उत्तराखंड में दोहराया इतिहास..

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उत्तराखंड में राजनीति ने करवट बदलते हुए एक बार फिर इतिहास दोहराया है। त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में चार साल पूरा होने के 9 दिन पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया। मंगलवार को उन्होंने राज्यपाल बेबी रानी मौर्या को अपना इस्तीफा सौंपा। इसके बाद हुई प्रेस कांफ्रेंस में जब उनसे पूछा गया कि उन्हें इस्तीफा क्यों देना पड़ा, तो उन्होंने कहा कि इसके लिए आपको दिल्ली जाना पड़ेगा। पार्टी हाईकमान से सवाल पूछना होगा। इस जवाब का एक मतलब ये भी है कि अगर श्री रावत खुद इस्तीफा नहीं देते, तो भाजपा उन्हें पद से हटा देती। कम से कम पिछले कुछ दिनों से संकेत यही मिल रहे थे। दरअसल उत्तराखंड भाजपा में कई विधायक और बड़े नेता त्रिवेन्द्र सिंह रावत से नाराज चल रहे थे।

विधायकों की शिकायत है कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते हैं। त्रिवेन्द्र सिंह रावत के खिलाफ शिकायत दिल्ली तक पहुंची, तब छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह और दुष्यंत कुमार गौतम को पर्यवेक्षक बनाकर देहरादून भेजा गया, जहां उन्होंने विधायकों से बात की, और अपनी रिपोर्ट भाजपा हाईकमान को सौंपी। बताया जा रहा है कि कई विधायकों ने इस बात के साफ संकेत दिए कि अगर त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अगुवाई में 2022 में होने वाला विधानसभा चुनाव होगा, तो भाजपा का जीतना कठिन है। इसलिए यह तय माना जा रहा था कि अगले साल के चुनावों को ध्यान में रखकर अभी सरकार में हेरफेर किया जा सकता है। और अब वैसा ही हुआ है।

दरअसल उत्तराखंड में भाजपा की राह पहाड़ों जैसी ही पथरीली रही है। यहां भी कांग्रेस में फूट डालकर, उसके बड़े नेताओं को अपने पाले में कर भाजपा ने जीत हासिल कर ली, लेकिन पार्टी के भीतर असंतुष्टों की संख्या में भी इजाफा कर लिया। वैसे भी यहां के 21 साल के राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा कर नहीं पाया है। त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी चार साल के भीतर ही पवेलियन वापस लौट रहे हैं। अब टीम की कमान किसे सौंपी जाए, इस पर बुधवार को भाजपा विधायक मंथन करेंगे। लेकिन इसमें भी भाजपा को कुमाऊं और गढ़वाल, ब्राह्मण और राजपूत, विशुद्ध भाजपाई और कांग्रेस से बने भाजपाई के समीकरण को ध्यान में रखकर फैसला लेना होगा। उत्तराखंड में पार्टी का मुखिया अगर एक क्षेत्र और जाति से हो, तो संतुलन साधने के लिए दूसरे क्षेत्र और जाति के नेता को तवज्जो देना होता है।

उत्तराखंड में फिलहाल भाजपा सरकार में नेतृत्व का चेहरा बदला है, सरकार पर कोई संकट नहीं आया है। लेकिन हरियाणा में बुधवार का दिन खट्टर सरकार का भविष्य तय करेगा। विपक्षी दल कांग्रेस यहां अविश्वास प्रस्ताव लाने वाला है। और संयुक्त किसान मोर्चा ने विधायकों से अपील की है कि वे सरकार के विरोध में मतदान करें। कृषि कानूनों के विरोध के मसले पर हरियाणा के विधायक अपनी सरकार का खुलकर साथ नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि ऐसा करने का मतलब है वे किसानों का विरोध कर रहे हैं। विधायकों के सामने ये धर्मसंकट है और कांग्रेस इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती। भाजपा ने अपने विधायकों के लिए व्हिप जारी कर दिया है, लेकिन जेजेपी के समर्थन से वह सरकार चला रही है और जेजेपी के 10 में से 6 विधायक किसान आंदोलन के समर्थन में हैं। यानी बहुमत का आंकड़ा हासिल करने के लिए भाजपा को मशक्कत करनी पड़ेगी।

राजस्थान में भी वसुंधरा राजे गुट भाजपा के लिए चुनौती बना हुआ है। उधर तमिलनाडु में डीएमडीके ने एनडीए से अलग होने का ऐलान कर दिया है। यानी कहीं न कहीं भाजपा नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं, उसके लिए चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। इसके बावजूद मुख्यधारा के मीडिया में कांग्रेस की अंदरूनी कलह की चर्चा जितने चटखारे लेकर होती है, भाजपा की कलह पर उतनी ही चुप्पी छाई रहती है। या उसे किसी न किसी तरह चुनावी रणनीति से जोड़ दिया जाता है। बहरहाल, दूसरे दलों में सेंध लगाने वाली भाजपा के अपने घर में भी कुछ कमजोर कड़ियां हैं, जो उसे नुकसान पहुंचा सकती हैं। शायद इसलिए त्रिवेन्द्र सिंह रावत जैसे नेताओं की समयपूर्व विदाई हो जाती है।

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