सरकार के अहंकार को तुष्ट करने के लिए राजद्रोह नहीं लगाया जा सकता..

सरकार के अहंकार को तुष्ट करने के लिए राजद्रोह नहीं लगाया जा सकता..

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एक 22 साल की लड़की को जमानत देने के अदालत के फैसले पर जिस तरह खुशियां जाहिर की जा रही हैं, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हम कितने भयग्रस्त समाज में रह रहे हैं। आज के माहौल में इंसाफ की उम्मीदें इतनी क्षीण हो गई हैं कि एक हल्की सी किरण भी भरी धूप जैसे उजाले का एहसास कराती है। वैसे भी दिशा रवि को जमानत देना अब न छोटी बात है, न मामूली बात है। क्योंकि कुछ दिनों पहले जिन हालात में दिशा को गिरफ्तार किया गया था, उसमें यही संदेश देने की कोशिश थी कि सत्ता के खिलाफ आवाज उठाने का कोई साहस न करे। वो तमाम युवा जो खुद को पढ़ा-लिखा मानते हैं, वे अपनी डिग्रियां लेकर रोजगार के बाजार में अपने लिए ठिकाना तलाश करने में अपनी ऊर्जा और उत्साह लगाएं। सत्ता के काम में मीनमेख निकालने, जनता को जागरुक करने जैसे कामों में अपना समय जाया न करें, अन्यथा उन्हें बाकी का जीवन जेल और अदालतों के बीच गुजारना पड़ सकता है।

दिशा रवि को न केवल गिरफ्तार किया गया, उसके बाद ट्रोल आर्मी बाकायदा उनके चरित्र हनन में जुट गईं। लेकिन दिशा भी शायद हारने वालों में से नहीं हैं। उन्होंने भरी अदालत में कह दिया था कि अगर किसानों की बात करना गुनाह है तो वह जेल में रहना चाहेंगी। उनके जैसे कुछ और उत्साही नौजवान इसी निडरता के कारण अभी जेल में ही हैं। लेकिन दिशा को अदालत ने जमानत दे दी। और इस दौरान अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने जो टिप्पणियां की, वे लोकतंत्र के लिहाज से काफी अहम हैं।

पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने विगत 13 फरवरी को बेंगलुरु से गिरफ़्तार किया था। अदालत में दिशा को पेश करते हुए पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि दिशा रवि टूलकिट गूगल डॉक्यूमेंट की एडिटर हैं और इस डॉक्यूमेंट को बनाने और इसे प्रसारित करने में उनकी मुख्य भूमिका है। दिशा पर भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत राजद्रोह, समाज में समुदायों के बीच नफ़रत फैलाने और आपराधिक षड्यंत्र के मामले दर्ज किए गए हैं। इस मामले में बीते शनिवार को हुई सुनवाई में न्यायाधीश ने पुलिस से पूछा था कि यदि मैं मंदिर निर्माण के लिए डकैत से संपर्क करुं तो आप कैसे कह सकते हैं कि मैं डकैती से जुड़ा हुआ था। और मंगलवार को इस मामले में दिशा को जमानत देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिक सरकार की अंतरात्मा की आवाज के रक्षक होते हैं। उन्हें जेल में सिर्फ इस आधार पर नहीं डाला जा सकता है कि वे सरकार की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखते… राजद्रोह सरकारों की घायल अहं की तुष्टि के लिये नहीं लगाया जा सकता है। एक जाग्रत और मज़बूती से अपनी बातों को रखने वाला नागरिक समाज एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।

यह टिप्पणी उन शक्तियों को कड़ा जवाब है, जो सरकार को देश मानते हैं और सरकार से मुखालफत को देशद्रोह बताते हैं। अदालत ने निहारेन्दु दत्त मजुमदार बनाम एम्परर एआईआर मामले के फैसले के हवाले से कहा, ‘विचारों की भिन्नता, अलग-अलग राय, असहमति यहां तक अनुपात से अधिक असहमति भी सरकार की नीतियों में वैचारिकता बढ़ाती है।’ न्यायाधीश राणा ने संविधान के अनुच्छेद 19 की याद दिलाई जिसमें असहमति का अधिकार दृढ़ता से निहित है।

दिशा को जमानत और अदालत की टिप्पणियां सरकार के साथ-साथ पुलिस-प्रशासन, गोदी मीडिया और उन तमाम लोगों के लिए नसीहत है जो अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल नागरिकों पर करते हैं। पिछले कुछ सालों में राजद्रोह का खौफ जबरदस्त तरीके से जनता के बीच पैदा कर दिया गया है। लोगों को अपने हक के लिए आवाज उठाने से हतोत्साहित किया जा रहा है। ताजा उदाहरण किसान आंदोलन ही है, जिसे खत्म करने के लिए सारे पैंतरे आजमाए गए। प्रधानमंत्री से लेकर सत्तारुढ़ पार्टी के तमाम बड़े नेता कृषि कानूनों के फायदे गिना रहे हैं। कुछ समय के लिए जगह-जगह प्रेस कांफ्रेंस कर इन कानूनों का लाभ बताने की कोशिश की गई।

लेकिन किसान किसी भी तरह इन कानूनों को लाभकारी नहीं मान रहे हैं, बल्कि वे इसमें अपना भविष्य दांव पर लगता देख रहे हैं, तो अब भाजपा नेता ये देख रहे हैं कि इन किसानों को कैसे बहकाया जाए। किसानों को कैसे बहकाया जाए, इसे लेकर एक भाजपा कार्यकर्ता ने गुरुग्राम में आयोजित भाजपा के चिंतन शिविर में सवाल भी पूछ लिया, जिसकी वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर आई है। क्या यह बेहतर नहीं होता कि सरकार बहकाने की जगह भरोसा जगाने के मंत्र लोगों की कान में फूंके, ताकि देश और लोकतंत्र दोनों मजबूत हों।

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