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बाबा रामदेव नहीं चूकता ठगी का कोई मौका..

बाबा रामदेव नहीं चूकता ठगी का कोई मौका..

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बाबा रामदेव का झूठ बनाम सरकार में उनकी पहुंच..

-संजय कुमार सिंह॥
बाबारामदेव और उनकी पतंजलि का एक दावा चर्चा में है। योग गुरु ने शुक्रवार 19 फरवरी 2021 को एक प्रेस कांफ्रेंस कर कोरोना की दवा पेश करने का दावा किया। इंडिया टाइम्स economictimes डॉट कॉम की खबर का प्रमुख अंश पढ़ें – “योग गुरु बाबा रामदेव ने आज कोरोना की दवा कोरोनिल लॉन्च की है। इस मौके पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी मौजूद थे। गडकरी ने कहा कि चमत्कार के बगैर कोई नमस्कार नहीं होता। उन्होंने कहा कि लगातार रिसर्च करना समय की आवश्यकता है। इस मौके पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी मौजूद थे। नई दवा की घोषणा पर पतंजलि योगपीठ का दावा है कि कोरोना के उपचार में काम आने वाली दवा अब सबूत के साथ पेश की गयी है।”

ठगी का उद्घाटन


कहने की जरूरत नहीं है कि केंद्रीय मंत्रियों खासकर स्वास्थ्य मंत्री की मौजूदगी से लगता है कि दावे को सरकारी मंजूरी है। नैतिक रूप से यह गलत है कि मंत्री किसी निजी कंपनी के उत्पाद के प्रचार में शामिल रहें और प्रचार कें। इसपर मीडिया में किसी ने सवाल नहीं उठाया। आज अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने इसपर लिखा है और बताया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने ई मेल का जवाब नहीं दिया जबकि पतंजलि से संपर्क नहीं हो पाया। बाकी आपके अखबार में ऐसी कोई खबर दिखी? यह हालत तब है जब पिछले साल जून में बाबा रामदेव की कंपनी ने कोरोना की दवा तैयार करने का दावा किया था और तब केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय ने उसका खंडन कर दिया था। तब पीआईबी की विज्ञप्ति में कहा गया था, आयुष मंत्रालय ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड, हरिद्वार (उत्तराखंड) के द्वारा कोविड-19 के उपचार के लिए विकसित आयुर्वेदिक दवाइयों के बारे में हाल में मीडिया में आए समाचारों का संज्ञान लिया है। उल्लिखित वैज्ञानिक अध्ययन के दावे के तथ्यों और विवरण के बारे में मंत्रालय को कोई जानकारी नहीं है।
विज्ञप्ति में आगे कहा गया है, संबंधित आयुर्वेदिक दवा विनिर्माता कंपनी ने बताया है कि आयुर्वेदिक औषधियों सहित दवाओं के ऐसे विज्ञापन औषधि एवं जादुई उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 के प्रावधानों और उसके नियमों तथा कोविड महामारी के क्रम में केन्द्र सरकार द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अंतर्गत विनियमित हैं। मंत्रालय ने 21 अप्रैल, 2020 को जारी राजपत्र अधिसूचना संख्या एल11011/8/2020/एएस भी जारी की गई थी, जिसमें आयुष हस्तक्षेप/औषधियों के साथ कोविड-19 पर किए जाने वाले शोध अध्ययन की आवश्यकताओं और उसके तरीकों के बारे में बताया गया था।
उपरोक्त समाचार के तत्थों और दावों के सत्यापन के प्रति मंत्रालय को सूचित किए जाने के क्रम में पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड से उन दवाओं के नाम और संयोजन; स्थानों/ अस्पताल जहां कोविड-19 के लिए शोध कराया गया; प्रोटोकॉल, नमूना आकार, संस्थागत आचार समिति की मंजूरी, सीटीआरआई पंजीकरण और शोध के नतीजे के विवरण उपलब्ध कराने तथा इस मसले की विधिवत जांच पूरी होने तक ऐसे दावों के विज्ञापन/प्रचार को बंद करने के लिए कहा गया है। मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार के संबंधित राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण से भी लाइसेंस की प्रतियां और आयुर्वेदिक दवाओं की उत्पाद स्वीकृति का विवरण उपलब्ध कराने के लिए कहा है, जिसके कोविड-19 के उपचार में कारगर होने का दावा किया जा रहा है।
