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आखिर नमो सरकार इतनी डरी हुई क्यों है?

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क्या यह सरकार इतनी भीरु है कि किसी शैक्षणिक और वैज्ञानिक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार या सेमिनार आयोजित करने के लिए पहले उससे अनुमति ली जाए.?

भारत के राजनैतिक, सांस्कृतिक इतिहास में वीरता और विद्वता की अनगनित गाथाएं हैं। इन्हीं के बूते हम अक्सर विश्व गुरु बनने का सपना भी देखते हैं। हम दुनिया को ये बताते नहीं थकते कि हमारे यहां ज्ञान की परंपरा कितनी प्राचीन है। विदेशों से अनेक शोधार्थी अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए भारत आए और यहां उन्हें ज्ञान का अद्भुत भंडार मिला। नालंदा जैसे विश्वविद्यालय इस बात का गवाह हैं। लेकिन अब लगता है कि अगर पांचवीं सदी में मोदी राज होता तो नालंदा जैसे विश्वविद्यालय कभी बन ही नहीं पाते। या ह्वेनसांग सातवीं सदी की जगह 21वीं सदी में होते तो कभी भारत नहीं आ पाते।

दरअसल देश की सुरक्षा के नाम पर बनाए जा रहे तरह-तरह के नियमों-कानूनों की कड़ी में अब केंद्र सरकार ने एक नया निर्देश जारी किया है, जिसके मुताबिक सरकारी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय वेबिनार, ऑनलाइन सेमिनार और भारत की सुरक्षा से संबंधित विषयों पर कांफ्रेंस में विदेशी विद्वानों को बुलाने से पहले विदेश मंत्रालय से मंजूरी लेनी पड़ेगी। सरकार का कहना है कि ऐसा देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया गया है।

आदेश के मुताबिक सार्वजनिक रूप से पोषित शैक्षणिक संस्थानों और यूनिवर्सिटी सहित सभी सरकारी इकाइयों से किसी भी तरह के ऑनलाइन एवं वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस या सेमिनार का आयोजन करने के लिए संबंधित प्रशासनिक सचिव से मंजूरी लेने को कहा गया है। यह भी कहा गया कि इस तरह के कार्यक्रमों के आयोजन की मंजूरी देते हुए मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस कार्यक्रम का विषय राज्य, सीमा, पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख जैसे केंद्रशासित प्रदेशों या किसी अन्य मुद्दे जो स्पष्ट रूप से भारत के आंतरिक मामलों से जुड़े हुए हों, उनसे संबंधित नहीं होने चाहिए।

गौरतलब है कि राजनीतिक मुद्दों पर कोई आयोजन करने से पहले अनुमति लेने की व्यवस्था पहले से ही है, लेकिन अकादमिक मामलों में ऐसा पहली बार किया गया है। इस फैसले के विरोध में अब आवाज उठने लगी है। बहुत से विद्वान इसे शैक्षिक स्वतंत्रता के लिए खतरा मान रहे हैं। इसे अकादमिक सेंसरशिप की तरह देखा जा रहा है। उनका मानना है कि इस कदम से एक लोकतांत्रिक देश के रूप में विदेश में देश की छवि पर बुरा असर हो सकता है।

देश की दो सबसे बड़ी और सबसे पुरानी विज्ञान अकादमियों द इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेस और द इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस ने इस फैसले से विज्ञान पर चर्चाओं और युवाओं की उसमें सार्थक भागीदारी के बाधित होने की शंका जतलाई है। इन संस्थाओं ने शिक्षा मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा है कि सभी संस्थानों के लिए वेबिनार के लिए अनिवार्य रूप से सरकार की मंजूरी लेने के आदेश से सभी वैज्ञानिक चर्चा पूरी तरह से रुक सकती हैं। इन नए नियमों की वजह से युवाओं के बीच विज्ञान को लेकर उनकी रुचि बाधित हो सकती है।

शिक्षा मंत्री को लिखे पत्र में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेस के अध्यक्ष पार्थ मजूमदार ने कहा है, ‘अकादमी का दृढ़ विश्वास है कि हमारे देश की सुरक्षा निश्चित किए जाने की जरूरत है। हालांकि, ऑनलाइन वैज्ञानिक बैठकें या भारत के आंतरिक मामलों से जुड़े हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए पूर्व में मंजूरी लेना भारत में विज्ञान की प्रगति के लिए अहितकर है।’ नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स के संस्थापक निदेशक मजूमदार ने कहा कि इस आदेश में भारत के आंतरिक मामलों को परिभाषित नहीं किया गया या यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ऑनलाइन कार्यक्रमों के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय से क्या तात्पर्य है। यह आदेश केवल सरकारी संस्थानों पर लागू है। इस वजह से यह सार्वजनिक क्षेत्र में वैज्ञानिक खोज पर गंभीर बाधा डालेगा, लेकिन निजी संस्थानों पर ऐसा नहीं होगा। अकादमी इसे अनुचित मानती है।’

केंद्र सरकार के इस तरह के फैसलों से उसकी भीरूता जाहिर होती है। ऐसा लगता है कि सरकार को जनता की नीयत पर भरोसा नहीं हो रहा। उसे अब तक विरोध की आवाज उठाते छात्रों से डर लग रहा था, फिर चुटकुले सुनाने वालों से डर लगा, विदेशी हस्तियों से डर लगा और अब लगता है कि अंतरराष्ट्रीय शोध-अध्ययनों से भी सरकार डर रही है। देश की सुरक्षा के नाम पर पहले ही कई राजनैतिक पैंतरे चले जा चुके हैं, जिनसे देश को नुकसान हुआ है। सरकार पहले संकीर्ण सोच पर प्रतिबंध लगाए, ताकि देश का इतिहास, परंपराएं और संस्कृति बचें साथ ही बचे देश का लोकतंत्र।

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