Home गौरतलब कानून को है बस अपने हमसफर लोगों की सेहत की फिक्र..

कानून को है बस अपने हमसफर लोगों की सेहत की फिक्र..

-सुनील कुमार॥
दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज कोलकाता से मुसाफिर विमान में दिल्ली आ रहे थे, और उन्हें मास्क ठीक से न लगाने वाले मुसाफिर दिखते ही रहे। अदालत में लौटने के बाद उन्होंने विमान कंपनियों और केंद्र सरकार को आदेश जारी किया है कि जो मुसाफिर मास्क ठीक से न लगाएं, उन्हें विमान से उतार दिया जाए, या चढऩे ही न दिया जाए। यह कार्रवाई एकदम मुनासिब है, लेकिन सवाल यह है कि गिने-चुने लोग हवाई सफर करते हैं, और 99 फीसदी से अधिक जनता ट्रेन, बस, या ऑटोरिक्शा में चलती है, और वहां तक दूसरे मुसाफिरों पर उसका कोई बस नहीं चलता। चारों तरफ भयानक दर्जे की लापरवाही दिख रही है, और जनता के हित में कोई ऐसी तरकीब निकलनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जजों को आम बसों में या ट्रेन-ऑटो में सफर करवाया जाए ताकि गरीब और आम जनता की हिफाजत के लिए भी कोई आदेश जारी हो सके।

पता नहीं क्यों सफाई और सुरक्षा जैसी बुनियादी बातों पर भी पैसेवाले हवाई मुसाफिरों का हक माना जाता है और आम लोग मानो इसका हक ही नहीं रखते। आज भारत के बहुत से राज्यों में कोरोना पॉजिटिव बढ़ते चल रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ बड़ी-बड़ी राजनीतिक और चुनावी आमसभाएं हो रही हैं, लोगों को बसों और ट्रकों में बिना किसी सावधानी ढोया जा रहा है, भारी धक्का-मुक्की चल रही है, लेकिन मानो गरीब और आम जनता को कोरोना से कोई खतरा ही नहीं है, उसे जैसे चाहें वैसे झोंका जा सकता है। दरअसल बिना किसी दर्ज मुकदमे के खुद होकर हुक्म देने का हक महज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को होता है जो कि हवाई सफर ही करते हैं, और सडक़ों पर भी चलते हैं तो सायरन वाली गाडिय़ों के काफिले में चलते हैं। इसलिए जिस तरह संसद और विधानसभाओं में लबालब लद गए करोड़पति जनप्रतिनिधि देश की गरीबी से अछूते हो चुके हंै, कमोबेश बड़ी अदालतों के जज भी उसी तरह आम जनता की तकलीफों से रूबरू नहीं रह गए हैं।

आज हिंदुस्तान में तमाम तबकों के बीच कोरोना से बचाव को लेकर परले दर्जे की लापरवाही चल रही है। लोग यह मान बैठे हैं कि टीका लगना शुरू होते ही मानो कोरोना चल बसा है। जबकि हकीकत यह है कि बचाव के टीकों की दोनों खुराक लग जाने के एक पखवाड़े बाद इनमें से करीब तीन चौथाई लोग कोरोना से बचाव की प्रतिरोधक क्षमता पा सकते हैं। देश की आबादी को कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पाने में एक पूरा बरस लग सकता है। जिस रफ्तार से टीका आया है उससे सौ गुना रफ्तार से लापरवाही आई है, और इसीलिए कई प्रदेशों में कोरोना के आंकड़े बढ़ते दिख रहे हैं। देश का चुनाव आयोग एक तरफ तो कड़े से कड़े नियम थोपने के लिए कुख्यात है, लेकिन कोरोना के बीच आम सभाओं को लेकर उसने अपनी आंखें बंद कर ली हैं, और यह मान लिया है कि नेताओं को सुनने पहुंचने वाले आम लोग मरने के ही लायक हैं। आम सभाओं की भीड़ देखें तो यह समझ नहीं पड़ता है कि एक-एक भाषण के बाद नेता कितने लाख लोगों को संक्रमण के खतरे में डालकर जाते हैं। अभी खासकर जिस बंगाल की बड़ी-बड़ी आमसभाओं के नजारे टीवी पर दिख रहे हैं, उन्हें देखकर किसी अदालत के जज ने, या चुनाव आयोग ने कुछ नहीं कहा है क्योंकि जज और आयोग के सदस्य कभी ऐसी भीड़ में नहीं जाते, हां वे हवाई सफर जरूर करते हैं जिसे लेकर वे बड़े फिक्रमंद हैं।

अब सवाल यह है कि गरीबों की फिक्र कौन करेंगे? देश के कानून को तो ऐसी फिक्र दिख नहीं रही है, और बड़े-बड़े जज बस अपने हमसफर संपन्न तबकों को महफूज रखना चाहते हैं ताकि अपने ऊपर कोई खतरा न आए।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.