रहस्योद्घाटन की तरह बताते हुए राजा ने कहा “आज की बैठक इसलिए है कि हमारी अर्थव्यवस्था आज बहुत अच्छी नही है तो इसका ठीकरा किसके सर , मेरा मतलब है इसके लिए किसीकी जिम्मेदारी तय की जाना है. अर्थशास्त्रियों और मंत्रियों ने एक दूसरे को देखा और आंखों ही आंखों में एक दूसरे को समझाया कि अपने मे से किसी को जिम्मेदार बताने से बचाना है. सभी टुकुर टुकुर राजा को देखने लगे , राजा ने सब पर अपनी निगाह डालते हुए फ़ॉर से पूछा – तो इसकी जिम्मेदारी किस पर डाली जाए ?
सबकी जान सांसत में आ गई , किसका नाम लें , जिसका भी नाम लेंगे राजा उसे सूली पर टांगने का आदेश दे देगा.
सबकी निगाह फिर से प्रमुख अर्थशास्त्री उर्फ व्यायाम शिक्षक पर टिक गईं.
व्यायाम शिक्षक इस बल्लेबाज की तरह असहज जो उठे जो दर्शक दीर्घा से उठ रहे सिक्स वांटेड के शोर से बेचैन हो उठता है. उन्हें भी कुछ सूझ नही रहा था.

तभी उन्हें अपनी पत्नी की याद आ गई जिसने कहा था शहर से आते समय अपने खेत के पेड़ से अचार के लिए कैरी लेते आना. आते समय देखा था उस पेड़ पर इस बार कैरी ही नही आईं थीं. व्यायाम शिक्षक की पत्नी भी भारोत्तोलन में चैंपियन थीं और कई बार व्यायाम शिक्षक को उठा कर ही अपनी ट्रेनिंग परखती रहतीं थीं . उसे याद कर उनके चेहरे पर उलझनों और डर के मिले जुले बादल मंडरा रहे थे कि घर जा कर पत्नी को क्या जवाब दूंगा और यहां ये तिरीचंद पता नही क्या पूछ रहा है.

प्रमुख अर्थशास्त्रीके चेहरे पर गंभीर चिंता के भाव देख कर तिरीचंदअत्यधिक प्रभावित हो गया और थोड़ा ऊंची आवाज में पूछा – “तो प्रमुख अर्थशास्त्री जी कौन है जिम्मेदार” ?
अर्थशास्त्री अपनी पत्नी की फरमाइश की चिंता में उलझा था और उसे आम के पेड़ पर गुस्सा आ रहा था कि इस बार कैरियाँ क्यों नही दे पाया वह आम का पेड़

उसके मुंह से निकल गया महाराज हमारे खेत का आम का पेड़ जिम्मेदार है.

राजा अचंभित, मंत्री गण आश्चर्य में , कुछ अर्थशास्त्री मन ही मन मुस्कुरा रहे कि अब ये गया और हम बन सकते हैं प्रमुख अर्थशास्त्री, वहीं कुछ अर्थशास्त्री समझ रहे थे कि ये काइयां व्यायाम शिक्षक कुछ न कुछ तिकड़म भिड़ा रहा है.
राजा ने किंचित उत्सुकता से पूछा वो कैसे प्रमुख अर्थशास्त्री जी ? राजा को ऐसे out of box विचारों पर बहुत आनंद होता था.
अब बारी थी प्रमुख अर्थशास्त्री के हड़बड़ाने की. मन ही मन अपने आपको गालियां देने लगा ये क्या कह दिया मैंने.
पर कह दिया उसे जस्टिफाई करना उसे आता था.
तुरंत बोला महाराज गुठलियां …
राजा की उत्सुकता और बढ़ी , और उसने पूछा वो कैसे भाई ?
व्यायाम शिक्षक उर्फ प्रमुख अर्थशास्त्री ने कहा महाराज वो आपने सुना है ना आम के आम गुठलियों के दाम
राजा बोला हां तो ..

प्रमुख अर्थशास्त्री बोला हमारे पेड़ के आम में गुठलियां नही हो रहीं पिछले 7 साल से. इसलिए हमें और हमारे राज्य को आम तो मिल रहे हैं पर गुठलियों के दाम नही मिल रहे ….
और इसीलिए गुठलियों के दाम न मिलने से हमारी GDP नीचे जा रही है..

राजा सिंहासन से उठ कर खड़ा हुआ और बोला वाह प्रमुख अर्थशास्त्री जी, क्या जबरदस्त विश्लेषण किया है आपने , गजब

फिर सभा को सम्बोधित करते हुए बोला देखा आपने हमारा चयन, क्या गजब का अर्थशास्त्र सिद्धांत विश्लेषण किया है हमारे प्रमुख अर्थशास्त्री ने
सभी मंत्रियों और अर्थशास्त्रियों ने खड़े हो कर प्रमुख अर्थशास्त्री का अभिनंदन किया और नारा लगाया राजा तिरीचंद की … जय . क्योंकि चयन तो उन्हीं का था प्रमुख अर्थशास्त्री.
प्रमुख अर्थशास्त्री का उत्साह बढ़ गया और उसने कहा महाराज अर्थव्यवस्था को और अच्छी बनाने का भी उपाय है हमारे पास.
राजा को समझ आ गया था कि प्रजा को बेवकूफ बनाने के लिए एक और out of box आईडिया तैयार हो रहा है.
उसने पूछा बताइये.

व्यायाम शिक्षक उर्फ प्रमुख अर्थशास्त्री ने कहा महाराज उस पेड़ को दंड यही है कि प्रजा उस पेड़ को हर इतवार को जूतों की माला पहनाये.
राजा समझ गया कि जिम्मेदारी भी फिक्स हो गई और जनता को बिजी रखने के लिए एक और फितूर पैदा किया जा सकता है.
बस उसने आम के पेड़ जो अर्थव्यवस्था “और अच्छी न होने” के लिए जिम्मेदार घोषय किया और प्रजा से आग्रह किया कि वे उस पेड़ को जूतों की माला पहनाते रहें हर इतवार को .
प्रजा भी समझ गई, संतुष्ट हो गई और खुश हो कर बोली ..राजा तिरीचंद की ….
बाकी सब इतिहास है.

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