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राहुल की साफगोई..

राजनीति में रहते हुए शराफत, सादगी, सहजता और सच्चाई इन चार गुणों के साथ निबाह करना काफी कठिन होता है। बहुत से भले लोग राजनीति में आकर कुछ दिनों तक इन गुणों के साथ चलने की कोशिश करते हैं, लेकिन कम लोग इसमें सफल हो पाते हैं। आज राहुल गांधी को देखें तो लगता है कि वे इन कम लोगों में सबसे आगे खड़े हैं। भाजपा ब्रिगेड की ओर से उन्हें अपमानित करने की कोशिशें लगातार जारी हैं। उन्हें भला-बुरा कहने, उनके लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करने का कोई मौका भाजपा और उसके समर्थक नहीं छोड़ते हैं। बल्कि वे अक्सर उन मुद्दों पर भी उनका मजाक बनाते हैं, जहां गंभीर विचार-विमर्श की जरूरत है।

इसकी एक मिसाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही पेश की थी। याद कीजिए ‘स्मार्ट इंडिया हैकॉथन 2019’ के ग्रैंड फिनाले में जब मोदीजी देश की कई समस्याओं पर युवाओं के सुझाए तकनीकी समाधान के बारे में जानकारी ले रहे थे. तब एक छात्रा उनसे डिस्लेक्सिया नामक मानसिक रोग से जूझ रहे बच्चों में शुरुआती स्टेज पर इसकी पहचान के लिए अपनी टीम का आइडिया शेयर कर रही थी, उसकी बात पूरी होने से पहले ही मोदीजी ने तंज भरा सवाल किया कि क्या 40-45 साल के बच्चे को भी ये योजना काम आएगी? उनके इस घटिया मजाक पर ठहाके लगे और इस बीच उन्होंने आगे कहा कि तब ऐसे बच्चों की मां बहुत खुश हो जाएगी। एक गंभीर मानसिक बीमारी को लेकर अपने राजनैतिक विरोधी पर तंज कस के मोदीजी ने बता दिया कि अब राजनीति का स्तर कहां तक गिर चुका है और अब इसमें शराफत के लिए कितनी जगह बची है।

उनसे प्रेरित होकर राहुल गांधी पर निजी हमले अब तक जारी हैं। लेकिन राहुल गांधी उनका जवाब न देकर सार्थक मूल्यों की राजनीति कर रहे हैं। ये बात लॉकडाउन जैसे कठिन समय में भी सामने आई। जब उन्होंने लगातार विशेषज्ञों से इस समस्या के दौरान पेश आई परिस्थितियों पर चर्चा की और सरकार को सही सुझाव दिए। कांग्रेस और गांधी परिवार के विरोधियों को ये बात भी खटक रही थी। बल्कि जून में गृहमंत्री अमित शाह ने आपातकाल को लेकर टिप्पणी की थी कि एक परिवार की सत्ता की भूख ने पूरे देश को कारागार में तब्दील कर दिया था। और इस तरह उन्होंने अपनी सरकार की उन तमाम नीतियों और फैसलों को ढंकने की कोशिश की, जिनके कारण देश में अघोषित आपातकाल सा महसूस होने लगा है। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी का विरोध कर चुके नेता और पत्रकार भी अब ये मानने लगे हैं कि उस वक्त सब कुछ खुलेआम था, अब बिना कुछ कहे ज्यादा दमनकारी स्थितियां हैं। लेकिन खास बात ये है कि अब राहुल गांधी ने भी खुलेआम स्वीकार किया है कि आपातकाल एक गलती थी।


कॉर्नल विश्वविद्यालय के एक वर्चुअल सम्मेलन में राहुल गांधी ने मशहूर अर्थशास्त्री कौशिक से बातचीत में कहा कि आपातकाल भूल थी, मेरी दादी ने भी यह कहा था। पर कांग्रेस ने कभी भी भारत के संस्थागत ढांचा पर कब्जा करने की कोई कोशिश नहीं की थी। सच में कहा जाए तो वह ऐसा कर भी नहीं सकती थीं। कांग्रेस की नीतियां उसे इसकी इजाजत नहीं देती थीं। राहुल गांधी ने बड़े बेबाकी से आज के भारतीय राजनीति के परिदृश्य पर कहा कि 1975-77 के दौरान जो कुछ हुआ था, और आज जो कुछ हो रहा है, वे बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी ने अपने लोगों को तमाम संस्थाओं में भर दिए हैं। राहुल गांधी ने संस्थाओं को योजनाबद्ध तरीके से ध्वस्त करने का आरोप बीजेपी पर लगाते हुए कहा कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था इसलिए काम करती हैं कि संस्थाएं स्वतंत्र हैं और उनके बीच संतुलन बना हुआ है। आरएसएस उनकी स्वतंत्रता पर हमला कर रहा है, यह बहुत ही सुनियोजित तरीके से हो रहा है। मैं यह नहीं कहूंगा कि लोकतंत्र का क्षरण हो रहा है, बल्कि उसका गला घोंटा जा रहा है।


इसी तरह कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र और बागी सुरों पर राहुल ने साफगोई से कहा कि मैं पहला व्यक्ति हूं जिसने पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक चुनाव की बात कही। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि इस तरह के सवाल दूसरी पार्टियों में नहीं उठते हैं। राहुल गांधी ने देश में लोकतंत्र के खत्म होने के कारणों से लेकर हर मुद्दे पर साफगोई से अपने विचार रखे। कौशिक बसु से बातचीत में राहुल गांधी ने एक मंजे राजनेता की जगह सज्जन की तरह चर्चा की। अब हो सकता है उनकी कही बातों को कई तरह से अलग संदर्भों के साथ पेश किया जाए। आपातकाल को भूल कहने वाले बयान को चुनावों में भुनाया जाए। मुमकिन है इससे उनके विरोधियों को चुनावी बढ़त भी मिलेगी। लेकिन देश को ये सोचना चाहिए कि राजनीति में शालीनता और सच्चाई के गुण को हरा कर देश को क्या हासिल हो रहा है। देश के भविष्य को क्या हासिल होगा। कहीं हम खुद को ठगने के लिए मंच तो नहीं तैयार कर रहे।

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