चीन के बहाने एक शुरुआत तो हुई..

चीन के बहाने एक शुरुआत तो हुई..

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-सुनील कुमार॥

चीन की एक खबर वहां से बाहर भी दुनिया की बाकी देशों में एक चल रही बहस को बढ़ाने का काम कर सकती है। वहां की एक तलाक-अदालत ने एक आदमी को अपनी पूर्व पत्नी को शादीशुदा जिंदगी के दौरान घरेलू कामकाज करने के एवज में रकम भुगतान करने कहा है। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि जब दोनों शादीशुदा थे, साथ रहते थे, तब घरेलू कामकाज महिला ही करती थी, इसलिए उसे उस अवैतनिक श्रम के एवज में भुगतान किया जाए। हालांकि अदालत ने यह रकम बहुत अधिक तय नहीं की है इसलिए सोशल मीडिया पर जमकर यह सवाल उठ रहा है कि मुआवजे का हिसाब किस पैमाने से किया गया है, और यह खासा अधिक होना चाहिए।

चीन के बाहर भी भारत और दूसरे तमाम देशों में महिलाओं के घरेलू कामकाज की उत्पादकता की कीमत का हिसाब लगाने की बात पिछले कुछ बरसों से चल रही है। जो महिला बाहर खुद कमाई का कोई काम नहीं करती है, और जो घर-बार देखने, बच्चों को जन्म देने, उन्हें बड़ा करने, बुजुर्गों की देखभाल करने जैसे बहुत से काम करती है, लेकिन जिसे कमाऊ नहीं गिना जाता। अब चीन की अदालत के इस फैसले की मिसाल दूसरे देशों में भी दी जा सकती है, या इसे एक नजीर की तरह पेश किया जा सकता है। दुनिया के मजदूर संगठन घरेलू महिला की मेहनत की उत्पादकता को रूपयों की शक्ल में भी गिनने लगे हैं, और लोगों को घर बैठे भी यह समझ पड़ सकता है कि घरेलू महिला का योगदान कितना है। यह बात घरों के भीतर एक दिलचस्प बहस भी बन सकती है। तमाम लोग पूरे परिवार सहित बैठकर यह हिसाब लगाएं कि एक गृहिणी के किए हुए कौन-कौन से काम लागत कितनी आई होती। गृहिणी के वैवाहिक जीवन के कई ऐसे काम हैं जिनके दाम गिनना अटपटा और आपत्तिजनक लगेगा, घरेलू महिला की उत्पादकता के हिसाब के इस हिस्से को हम पति-पत्नी के बीच बंद कमरे के लिए छोड़ देते हैं।

हिन्दुस्तान में बोलचाल में जब किसी महिला के बारे में पूछा जाता है कि वह क्या काम करती है, तो नौकरी, मजदूरी, या किसी और तरह की कमाई वाले काम को तो लोग गिनाते हैं, लेकिन अगर वह सिर्फ घर तक सीमित है, तो उसके बारे में कह दिया जाता है कि वह कोई काम नहीं करती, घर पर ही रहती है। यह बात आम हिन्दुस्तानी बोलचाल में इस अंदाज में बोली जाती है कि वह घर पर पैर पसारे आराम करती रहती है। जबकि आम घरेलू महिला को कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती है, पति की सारी रिश्तेदारियों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। अंग्रेजी में जरूर हाल के बरसों में किसी घरेलू महिला को होममेकर कहा जाने लगा है।

जब देश के सकल राष्ट्रीय उत्पादन को गिना जाता है, कामकाजी लोगों की औसत या अलग-अलग कमाई गिनी जाती है, तो उस वक्त घरेलू महिला की पूरी जिंदगी की उत्पादकता को भी नगदी की शक्ल में गिनना अगर शुरू होगा, तो परिवार में उसका सम्मान भी बढ़ेगा। महिला अधिकारों और मजदूर अधिकारों के लिए काम करने वाले बहुत से संगठन ऐसे कई अध्ययन कर चुके हैं कि घरेलू महिलाओं का उत्पादक योगदान किस तरह और कितना गिना जा सकता है। ऐसे एक अध्ययन का कहना है कि घरों में ऐसे 33 किस्म के काम होते हैं जो कि आमतौर पर महिलाएं ही करती हैं। इन कामों के लिए अगर न्यूनतम से भी कम मजदूरी गिनी जाए, तो भारत की जीडीपी के 61 फीसदी के बराबर का आंकड़ा पहुंचता है। ये तमाम गंभीर अर्थशास्त्रीय अध्ययन है, जो महिलाओं की अदृश्य मेहनत, अदृश्य जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर किए गए हैं।

लोगों को परिवार के बीच यह दिलचस्प हिसाब-किताब करना चाहिए कि घर को साफ करना, घर के आसपास सफाई रखना, रोज बिस्तर ठीक करना या बिछाना, बर्तन और कपड़े धोना, कपड़ों पर आयरन करना, उन्हें तह करके जमाना, सब्जी लाना, काटना, खाना पकाना, और खिलाना, जहां बिजली न हो वहां मिट्टी तेल के लैम्प साफ करना, और उन्हें जलाना, घर के लिए जलाऊ लकड़ी लेकर आना, गोबर से छेना-कंडा बनाना, पानी भरकर लाना, पालतू जानवरों का ख्याल रखना, परिवार के कारोबार में मदद करना, खाने-पीने के कुछ सामान बनाकर बेचना, गर्भधारण, बच्चों को जन्म, और उनका पालन-पोषण करना, बीमारों की देखभाल करना, जीवन-साथी की देखभाल करना, बच्चों को पढ़ाना, और होमवर्क करवाना, बच्चों को स्कूल लाना-ले जाना, मेहमानों का ख्याल रखना, रिश्तेदारी निभाना, घरेलू हिसाब-किताब रखना, भुगतान करना, रोजमर्रा की चीजों को खरीदना, बीमारों को डॉक्टर के पास ले जाना वगैरह। परिवारों को चाहिए कि इन कामों पर कितना खर्च आता उसका हिसाब करें, और घरेलू कमाई में उसे महिला का योगदान मानें, और इसके लिए उसका पर्याप्त सम्मान भी करें।

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