सरकार का दुस्साहस..

सरकार का दुस्साहस..

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मोदी सरकार वाकई बहुत हिम्मती है। कुछ न कर पाने के बाद सब कुछ करने का श्रेय बटोरना और जिन्होंने बहुत कुछ किया है, उनकी उपलब्धियों को शून्य बताना भी हिम्मत की श्रेणी में ही आता है। पिछले पांच सालों और इस शासनकाल के दो सालों में रोजगार इस कदर घट गया कि लाखों युवाओं को मोदीजी रोजगार दो का हैशटैग चलाना पड़ा, जो टॉप ट्रेंड में रहा। लेकिन नए रोजगार सृजित करने की जगह सरकार ने उन सार्वजनिक निकायों को भी निजीकरण के गड्ढे में धकेल दिया, जिनसे रोजगार मिलता था और मिलने की संभावनाएं भी बनी हुई थीं।

हिम्मती सरकार ने खुलेआम बजट में सरकारी कंपनियों को बेचकर धन जुटाने का ऐलान किया था। अब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सरकार का बिजनेस यह नहीं है कि वह बिजनेस में रहे। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार रणनीतिक क्षेत्र में कुछ सीमित संख्या में सरकारी उपक्रमों को छोड़कर बाकी सरकारी कंपनियों का निजीकरण करने के लिए प्रतिबद्ध है। मोदीजी ने साफ शब्दों में कह दिया कि सरकारी कंपनियों को केवल इसलिए नहीं चलाया जाना चाहिए कि वे विरासत में मिली हैं। इस तरह की स्वीकारोक्ति के लिए वाकई बहुत हिम्मत चाहिए।

सरकार ताल ठोंक कर मैदान में है कि वह देश में सब कुछ निजी हाथों को बेचेगी। इसी तरह की खरी-खरी सरकार तीन महीनों से आंदोलनरत किसानों को भी सुना चुकी है कि वह कृषि कानून वापस नहीं लेगी। विपक्ष सरकार को लाख कोसता रहे कि वह दो-चार उद्योगपतियों के हित के लिए काम कर रही है। सरकार इसमें भी कोई पर्दादारी नहीं रखना चाहती है। गुजरात के मोटेरा में सबसे बड़े स्टेडियम का जिस अंदाज में उद्घाटन हुआ और सरदार पटेल की जगह नाम बदलकर स्टेडियम को नरेन्द्र मोदी का नाम दिया गया, वह भी इस सरकार की हिम्मत का ही परिचायक है। देश में कई जगह स्टेडियम बन रहे होंगे या आगे बनेंगे। इनमें से किसी का भी नाम मोदीजी के नाम पर रखा जा सकता था।

लेकिन उनकी लार्जर दैन लाइफ वाली छवि को यह शोभा नहीं देता कि किसी भी स्टेडियम को उनके नाम पर किया जाए। इसके लिए तो स्टेडियम को कुछ अनूठा होना चाहिए था। मोटेरा का स्टेडियम इस पैमाने पर खरा उतरता है। लेकिन यहां सवाल उठना लाजमी है कि जिस सरदार पटेल को भाजपा अपना आदर्श बताती आई है, क्या वह श्रद्धाभाव अब खत्म हो चुका है। क्योंकि इस स्टेडियम का नाम पहले सरदार पटेल स्टेडियम था। इस पर भी हिम्मतवाली सरकार के पास जवाब तैयार है। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जवाब दिया है कि ‘स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का नाम सरदार पटेल स्पोर्ट्स इन्क्लेव है। सिर्फ कॉम्प्लेक्स के अंदर स्थित क्रिकेट स्टेडियम का नामकरण नरेंद्र मोदी पर किया गया है। विडम्बना है कि  ‘परिवार’ जिसने मौत के बाद भी कभी सरदार पटेल का सम्मान नहीं किया, अब रो रहा है।’ जाहिर है भाजपा ने फिर वही पुराना कार्ड खेला है कि कुछ भी हो गांधी-नेहरू परिवार पर उंगली उठा दो, लोग अपने आप असल मुद्दे से भटक जाएंगे। वैसे इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलेगा कि नेहरूजी अपने नाम पर कोई स्टेडियम नहीं चाहते थे।

1949 में क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मानद सचिव एएस डीमेलो ने नई दिल्ली में ‘नेहरू स्टेडियम इन पार्क’ और मुंबई में ‘वल्लभ भाई पटेल ओलंपिक स्टेडियम’ बनाने का सुझाव दिया था, जिस पर नेहरूजी ने उन्हें 11 फरवरी 1949 को जवाब लिखा था कि मैं किसी भी स्टेडियम का नाम अपने या किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर रखे जाने के सख्त $िखला$फ हूं। यह एक बुरी आदत है और इसे बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। स्टेडियम का नाम ‘नेशनल स्टेडियम’ या इसी तरह का कोई दूसरा नाम हो सकता है। तब तो नेहरूजी की बात सुन ली गई, लेकिन बाद में इस बुरी आदत को खूब बढ़ावा मिला। बल्कि नेहरूजी के नाम पर स्टेडियम भी बना उनके साथ अन्य नेताओं के नाम पर भी स्टेडियम के नाम रखे गए। खेलों और खिलाड़ियों को इससे कितना लाभ मिला, ये अलग से शोध का विषय है। वैसे कुछ समय पहले दिल्ली के ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला स्टेडियम का नाम भी बदलकर अरुण जेटली स्टेडियम किया गया। जिस पर दिग्गज स्पिनर रहे बिशन सिंह बेदी ने अपनी नाराजगी प्रकट करते हुए कहा था कि ऐसे में स्टेडियम से उनके नाम का स्टैंड हटा दिया जाए।

नरेन्द्र मोदी स्टेडियम पर भारतीय क्रिकेटरों की क्या राय है, यह अभी पता नहीं है। और ये भी पता नहीं कि उनमें से कितने लोग अपनी राय खुलकर जाहिर करने की हिम्मत दिखाते हैं। वैसे सरदार पटेल की विरासत हथियाने का सारा लाभ शायद भाजपा ले चुकी है। यानी पटेल अब भाजपा के काम के नहीं रहे। यूं भी उन्हें सबसे बड़ी मूर्ति में ढालकर भाजपा ने अपना दायित्व पूरा कर लिया है। लौह पुरुष के विचार लोहे की मूर्ति में जड़ हो जाएं, यही अब भाजपा के लिए मुफीद है। अगर वो विचार नर्मदा की धारा की तरह प्रवाहित होने लगेंगे तो फिर सरकार की हिम्मत को चुनौतियों के भंवर में फंसना पड़ेगा। बेहतर है लोग खेल के मजे लें और खिलाड़ियों को अपना काम करने दें।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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