डिजिटल मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश..

डिजिटल मीडिया पर लगाम लगाने की कोशिश..

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फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप से लेकर नेटफ्लिक्स, एमेजॉन आदि पर जिस तरह कई बार भ्रामक खबरों और भाषायी उच्छृंखलता से दो-चार होना पड़ता है, वह किसी भी संवेदनशील समाज के लिए चिंताजनक है। सोशल मीडिया पर बेशक सूचनाओं और विचारों का त्वरित आदान-प्रदान हो जाता है, लेकिन इसमें खबरों की सत्यता की पुष्टि अक्सर नहीं होती है। साथ ही शालीनता का कोई बंधन नहीं होता। इसी तरह इन प्लेटफामर््स के लिए बनी फिल्मों या वेबसीरीज में भाषा की गरिमा खुलेआम ताक पर रखी जाती है। अनावश्यक तौर पर अश्लील दृश्य और अपशब्द डाले जाते हैं, जिनसे पूरी पीढ़ी की भाषा भ्रष्ट हो रही है। इसलिए एक लंबे समय से यह जरूरत महसूस की जा रही थी कि गलत खबरों या अश्लीलता पर रोक लगाने की कोई पहल होनी चाहिए। इस आवश्यकता को आधार बनाकर हाल ही में सरकार ने डिजिटल प्लेटफामर््स के लिए कुछ दिशानिर्देश बनाए हैं।

इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस) नियम 2021 के नाम से लाए गए ये दिशानिर्देश देश के टेक्नोलॉजी नियामक क्षेत्र में करीब एक दशक में हुआ सबसे बड़ा बदलाव है। ये इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस) नियम 2011 के कुछ हिस्सों की जगह भी लेंगे। सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के मुताबिक नए नियमों के लागू होने के तीस दिन के भीतर इसमें दी गई शर्तें पूरी करनी होंगी। नए दिशानिर्देशों में ओटीटी प्लेटफॉर्म को कहा गया है कि उम्र के हिसाब से पांच अलग-अलग श्रेणियां बनाई जाएं और कार्यक्रम के पहले साफ बताया जाए कि यह किस श्रेणी का प्रोग्राम है।

बच्चों तक गलत सामग्री की पहुंच रोकने के लिए उन्हें अपने ऐप में ही पैरेंटल लॉक का इंतजाम भी करना होगा। जबकि खबरों वाले प्लेटफॉर्म से तो कहा जा रहा है कि उन्हें बताना होगा कि वो कब, क्या, कहां और कैसे प्रकाशित कर रहे हैं। उन्हें सरकार को अपने सदस्यों या सब्स्क्राइबरों की गिनती भी बतानी होगी। बस यहीं पर सारा खेल समझ आ रहा है कि यह असल में उन छोटे-बड़े आनलाइन चैनलों पर अंकुश लगाने की तैयारी है, जो अब तक बिना किसी दबाव में आकर बेलाग टीका-टिप्पणी कर रहे हैं, जिन्हें सरकार से विज्ञापन या अन्य उपकारों की जरूरत नहीं है और इसलिए वे पूरी तरह निष्पक्षता के साथ तथ्यों को सामने रखने का साहस दिखा रहे हैं।

हालांकि सरकार का दावा अब भी यही है कि वह मीडिया की आजादी पर कोई रोक नहीं लगा रही, लेकिन जिस तरह ये दिशा-निर्देश लाए गए हैं, उनसे सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। इसलिए डिजिटल पब्लिकेशन के एसोसिएशन डिजिपब ने एक पत्र लिखकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया है। दरअसल आज बड़े मीडिया घराने एक साथ प्रिंट, टीवी, रेडियो, डिजिटल आदि माध्यमों का संचालन कर रहे हैं, वहीं बहुत से स्वतंत्र पत्रकार अकेले या कुछ लोग संगठन बनाकर डिजिटल प्लेटफार्म चला रहे हैं। इसमें बड़े मीडिया घरानों के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से बहुत सी सुविधाएं जुट जाती हैं, जबकि निष्पक्ष पत्रकारिता करने वालों को अपनी आवाज बुलंद रखने के लिए कई बाधाएं पार करनी पड़ती है।

उदाहरण के तौर पर नए नियमों के मुताबिक हर चैनल को एक शिकायत अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी। यह अधिकारी संपादक भी नहीं हो सकता और उसके मातहत काम करने वाला भी नहीं। नियमों के हिसाब से कोई भी शिकायत आने पर चौबीस घंटे के अंदर शिकायत करने वाले को प्राप्ति की मंजूरी देनी होगी, पंद्रह दिन के भीतर बताना होगा कि शिकायत का क्या होगा और हर महीने इस बात का पूरा ब्योरा सामने रखना होगा कि कितनी शिकायतें मिलीं और उनका क्या-क्या किया गया। 

आईटी सेल रखने वाले दलों की ट्रोल आर्मी अपने आलोचक चैनलों को दर्जनों शिकायतें ऐसे में रोज भेज सकती है, बड़े चैनलों के तो लीगल डिपार्टमेंट इन्हें देख लेंगे, लेकिन छोटे चैनल के मालिक खबरों की पड़ताल करेंगे या शिकायतों का रजिस्टर बनाएंगे। सरकार की नीयत पर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि उसने इन नियमों को बनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के लोगों से व्यापक चर्चा नहीं की। डिजिपब का भी कहना है कि उन्होंने दिसंबर में संबंधित मंत्री को पत्र लिखा था और इन नियमों के विनिमयन से पहले चर्चा में भाग लेने के लिए आमंत्रित करने की मांग की थी लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

नियमों के हिसाब से संस्थानों में तो निगरानी की तीन स्तर की व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन इसके बाद भी सरकार तमाम मंत्रालयों के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों की एक समिति बनायेगी जो मीडिया की शिकायतें सुनेगी। इस समिति की सिफारिश पर सूचना मंत्रालय किसी चैनल या प्लेटफॉर्म को चेतावनी दे सकता है, माफी मांगने को कह सकता है या भूल सुधार करने या सामग्री हटाने को भी कह सकता है। आिखरी फैसला सूचना प्रसारण सचिव के हाथ में होगा। जाहिर है जब आखिरी फैसला सरकार के हाथ में है, तो उसके हित ही सर्वोपरि होंगे। सरकार अगर वाकई मीडिया की आजादी को बरकरार रखना चाहती है तो उसे इन दिशानिर्देशों को लागू करने से पहले पुनर्विचार करना चाहिए।

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