अब नई घोषणा या प्रेस कांफ्रेंस में कहा गया है, “आयुष मंत्रालय ने कोरोनिल टैबलेट को कोरोना की दवा के तौर पर स्वीकार कर लिया है। पतंजलि का कहना है कि नई कोरोनिल दवा सीओ-पी-डब्ल्यूइको-जीएमपी सर्टिफाइड है। रामदेव ने कहा, “अब सारे सर्टिफिकेशन के साथ हमारे पास 250 से अधिक रिसर्च पेपर हैं, अकेले कोरोना के ऊपर 25 रिसर्च पेपर हैं, अब कोई दुनिया में सवाल नहीं उठा सकता।” सवाल है कि रामदेव का दावा दमदार है तो आयुमंत्री से यह प्रचार क्यों नहीं करवाया गया? तब लगता कि पिछली कमी पूरी की गई है। अब लग रहा है कि अतिरिक्त प्रचार की व्यवस्था की गई है।
शायद इसीलिए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि दुनिया के कई देशों ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड , कोलंबिया, मॉरिशस, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन ने भारत के आयुर्वेद को अपने नियमित मेडिसिन सिस्टम में लागू किया है। उन्होंने कहा,”आयुर्वेद की डिग्री लेकर डॉक्टर इन देशों में जाकर प्रैक्टिस कर सकता है। आयुर्वेद के बारे में वेदों से लेकर सभी स्थानों पर जानकारियां उपलब्ध है।” खबर में नहीं लिखा है पर इस दवा को विश्व स्वास्थ्य संगठन से प्रमाणित होने का दावा भी किया गया, पीछे बैनर पर लिखा भी है जबकि डब्ल्यूएचओ ऐसा प्रमाणन देता ही नहीं है। आयुष मंत्रालय की विज्ञप्ति के बाद यह दावा और स्वास्थ्य मंत्री के साथ नितिन गडगड़ी की मौजूदगी बाबा रामदेव को सरकार का समर्थन तो बताती ही है।
इस संबंध में अल्ट न्यूज की खबर का शीर्षक है, “पतंजलि की कोरोनिल को डब्ल्यूएचओ की न कोई मंज़ूरी मिली और न ही कोई सर्टिफ़िकेट मिला है।” अल्ट न्यूज ने लिखा है, नीचे न्यूज़ नेशन की एक रिपोर्ट है जो ये दवा करती है कि इस आयुर्वेदिक दवा को डब्ल्यूएचओ का अप्रूवल मिल गया है। पतंजलि के संस्थापक रामदेव का दीपक चौरसिया ने इंटरव्यू लिया। इसमें दीपक ने कहा, “आज बाबा रामदेव ने ये सिद्ध कर दिया है कि जो वो कहते हैं वो वो करते हैं। उन्होंने कोरोनिल के बारे में बात कही थी तब इस बात पर बड़ा विवाद उठा था कि उनकी कोरोनिल किट क्या वाकई कोरोना का कारगर इलाज है? लेकिन आज इसपर डबल्यूएचओ की सहमति मिल चुकी है।
रामदेव ने अपने जवाब में दावा किया कि डबल्यूएचओ की एक टीम उनकी कम्पनी आई थी और फिर उसी ने उन्हें कोरोनिल को लाइसेंस दिया जिससे इस दवा को 150 से ज़्यादा देशों में बिकने की स्वीकृति भी मिल गयी। इस इंटरव्यू के कुछ ही मिनट बीतते हैं और रामदेव पश्चिमी देशों की चिकित्सा पद्धति की आलोचना करते हैं और यहां तक कहते हैं कि एलोपैथी ‘मेडिकल आतंकवाद’ पर उतर आई है। बाद में पतंजलि आयुर्वेद के मैनेजिंग डायरेक्टर बालकृष्ण ने ट्वीट किया Drugs Controller General of India (DCGI), भारत सरकार ने कोरोनिल को Goods Manufacturing Practice (GMP) से स्वीकृत Certificate of Pharmaceutical Product (CPP) प्रदान किया था।
अल्ट न्यूज ने इस संबंध में पीटीआई की इस रिपोर्ट का भी उल्लेख किया है जो इस प्रकार है, पीटीआई की एक रिपोर्ट में पतंजलि की ओर से आया बयान है – “कोरोनिल को Central Drugs Standard Control Organisation के आयुष सेक्शन की तरफ़ से WHO certification scheme के तहत Certificate of Pharmaceutical Product (CPP) मिला है.” आगे इस रिपोर्ट में लिखा है कि पेश किये गए डेटा के आधार पर आयुष मिनिस्ट्री ने कोरोनिल टेबलेट को बतौर “COVID-19 के लिए सहायक उपाय” चिन्हित किया है।
फर्जी खबरों की पोल खोलने वाले वेबसाइट के साफ खुलासे के बाद पूर्व में छप चुके बाबा के दावे का सच आज कहीं किसी अखबार में है? वैसे तो गलत दावा करके फिर सुधार कर दिया जाए तब भी जिन लोगों तक गलत सूचना पहुंच जाती है उन्हें सही सूचना फिर से देने का कोई तरीका नहीं है और ना यह सुनिश्चित किया जा सकता है। इसलिए सरकारी नियंत्रण न हो तो इस सुविधा का भरपूर दुरुपयोग होता है और हो सकता है। इस बार भी यही हुआ है लेकिन कार्रवाई जब पहले नहीं हुई तो अब क्या होगी।


About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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